आपराधिक षड्यन्त्र-अध्याय 5क
यह अध्याय आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 1913 द्वारा अस्तित्व में आया। यह भारतीय अपराध विधि में एक नए अपराध “आपराधिक षड्यंत्र” का सृजन करता है।
इस धारा के अन्तर्गत अपराध गठित होने के लिए इन तीन शर्तों की उपस्थिति अनिवार्य है –
1. दो या अधिक व्यक्ति हो
2. उनमें सहमति या समझौता हो
3. यह समझौता-
(i) या तो किसी अवैध कार्य को करने या करवाने के लिए हो, या फिर
(ii) ऐसे कार्य को अवैध साधनों द्वारा करने के लिए हो, जो स्वयं में अवैध न हो।
चूँकि किसी अपराध को करने के लिए केवल आशय रखना या केवल योजना बनाना ही सामान्यतः दण्डनीय नहीं होता है, जब तक कि उस आशयित कार्य कि दिशा में कोई कार्य न कर दिया जाय। लेकिन आपराधिक षड्यंत्र के मामले में यदि किसी आशय के अनुसरण में एक से अधिक व्यक्ति कोई कार्य करने के लिए सहमत होते हैं या योजना बनाते हैं, तो यह ‘सहमति’ दण्डनीय हो जाता है। सहमति के अनुसरण में किसी कार्य का होना आवश्यक नहीं है। सहमति केवल निष्क्रिय ज्ञान या आशय से अधिक होता है। अर्थात् किसी योजना का ज्ञान रखना अथवा किसी अवैध कार्य का आशय रखना मात्र आपराधिक षड्यंत्र नहीं होता है। यह सहमति धारा 120ख द्वारा दण्डनीय होगा।

स्पष्टतः अवैध कार्य या किसी वैध कार्य को अवैध साधनों द्वारा करने के लिए सहमति ही आपराधिक षड्यंत्र है। लेकिन व्यवहारिक रूप से इसे साबित करना कठिन होता है। इसे परिस्थितियाँ और अभियुक्त के आचरण से ही जाना जा सकता है। सहमति साबित करने के लिए न तो प्रत्यक्ष विचार-विमर्श या प्रत्यक्ष संपर्क सिद्ध करने की जरूरत होती है। यह भी आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक षड्यंत्रकारी को योजना की सभी बातों की पूर्ण जानकारी हो। किसी कार्य को करने का करार आपराधिक षड्यंत्र का मूल तत्व है। आपराधिक षड्यंत्र का प्रत्यक्ष साक्ष्य यदाकदा ही मिलता है। यह घटना के पूर्व और बाद की परिस्थितियों के आधार पर सिद्ध किया जाता है। सिद्ध परिस्थितियों को यह स्पष्ट दर्शाना चाहिए कि वे एक करार के अग्रसरण में कारित की गयी है। (सेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन, हैदराबाद बनाम नारायण राव) [(2010) IV Cri LJ 4610 (SC)]
चूँकि किसी अवैध कार्य को करने के लिए दो या अधिक व्यक्तियों की सहमति से ही आपराधिक षड्यंत्र का गठित होता है। इसलिए इसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि इसके अनुसरण में कोई कार्य किया जाय। अतः कोई कार्य, जिसके लिए षड्यंत्र किया गया था, अगर नहीं हो फिर भी षड्यंत्र दण्डनीय होगा। उदाहरण के लिए क, ख और ग आपस में सहमत होते हैं कि घ को ङ के घर में आग लगाने के लिए तैयार करेंगे। उनके दुष्प्रेरण के फलस्वरूप घ आग लगाने के लिए तैयार हो जाता है और इस कार्य के लिए निकल पड़ता है लेकिन उसका विचार बदल जाता है और वह आग नहीं लगाता है। ऐसी स्थिति में यद्यपि घ किसी अपराध का दोषी नहीं होगा लेकिन क, ख और ग आपराधिक षड्यंत्र के लिए दण्डनीय होंगे क्योंकि उन्होंने अवैध कार्य के लिए सहमति और उसके अनुसार घ को दुष्प्रेरित करने का अपराध कर दिया था और उनका यह कार्य षड्यंत्रित कार्य से स्वतंत्र अपने आप में एक सारभूत अपराध है।
सारभूत अपराध होने के कारण आपराधिक षड्यंत्र के लिए किसी व्यक्ति कपर अलग से आरोप लगाया जा सकता है अर्थात् उस पर षड्यंत्र तथा अपराध दोनों का आरोप लगाया जा सकता है। धारा 109 और धारा 120क द्वारा सृजित अपराध बिल्कुल अलग है तथा जबकि अपराध षड्यंत्र के अनुसरण में अनेक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तब यह सामान्य नियम है कि उन पर उस अपराध तथा उस अपराध के षड्यंत्र दोनों का आरोप लगाया जाता है। (भारतीय दण्ड संहिता, प्रो सूर्य नारायण मिश्र, पृष्ठ 270)
आपराधिक षड्यंत्र के अपराध का समापन तीन परिस्थितियों में से हो सकता है। पहला, वह कार्यान्वित हो जाय। दूसरा स्वेच्छा या आवश्यकतावश इसका त्याग कर दिया जाय। और तीसरा, यह असफल हो जाय। यदि ऐसा नहीं होता है तो यह चलता रहता है क्योंकि यह घटना नहीं बल्कि एक प्रक्रिया होता है। इसलिए यह एक निरन्तर अपराध है।
महत्वपूर्ण मुकदमें-
संजय दत्त बनाम महाराष्ट्र राज्य
बाबरी मस्जिद
तमिलनाडु राज्य बनाम नलिनी


3 thoughts on “आपराधिक षड्यन्त्र-अध्याय 5क”
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