हिन्दू फैमिली लॉ

भारत में दहेज निरोधक कानून

दहेज निरोधक कानून द्वारा पहली बार दहेज लेना और देना दोनों गैर कानूनी घोषित किया गया। फिर भी दहेज संबंधी मृत्यु और उत्पीड़न मे वृद्धि हुई। इस कारण 1985 ई में इस अधिनियम संशोधन किया गया। दहेज निरोधक कानून में इस संसोधन द्वारा जो नए प्रावधान जोड़े गए उनमे सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वर और वधू

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घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 (Domestic Violence Act, 2005)

             शारीरिक हिंसा यानि मारपीट समाज द्वारा हमेशा से सामान्यतः अपराध माना जाता रहा है, लेकिन फिर भी इस तरह की हिंसा घरों के अंदर भी होती रही है जिसकी शिकार सामान्यतः महिलाएं ही होती रही हैं। आस-पड़ोस के लोग इसे दूसरे का घरेलू मामला मान कर सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं

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खर्चा पाने का अधिकार (Maintanance)

खर्चा पाने का अधिकार क्या है? एक सभ्य समाज एक व्यस्क, स्वस्थ और सक्षम पुरुष से यह अपेक्षा करता है वह अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता का भरण पोषण करें । इस अपेक्षा को कानून भी मान्यता देता है। वर्तमान में चूंकि महिलाएं भी उपार्जन करने लगी हैं इसलिए कुछ स्थितियों को उनका भी दायित्व

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भरण-पोषण एवं निर्वाहिका (Maintencence and alimony)

भरण-पोषण कुटुम्ब विधि (Family Law) में भरण-पोषण (Maintenance) का आशय ऐसे व्यय से है जो किसी व्यक्ति के भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और चिकित्सा जैसे आवश्यक खर्चों के लिए दिया जाता है। भरण-पोषण लेने का अधिकार और देने का दायित्व दोनों पक्षों के बीच के विधिक संबंध से उत्पन्न होता है। प्रचीन हिन्दू विधि में

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हिन्दू दत्तक एवं पालन-पोषण अधिनियम, 1956 (Hindu Adoption & Maintanance Act)

दत्तक (Adoption) हिन्दू धर्म में पितृ ऋण से मुक्ति और वंश को कायम रखने के लिए पुत्र को बहुत महत्व दिया गया है। पुत्र के इसी धार्मिक एवं लौकिक महत्व के कारण प्राचीन हिन्दू विधि में पुत्रहीन व्यक्ति को पुत्र गोद लेने (दत्तक ग्रहण) का अधिकार दिया गया था। हिन्दू विधि शास्त्रियों ने दत्तक के

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विवाह-विच्छेद (Dissolution of marriage or divorce)- केस लॉ

महत्त्वपूर्ण मुकदमें (Case Laws) डॉ एन जी दास्ताने वर्सेस श्रीमती एस दास्ताने (AIR 1975 SC 1534) इस केस में मानसिक क्रूरता और ऐसे क्रूरता को साबित करने के लिए सबूतों पर विस्तार से विचार किया गया था। इसमें पत्नी पति और उसके रिश्तेदारों पर झूठे लांछन लगाती, दोष मढ़ती और भला-बुरा कहती रहती थी। वह

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विवाह-विच्छेद ((Dissolution of marriage or divorce) धारा 13-18

विवाह-विच्छेद (divorce) के लिए आधार- पति और पत्नी दोनों को प्राप्त आधार [धारा 13 (i)]- 1. जारता, 2. क्रूरता, 3. अभित्यजन, 4. धर्म परिवर्तन, 5. मानसिक विकृत्तता, 6. कोढ़, 7. यौन रोग, 8. संसार परित्याग, 9. सात वर्ष से लापता होना, 10. न्यायिक पृथक्करण के बाद एक वर्ष या अधिक कालावधि तक सहवास न होना

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शून्य और शून्यकरणीय विवाह (Void and voidable marriage)

शून्य एवं प्रभावहीन विवाह (void and null marriage) विवाह शून्य एवं प्रभावहीन कब होता है अर्थात् विवाह शून्य होने के आधार क्या हैं- धारा 11 के अनुसार, निम्नलिखित स्थिति में विवाह शून्य एवं प्रभावहीन होगा- 1. विवाह 1976 के अधिनियम हिन्दू विवाह (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 का अधिनियम 68), (लागू होने की तिथि 27.05.1976) लागू

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न्यायिक पृथक्करण (Judicaial Saperation) धारा 10 और 13 (1A)

विवाह का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह होता है कि विवाह के दोनों पक्ष मिल कर दाम्पत्य अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन करें जिसका अर्थ है दोनों साथ रहें। यह साहचर्य विवाह की अवधारणा में ही सम्मिलित है। लेकिन कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं जब दोनों साथ रहना नहीं चाहें। ऐसी स्थिति में

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दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन (Restitution of Conjugal Rights) धारा 9

दाम्पत्य अधिकारों की प्रस्थापना वैवाहिक विधि का एक अत्यंत विवादित अनुतोष है। विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि क्या किसी व्यक्ति को उसकी मर्जी के विरूद्ध किसी अन्य व्यक्ति, जो भले ही उसका पति या पत्नी ही क्यों न हो, के साथ रहने और संभोग के लिए बाध्य करना अमानवीय, क्रूर और अपमानजनक नहीं

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