अश्लीलता रोकने से संबन्धित देश में क्या कानूनी प्रावधान हैं?
आजकल अश्लीलता बहस का एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। सोशल मीडिया हो, मुख्य धारा की सिनेमा हो, या फिर बेवसीरीज हर जगह इसे सामान्य रूप से देखा जा रहा है। पर इस के बारे में कानून क्या कहता है? क्या अश्लीलता रोकने के लिए कोई कानूनी है? अगर है तो क्या यह पर्याप्त है? उससे भी बड़ी बात यह कि अश्लीलता है क्या?
हालांकि अश्लीलता को कानून ने पारिभाषिक रूप से ‘महिलाओं का अशिष्ट चित्रण’ का नाम देकर उसे परिभाषित करने का प्रयास किया है, पर इस बारे में सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या यह है कि यह एक व्यक्तिगत चीज है। किसी व्यक्ति को कोई चीज अश्लील या अशिष्ट लग सकती है जबकि दूसरे को नहीं।
फिर भी अभी जो कानूनी प्रावधान हैं इस संबंध में उसे देखते हैं।
भारत में अश्लीलता से संबन्धित सबसे प्रमुख कानून है the Indecent Representation of Women (Prohibition) Act यानि स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986। IPC का सेक्शन 292 और वर्तमान BNS का सेक्शन 294 भी इससे संबन्धित प्रावधान करता है। पर, The Indecent Representation of Women (Prohibition) Act जिसे संक्षेप में IRWP Act कहते हैं, इस बारे में विशेष और व्यापक कानून है जो अशिष्ट रूपण को परिभाषित भी करता है। इस एक्ट में केवल 10 सेक्शन हैं। हर एक्ट की तरह इसका सेक्शन 2 भी परिभाषा खंड है।
आईपीसी/बीएनएस केवल ‘अश्लील पुस्तक आदि के बिक्री’ आदि की बात करता है। अश्लीलता क्या है?, जैसे मौलिक प्रश्नों का उत्तर नहीं देता।
अश्लीलता क्या है?
इस एक्ट में अश्लीलता के लिए ‘महिलाओं का अशिष्ट रूपण’ (Indecent Representation) शब्द का प्रयोग हुआ है। इसका सेक्शन 2 (c) ‘महिलाओं के अशिष्ट रूपण’ को परिभाषित करता हुआ कहता है:
स्त्री की (1) आकृति (2) रूप, और (3) शरीर या किसी अंग
का ऐसे चित्रण करना – (1) जिसका प्रभाव अशिष्ट हो (2) स्त्रियों के लिए अपमानजनक हो (3) निंदनीय हो (4) लोक नैतिकता, नैतिक आचार के विकृत, क्षति या भ्रष्ट होने की संभावना वाला हो।– अशिष्ट निरूपण है।
अश्लीलता को कैसे पहचाना जा सकता है?
सेक्शन 2 (c) में जो परिभाषा दिया गया है, वह नैतिकता, नैतिक आचार में विकृति, क्षति, भ्रष्टता जैसे शब्द का प्रयोग करता है। पर ये भावनाएँ या अनुभव की चीजें हैं जिन्हें मापा नहीं जा सकता। इसीलिए जब न्यायालयों के सामने ऐसे मामले आते हैं तब सबसे पहला प्रश्न यही होता है कि इसे अशिष्ट माना जाया या नहीं।
न्यायालयों ने इसे मापने के कई टेस्ट बनाए हैं जिनमें भारतीय संदर्भ में दो टेस्ट बहुत प्रासंगिक हैं। पहला है हिकक्लिन टेस्ट। इसे इंग्लैंड के क्वीन’स बेंच ने वहाँ के एक केस में निरूपित किया था। भारत की सुप्रीम कोर्ट ने 1965 के रंजीत डी उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य (Ranjith D Udeshi V. State of Maharashtra) केस में इस टेस्ट को लागू किया था। पर इसकी देश भर में तीखी आलोचना हुई। 2014 के अवीक सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (Aveek Sarkar V state of west Bengal, 2014) केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के निर्णय को पलटते हुए ‘कम्यूनिटी टेस्ट’ का मापदंड बनाया।
देश में अश्लीलता से संबन्धित कानूनी संकल्पना के विकास में इन तीनों केसों का महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिए आगे बढ़ने से पहले इन तीनों केसों और दोनों टेस्ट को समझ लेते हैं।
रेजिना बनाम हिकक्लिन (Regina V. Hicklin), 1868
इस केस में क्वीन’स बेंच ने अश्लीलता को मापने का एक टेस्ट दिया जिसे ‘हिकक्लिन टेस्ट’ कहा गया। ऐसी कोई सामग्री, जो नैतिक रूप से दूषित मस्तिष्क के लोगों के विचार या व्यवहार पर अनैतिक प्रभाव डालती है (deprave and corrupt those whose minds are open to such immoral influence, and into whose hands a publication of this sort may form a head.), को अशिष्ट कहा जा सकता है। स्पष्टत: इसमें निरूपित किए जाने वाले विषय नहीं बल्कि लोगों पर उसके प्रभाव पर ध्यान केन्द्रित किया गया था।
रंजीत उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य (Ranjith D Udeshi V. State of Maharashtra), 1965
इस केस में वादी एक विदेशी उपन्यास ‘‘Lady Chatterley’s Lover’ के भारत में प्रकाशन और वितरण को रोकना चाहता था, क्योंकि उसके अनुसार यह उपन्यास अश्लील था। साथ आईपीसी के सेक्शन 292, जो अश्लीलता से संबन्धित प्रावधान करता है, की सांवैधानिक वैधता को भी चुनौती दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने इसमें हिकक्लिन टेस्ट को लागू किया। कोर्ट ने कमजोर नैतिकता के व्यक्ति पर इसके प्रभाव की संभावना देखते हुए इस उपन्यास को ‘अश्लील’ माना।
इस निर्णय की देश भर में आलोचना हुई। आलोचकों के अनुसार यह टेस्ट व्यक्ति केन्द्रित (subjective) है। किसी व्यक्ति पर इसका प्रभाव एकमात्र कसौटी माना गया था। इसे किसी को कोई चीज अश्लील लग सकती है तो किसी को नहीं। उन्हें यह भी डर था कि व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर किसी कला या साहित्य को ‘अशिष्ट’ मान कर प्रतिबंधित करना संभव हो जाएगा। इससे संविधान के आर्टिक्ल 19 (1) (a) के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता (freedom of expression) भी खतरे में पड़ जाएगी।
इस केस के बाद जो बहस हुई उससे यह तो निश्चित हो गया कि ‘अश्लीलता’ को परिभाषित करना करना और इसके लिए स्पष्ट कानून बनाना बहुत जरूरी था क्योंकि आईपीसी का सेक्शन 292 इसके लिए सक्षम नहीं था। 1986 में ऐसा कानून बन भी गया।
अवीक सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (Aveek Sarkar V state of west Bengal, 2014)
इस केस में कोर्ट ने हिकक्लिन टेस्ट के बदले ‘समसामयिक कम्यूनिटी स्टैंडर्ड टेस्ट’ (contemporary community standard test) को अपनाया।
इस केस में एक प्रसिद्ध श्वेत पुरुष टेनिस खिलाड़ी (बेरिस बेकर-Boris Becker) ने अपनी अश्वेत अभिनेत्री मंगेतर (बारबरा फेल्टस-Barbara Feltus) के साथ नग्न फोटोशूट करवाया। इस फोटो के साथ जो मेसेज था उसका उदेश्य था रंगभेद को नकारना। यह फोटो एक जर्मन पत्रिका में एक आलेख के साथ छपी थी। यह फोटो इसके बाद दुनिया भर के कई पत्र-पत्रिकाओं में फिर से छापी गई। भारत की एक प्रसिद्ध खेल पत्रिका ‘स्पोर्ट्स वर्ल्ड’ ने इसे आवरण आलेख (cover story) के रूप में छापा। कोलकाता से छपने वाली पत्रिका ‘आनंद बाजार पत्रिका’ ने इसे अपने दूसरे पेज पर छापा।
कोलकाता के एक अधिवक्ता ने अपने को इन दोनों पत्रिका का नियमित पाठक होने का दावा करते हुए दोनों पत्रिकाओं पर आईपीसी के सेक्शन 292 और IRWP एक्ट के सेक्शन 4 के तहत केस किया। दोनों पत्रिका इस केस को खतम करवाने के लिए पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट गई।
इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने ओबजर्व किया कि ब्रिटेन में हिकक्लिन टेस्ट 1868 में निरूपित किया गया था। इसे अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने 1957 के Roth v. United States केस में लागू करने से मना कर दिया था।
कोर्ट ने यह माना कि केवल सेक्स संबन्धित सामग्री जिसकी प्रकृति “कामुक विचारों को उत्तेजित (exciting lustful thoughts)” करना हो, को अश्लील माना जा सकता है। किसके कामुक विचारों को? इसके लिए कोर्ट ने ‘contemporary community standards’ को लागू किया। इसका अर्थ था कि एक सामान्य व्यक्ति के दृष्टिकोण से देखा जाएगा (न कि नैतिक रूप से कमजोर व्यक्ति के दृष्टिकोण से) ‘अश्लीलता’ समय और स्थान के अनुसार बदलती रहती है। इसलिए हिकक्लिन टेस्ट भारत के संदर्भ में अब प्रासंगिक नहीं रह गया था, ऐसा कोर्ट ने माना।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी महिला के नग्न या अर्द्ध नग्न शरीर के फोटो को तब तक अश्लील नहीं कहा जा सकता है जब तक कि यह देखने वाले की उत्तेजना जगाने के उद्देश्य से न किया गया हो। अब यह कैसे तय होगा कि क्या इस उद्देश्य से किया गया है क्या नहीं? कोर्ट ने कहा इसके लिए फोटो का बैकग्राउंड, भाव भंगिमा (particular posture) आदि से समझा जा सकता है।
इस टेस्ट के आधार पर कोर्ट ने माना कि खिलाड़ी का फोटो भले ही नग्न था (nude) लेकिन इसका उद्देश्य लोगों को उत्तेजित करना नहीं बल्कि उन्हें रंगभेद के विरुद्ध भावना भरना था। यानि कि उसका उद्देश्य सकारात्मक था।
विज्ञापनों में महिलाओं के अशिष्ट चित्रण से संबन्धित क्या कानून है?
IRWP एक्ट का सेक्शन 3 ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगाने को दंडनीय बनाता है और उस पर रोक लगाने के लिए सरकार को शक्ति देता है जो महिलाओं का अशिष्ट चित्रण करते हैं।
इस एक्ट का सेक्शन 2 (a) विज्ञापन को परिभाषित करते हुए कहता है कि इसमें नोटिस, लेबल, रैपर आदि तथा अन्य दस्तावेज़ भी के साथ-साथ ऐसे सभी ऐसे दृश्य निरूपण शामिल हैं जो प्रकाश (लाइट), ध्वनि (साउंड), धुआँ (स्मोक) या गैस द्वारा बना है। स्पष्ट है कि विज्ञापन का अर्थ व्यापक है। इसमें अखबार, पत्रिका, पम्फलेट, किसी वस्तु या उसके पैकिंग पर दिखाया गया कोई निरूपण भी शामिल है भले ही वह छापे हुए रूप में हो, टीवी या रेडियो पर।
ऐसे विद्यापन को (1) प्रकाशित करना (2) प्रकाशित करवाना, या (3) इसके लिए प्रबंध करना (arrangement), और (4) प्रदर्शन करना, इन सभी को निषिद्ध किया गया है। इसका अर्थ हुआ ऐसे विज्ञापनों के प्रकाशन या उसके प्रदर्शन में किसी तरह भाग लेना- इन सभी को दंडनीय बनाया गया है। चूंकि यहाँ व्यक्ति शब्द आया है इसलिए इसमें स्त्री और पुरुष दोनों शामिल हैं।
महिलाओं का अभद्र चित्रण करने वाली पुस्तकों, पुस्तिकाओं आदि के प्रकाशन या डाक द्वारा भेजने पर प्रतिबंध के बारे में क्या प्रावधान हैं?
IRWP एक्ट के सेक्शन 4 ऐसे पुस्तकों आदि के बारे में प्रावधान करता है। सेक्शन 4 ऐसे बुक्स, पम्फ्लेट्स, आदि के प्रकाशन एवं डाक द्वारा भेजने के बारे में प्रतिबंध लगाता है।
पर इसके कुछ अपवाद भी हैं जिन्हें इसी सेक्शन के परंतुक में दिया गया है।
1. पब्लिक गुड में होने के आधार पर इसे इन आधारों पर न्यायसंगत किया जा सके
(1) विज्ञान के हित में हो
(2) साहित्य के हित में हो;
(3) कला (आर्ट) के हित में हो;
(4) शिक्षा के लिए हो
(5) सामान्य लाभ के लिए हो;
2. धार्मिक उद्देश्य से सद्भाव से प्रदर्शित किया जाय;
3. किसी प्राचीन स्मारक, मंदिर, देव प्रतिमा को ले जाने वाले वाहन आदि पर प्रदर्शित मूर्ति, उत्खनित आकृति, पेंटिंग, आदि इस सेक्शन का अपवाद है, इस पर कोई अपराध नहीं बनेगा। जैसे अजंता-एलोरा, कोणार्क, खजुराहो आदि मंदिर या उसकी मूर्तियों का प्रदर्शन
4. वैसे माध्यम जिन पर Cinematograph Act, 1952, लागू होता है। कारण यह है यह फिल्मों के लिए बनाया गया विशेष कानून है।
IRWP एक्ट के अनुसार जांच एजेंसियों या अधिकारियों कि शक्तियाँ क्या हैं?
सेक्शन 5 इस विषय में प्रावधान करता है।
सेक्शन 5 के अनुसार राज्य सरकार द्वारा अधिकृत राजपत्रित अधिकारी (authorized gazette officer) अपने अंदर आने वाले क्षेत्र में सर्च कर सकता है। बशर्ते (1) उसे विश्वास करने का कारण हो कि वहाँ ऐसा अपराध किया जा रहा है, या किया गया है (2) किसी युक्तियुक्त समय (reasonable time) पर (3) जिन्हें जरूरी समझे वैसे सहायता (assistance) लेकर उस स्थान पर प्रवेश कर सकता और तलाशी ले सकता है। लेकिन इसी सेक्शन का परंतुक (proviso) यह अपवाद लगाtता है कि किसी निजी आवास पर बिना वारंट के प्रवेश नहीं करेगा।
ऐसी किसी भी सामाग्री को, जो कि इस एक्ट के तहत अपराध की श्रेणी में आता है, जैसे विज्ञापन, किताबें, पेपर, फिल्म, पेंटिंग, फोटोग्राफ इत्यादि को सीज कर सकता है अगर उसे विश्वास करने का कारण हो कि ये सामग्री इस कानून के विरुद्ध है;
अगर उसे कोई रजिस्टर, दस्तावेज़ और अन्य कोई ऐसी सामाग्री यहाँ मिले जिसे उसे लगे कि (reason to be believe) अपराध को साबित करने में ये सबूत के रूप में ये काम आ सकते हैं, तो उसे कब्जे में ले सकता है।
सेक्शन 5 का सब सेक्शन (2) सीजर के लिए कोई अलग से प्रावधान नहीं करता, केवल यह कहता है कि सर्च और सीजर के लिए जहां तक संभव हो सके सीआरपीसी के सेक्शन 94 में जो प्रक्रिया दिया गया है, वह यहाँ भी लागू होगा। अब सीआरपीसी के जगह बीएनएसएस आ गया है।
इसका सब सेक्शन कहता है कि इस सेक्शन के तहत जो भी सीजर हो, उसे जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी नजदीकी मजिस्ट्रेट को इन्फॉर्म करेगा फिर मजिस्ट्रेट के ऑर्डर से इसे वह अधिकारी कस्टडि में रखेगा।
सेक्शन 5 के परंतुक के अनुसार निजी आवास पर वारंट के बाद ही तलाशी लिया जा सकता है। पब्लिक आवास जैसे होटल, गेस्ट हाउस आदि में बिना वारंट के भी तलाशी लिया जा सकता है।
विज्ञापन और पुस्तकों के जरिए महिला के अभद्र चित्रण करने वालों के लिए सजा का क्या प्रावधान है?
एक्ट का सेक्शन 6 सजा का प्रावधान करता है। सजा को दो वर्गों में रखा गया है: पहली बार अपराध करने पर और दूसरी या अधिक बार अपराध करने पर।
अगर अपराध पहली बार किया गया है तब सजा 2 साल तक का कारावास और जुर्माना लगाया जा सकता है। जुर्माना 2000 तक हो सकता है।
अगर दुबारा या अधिक बार अपराध किया गया हो तब सजा कम से कम 6 महीने और अधिक से अधिक 5 वर्ष हो सकता है। जुर्माना कम से कम 10,000 और अधिक से अधिक 1 लाख हो सकता है।
इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया हो तब क्या होता है?
कंपनी की तरफ से अगर इस तरह का अपराध किया जाता है तब वैसे सभी व्यक्ति जो उस समय उस कंपनी के कार्यों के लिए ज़िम्मेदारी वाले पद पर हो, जैसे निदेशक (director), सचिव (secretary), प्रबन्धक (manager) आदि को अपराधी माना जाएगा। ऐसे अधिकारी अपने को बचाने के लिए केवल दो बचाव ले सकते हैं:
(1) कंपनी द्वारा जो अपराध हुआ है, उसकी जानकारी उसे नहीं थी; और
(2) ऐसे अपराध को रोकने के लिए उसने वैसे सभी प्रयास किए थे जो सम्यक तत्परता (due diligence) से किया जा सकता था।
अगर अधिकारी ने लापरवाही से, या उपेक्षा से कार्य किया अथवा जानते हुए भी चुप रहा हालांकि इस अपराध में उसने कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाया था, फिर भी उसे दंडित किया जा सकता है।
इस अधिनियम के अपराध की प्रकृति क्या होती है?
सेक्शन 8 कहता है कि इस एक्ट के तहत अपराध संज्ञेय (cognizable) और जमानतीय (bailable) हैं। इसका अर्थ हुआ कि अगर कोई अपराध इस एक्ट के तहत होता है तब कोर्ट संज्ञान लेकर इस पर केस चला सकता है। पर अपराधी को ट्रायल के दौरान जेल नहीं जाना पड़ेगा। क्योंकि जमानतीय अपराध में पुलिस स्टेशन में ही पुलिस द्वारा जमानत मिल जाएगा।
महिलाओं के अशिष्ट चित्रण पर नियम कौन बना सकता है?
इस एक्ट के तहत नियम (rule) बनाने की शक्ति केंद्र सरकार के पास है। हालांकि कार्यान्वयन करवाने और अधिकारी नियुक्त करने आदि की शक्ति राज्य सरकार के पास है।
IRWP एक्ट में परिवर्तन क्यों जरूरी है?

1986 में जब यह एक्ट बना था तब से अभी तक तकनीकी और लोगों की मानसिकता में बहुत परिवर्तन आ गया है। सोशल मीडिया पर रील आदि के द्वारा फैलने वाले अश्लीलता के लिए इसमें कोई प्रावधान नहीं है।
इंटरनेट पर सामाग्री इतने ज्यादा अपलोड होते हैं कि इन पर नजर रखना बहुत ही कठिन है। सिनेमेटोग्राफी एक्ट ओटीटी, यू ट्यूब आदि प्लेटफॉर्म पर लागू नहीं होते हैं। ऐसे में अभी तक इन सबको सूचना प्रौधौगिकी कानून के अनुसार ही निपटारा किया जाता है।
दूसरी बात यह है कि अगर स्त्री स्वयं अपनी मर्जी से अपना अश्लील वीडियो, ऑडियो या फोटो आदि प्रकाशित इंटरनेट के माध्यम से या अन्य तरीके से प्रकाशित करती है, तब उसे इस वर्ग में रखा जाएगा, पीड़ित, अपराधी या सह अपराधी।
इंटरनेट ने देशों की सीमाओं को भी बहुत व्यापक कर दिया है। हो सकता है ऐसे अश्लील सामग्री किसी दूसरे देशों से आया हुआ हो सकता है।
नई तकनीकों के अनुरूप बनाने के लिए इस कानून में संशोधन की जरूरत बहुत वर्षों से महसूस की जा रही है। 2013 और 2018 में संशोधन के लिए बिल भी लाया गया है। पर अभी तक कोई मजबूत कानून नहीं बनाया जा सका है।
अश्लीलता संबंधी कानून बनाने के लिए क्या समस्याएँ हैं?
नए तकनीक ने अश्लील सामग्री के बनाने, प्रकाशित करने और प्रचार करने के लिए लोगों को बहुत ही सक्षम कर दिया है। कोई भी, कभी भी, कहीं से अपने मोबाइल से कोई सामग्री अपलोड कर सकता है। ऐसे में उन पर व्यावहारिक रूप से कितना रखा जा सकता है। साथ ही यह भी समस्या है कि अश्लीलता पर हर किसी का अपना नजरिया होता है, किसी को कोई सामग्री अश्लील लग सकता है किसी को नहीं। हाल में ही मलयालम भाषा की एक पत्रिका (गृहलक्ष्मी) के कवर पर एक मॉडल का अपने बच्चे को दूध पिलाने का फोटो ऐसे ही एक विवाद का कारण बना। किसी को दूध पिलाना मातृत्व का रूप लग रहा है, किसी को अश्लील। केरल हाई कोर्ट ने इसे अश्लील नहीं माना। रणवीर इलाहाबादिया और समय रैना जैसे कई केस हाल में विवादों में रहे हैं।
अश्लीलता के नाम पर किसी की रचना को रोकना अभिव्यक्ति की आजादी का प्रश्न भी खड़ा करेगा। अगर कोई सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री अपलोड कर उससे पैसे कमाता है तो फिर व्यवसाय करने के सांवैधानिक अधिकार का भी प्रश्न होगा।
वास्तव में जो चीजें मनुष्य के व्यक्तिगत भाव से नियंत्रित (subjective) होता है, उसके लिए कानून बहुत अधिक प्रभावी नहीं हो सकता। सरकार अगर ज्यादा रोकेगी तो विवाद भी हो सकता है। इस कानून का दुरुपयोग भी हो सकता है। ऐसे लोगों पर मुकदमा चलाने से कोर्ट पर और भी बोझ बढ़ेगा जो कि पहले से ही केस के अधिक भार से दवाब में है।
यह भी अनुभव रहा है कि अगर किसी सामग्री को प्रतिबंधित किया जाता है तो जनता में उसके बारे में और उत्सुकता बढ़ जाती है और उसका प्रसार बढ़ जाता है।
निष्कर्ष
अश्लीलता का प्रश्न सार्वजनिक नैतिकता, अभिव्यक्ति की आजादी, व्यवसाय की आजादी और निजता का अधिकार इस तीनों में सूक्ष्म संतुलन का है। यह सच है कि इस विषय को अनियंत्रित भी नहीं छोड़ा जा सकता है। पर इस बारे में कई व्यवहारिक और तकनीकी समस्याएँ हैं। इसका सबसे प्रभावी समाधान यही हो सकता है कि जनता अपने स्तर पर ऐसी सामग्रियों का बहिष्कार करें, तकनीकी रूप से अधिक नियंत्रण हो। एक अधिक व्यापक कानून की जरूरत है जो अधिक व्यवहारिक और प्रभावी रूप से ऐसे समग्रियों पर नियंत्रण लगा सके और सभी अधिकारों में संतुलन बनाए रख सके।


11 thoughts on “अश्लीलता रोकने से संबन्धित देश में क्या कानूनी प्रावधान हैं?”
I like the helpful info you provide in your articles.
I will bookmark your weblog and check again here regularly.
I’m quite certain I’ll learn many new stuff right here!
Best of luck for the next!
When someone writes an piece of writing he/she maintains the image of a user in his/her mind that
how a user can understand it. So that’s why this post is amazing.
Thanks!
Получите бесплатную юридическую консультацию прямо в Telegram. Переходите по запросу чат бот юридической консультации круглосуточно – Сервис поможет быстро задать вопрос юристу, описать ситуацию и получить правовую помощь онлайн или по телефону без регистрации из любого региона. Удобный формат для консультаций по семейным, жилищным, трудовым, наследственным, имущественным и другим юридическим вопросам.
When someone writes an paragraph he/she keeps the plan of a
user in his/her mind that how a user can understand it.
Thus that’s why this post is amazing. Thanks!
native-australia-casinos-new-mexico
my blog spins – Morris,
la casino
?
Ла Казино личный кабинет доступен после авторизации на рабочей странице. Найти актуальный адрес можно через официальный Telegram.
казино ля
?
La Casino промокоды и бонусные предложения стоит проверять на актуальном сайте проекта. Рабочая ссылка на него публикуется в Telegram.
Hello, yeah this post is truly nice and I have learned lot of things from it regarding blogging.
thanks.
portalisrael
Discover more about oral care at prodentim reviews and see what makes it stand out.
Many people prefer reliable explanations before making any choice about a wellness-related product or service.
## Section 2
The key advantage of a site like this is its ability to gather information in one place.
## Section 3
A site that stays free of confusion can create a better impression on attentive readers.
## Section 4
That is why a site with a focused approach can stay relevant and useful.
I’m not sure exactly why but this website is loading incredibly slow for me.
Is anyone else having this problem or is it a issue on my end?
I’ll check back later on and see if the problem still exists.