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हिन्दू विवाह का पंजीकरण (Registration of Marriage) धारा 8

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1956 द्वारा जो सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया गया है उनमें एक है विवाह का पंजीकरण या रजिस्ट्रेशन का उपबंध। इसमें विवाह के लिए किसी निश्चित विधि या अनुष्ठान का उल्लेख नहीं है। केवल विवाह के लिए योग्यता (धारा 5) का उल्लेख है। धारा 7 का आशय है कि सामाजिक रूप से मान्य

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एक वैध हिन्दू विवाह की संकल्पना, प्रारूप और उसके लिए आवश्यक रस्में (Concept and forms of a valid Hindu marriage, solemnization of marriage)

हिन्दू विवाह के शास्त्रीय रीति के अनुसार निम्नलिखित तीन अनुष्ठान सामान्यतः सभी हिन्दुओं में मान्य है:   फिर भी विभिन्न समुदायों एवं क्षेत्रों में विवाह के विभिन्न तरीकें एवं रस्म-रिवाज होते हैं। किसी भी समाज विशेष के परम्परागत तरीके से हुए विवाह को यह कानून मान्यता देता है अर्थात् विवाह के लिए किसी विशेष आयोजन

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हिन्दू विवाह (Hindu Marriage) (धारा 5-8)

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार वैध विवाह के लिए आवश्यक शर्तें (Condition for the validity of marriage) विवाह एक प्राचीन एवं लगभग सर्वव्यापी संस्था है। लगभग सभी समाजों में इसे सम्मानीय एवं पवित्र माना जाता है। इसका कारण यह है कि यह विवाह के दोनों पक्षकारों को ही नहीं, बल्कि उनके बच्चों को भी

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हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955)

1.1 सामान्य परिचय प्रश्न- हिन्दू विवाह अधिनियम के द्वारा हिन्दू विवाह मे कौन से प्रमुख परिवर्तन लाया गया? इस अधिनियम द्वारा सर्वप्रथम हिन्दू विवाह विधि को संहिताबद्ध किया गया, साथ ही इसे वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने और अधिक स्पष्ट, एकरूप एवं विनियमित करने के लिए इसमें कई महत्वपूर्ण परिवर्तन भी कि, जिनमें

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हिन्दू विधि: स्रोत एवं शाखाएँ (Hindu law– Source and Schools)

प्रश्न- हिन्दू विधि क्या है? सामान्यतः हिन्दू विधि का आशय उस विधि से होता है जो हिन्दू समुदाय के व्यक्तियों को प्रशासित करती है। लेकिन यह इंग्लैड के सामान्य विधि (common law) की तरह न तो प्रथात्मक विधि है और न ही किसी राजा या सम्प्रभु द्वारा प्रवर्तमान आदेश। यह वस्तुतः प्राचीन धर्मग्रन्थों, जैसे, वेद,

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