रेप के अपराधियों की सजा

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जब भी कोई दुष्कृत्य का कोई ऐसा केस होता है जिसे मीडिया में हेडलाइन बनाया जाता है तो सोशल मीडिया में एक सामान्य प्रवृति दिखती है – अपराधियों को फाँसी दो, जिंदा जला दो, नपुंसक कर दो इत्यादि-इत्यादि की भावुक माँग होना। ऐसी माँगें सतही क्रोध का परिणाम होता है। विधि आयोग ने भी ऐसे अपराधियों के लिए मृत्युदण्ड पर विचार करने के बाद इसके विरोध में मत दिया। ऐसे भावुक मत बनाने से पहले इसके पक्ष-विपक्ष के तर्कों को भी एक नजर देख लेना चाहिए।

मृत्युदण्ड के पक्ष में तर्क

  1. यह एक अत्यंत क्रूर और घृणित अपराध है। कोई भी सभ्य समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता। ऐसे अपराधी को समाज में जीवित रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
  • क्रूर दण्ड से अपराधियों में डर होगा। अन्य कोई व्यक्ति अगर ऐसा अपराध करने की सोचेगा तो उसके लिए यह एक उदाहरण होगा और वह ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा।

मृत्युदण्ड के विरोध में तर्क

  1. यह सत्य है कि यह एक घृणित अपराध है और अपराधी को सजा मिलनी चाहिए। लेकिन इंसान द्वारा स्थापित कोई भी व्यवस्था पूर्णतः गलती रहित नहीं हो सकती है। कोर्ट से भी गलती हो सकती है। ऐसे में अगर किसी अपराधी को मृत्यु दण्ड दे दिया जाय और बाद में पता चले कि वह निरपराध था तो इसकी क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती है। इसलिए मृत्युदण्ड उचित नहीं है।
  • अनुभव बताते हैं कि क्रूर दण्ड अपराध रोकने में सफल नहीं होते हैं। क्रूर हत्या के लिए अपने देश में भी मृत्युदण्ड का प्रावधान है। फिर भी हत्या का अपराध रोका नहीं जा सका है। अमेरिका जैसे देश जहाँ मृत्युदण्ड का औसत अधिक हैं वहाँ का अनुभव भी यही है कि क्रूर दण्ड अपराध रोकने में सफल नहीं हो सके हैं। ऐसा देखा गया है कि अपराधी अपराध करने से पहले उसकी सजा के विषय में अधिक नहीं सोचता बल्कि सामान्यतः वह यह मान कर चलता है कि वह पकड़ा ही नहीं जाएगा। 
  • अगर हत्या और दुष्कर्म – दोनों के लिए मृत्युदण्ड ही हो तो अपराधियों में साक्ष्य छुपाने के लिए पीड़िता को मार डालने की प्रवृति बढ़ेगी।
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विश्लेषण

वास्तव में जो लोग ऐसे अपराधियों के लिए क्रूर दण्ड की माँग करते हैं उनके दिमाग में कोलकाता हॉस्पिटल केस, निर्भया या कठुआ जैसे क्रूर केस की तस्वीरें होती हैं। जहाँ अपराधियों ने बहुत ही क्रूरता से दुष्कर्म दिया हो। लेकिन अगर पुलिस और कोर्ट आदि के रिकॉर्ड देखें तो बहुत से ऐसे केस होते हैं जिनकी प्रवृति इन से अलग होती है। कुछ उदाहरण:

  1. अगर कोई लड़का और लड़की एक दूसरे से प्रेम करते है और शादी करना चाहते हैं। दोनों में सहमति से संबंध बनता है। लेकिन बाद में किसी कारण से लड़का शादी नहीं करना चाहता है। तो इसे भी तकनीकी रूप से “रेप” की श्रेणी में रखा जाता है जिसे मीडिया में “शादी का झांसा देकर रेप” कहा जाता है।
    1. अगर कोई नाबालिग लड़की किसी से प्रेम करती है और सहमति से संबंध बनता है तो कानूनी दृष्टि से वह भी “रेप” की परिभाषा में आता है क्योंकि नाबालिग की सहमति सहमति नहीं होती है।
    1. विधिक रूप से विवाहित दंपत्ति में अगर पत्नी की आयु 15 वर्ष से कम हो, और पति उससे संबंध बनाए तो वह भी इस परिभाषा में आ सकता है।
    1. कोई बालिग दंपत्ति अगर न्यायिक पृथक्करण में रह रहे हों। इस दौरान पति स्वयं अपनी पत्नी से भी संबंध बनाए तो उसे इसी श्रेणी में रखा जा जाएगा।

विधिक रूप से उपरोक्त स्थितियों में भी “रेप” का अपराध होता है। अगर सभी अपराधियों के लिए एक ही जैसे क्रूर दण्ड की व्यवस्था हो जाए तो क्या यह उचित होगा कि किसी इन्हें भी वही क्रूर दण्ड दिया जाय जो निर्भया जैसे क्रूर अपराध के दोषियों के लिए हो?   

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यह एक विशेष प्रकार का अपराध दो कारणों से है: पहला, अन्य अपराधों के विपरीत कार्य नहीं, बल्कि दूसरे/पीड़ित पक्ष की सहमति का होना या न होना इसे अपराध बनाता है। कई बार सहमति का तत्व अधिक स्पष्ट नहीं होता है। कई बार स्थिति ऐसी हो सकती है जिससे मेडिकल रूप से अपराध की पुष्टि नहीं हो सकती है। दूसरा, यह अपराध ऐसे कृत्य से जुड़ा होता है जो सामान्य रूप से सार्वजनिक रूप से नहीं किए जाते हैं। यही कारण है कि ऐसे अपराधों को साबित करने में गलती की संभावना अन्य अपराधों की तुलना में अधिक होती है।

जिस अपराध के लिए जितना अधिक कठोर दण्ड होता है, उतना ही अधिक उसे साबित करने के लिए पुख्ता सबूतों की जरूरत होती है। क्रिमिनल लॉ में “संदेह से परे (beyond reasonable doubt)” साबित करने की जरूरत इसीलिए होती है। इसीलिए ऐसे केस में अपराधियों के छूटने की दर भी अधिक होता है। अपरधियों को क्रूर दण्ड देने से अधिक आवश्यक यह है कि अपराधियों को दण्ड मिले। उदाहरण के लिए “दहेज मृत्यु” को ले सकते हैं। हत्या साबित करना कठिन होता है। विशेषकर जब अपराधी और पीड़ित दोनों एक ही घर में रहते हों।

 दहेज हत्या की केस में यह देखा गया कि पुलिस तक सूचना पहुँचने से पहले ही साक्ष्य मिटा दिए जाते थे। ऐसे में अपराध साबित करना कठिन हो जाता था। इसिलिए आईपीसी में संशोधन कर “दहेज मृत्यु” का एक नया अपराध सृजित किया गया। जिसे साबित करने की शर्तें सामान्य हत्या की तुलना में कम कठोर रखी गई। वर्तमान में यौन अपराधों के लिए पीड़ित के बयान को बहुत महत्व दिया जाता है। लेकिन अगर अधिक कठोर दण्ड की व्यवस्था की जाएगी तो अपराध को “संदेह से परे” साबित करना कठिन हो जाएगा और अपराधी बिल्कुल ही बच निकलेंगे। विशेषकर अगर पीड़िता विवाहित हो, बालिग हो, शिकायत घटना के कुछ समय बाद की गई हो, या पीड़िता के शरीर पर प्रतिरोध का किसी तरह का कोई निशान नहीं हो, रक्तस्राव या किसी अन्य कारण से स्पर्म नहीं मिल सके इत्यादि स्थितियों में अपराध साबित नहीं हो पाएगा। अगर केवल बयान के आधार पर ही सजा दे दी जाय तो इससे इस कानून के दुरुपयोग की संभावना बहुत अधिक होगा।

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2013 और 2018 में आपराधिक विधि में संशोधन कर कुछ स्थितियों में ऐसे अपराधों के लिए मृत्युदण्ड का भी प्रावधान किया गया है। नए लागू भारतीय न्याय संहिता में भी यह प्रावधान है। जैसे, सामूहिक रूप से ऐसे अपराध करना, पीड़ित की हत्या कर देना या उसे स्थायी रूप से विकलांग कर देना, नाबालिग बच्ची से ऐसे अपराध करना आदि। फिर भी स्थिति में कोई बहुत परिवर्तन नहीं आया है। वास्तव में दण्ड की कठोरता से अधिक प्रभावी यह होगा कि अपराधियों को जल्दी और सुनिश्चित रूप से दण्ड मिले।              

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