भारतीय दंड संहिता, जिसे अंग्रेजी में Indian Penal Code (IPC) और संक्षेप में आईपीसी कहा जाता है, भारत की मूल सारभूत आपराधिक विधि (Substantive Criminal Law) है। सारभूत आपराधिक विधि का अर्थ होता है ऐसा कानून जो यह निर्धारित करता है कि कौन-सा कार्य अपराध होगा, कौन-सा कार्य दंडनीय है और उस अपराध के लिए क्या दंड दिया जाएगा।

दूसरे शब्दों में, यह किसी अपराध को परिभाषित करता है। उदाहरण के लिए, यह बताता है कि चोरी क्या है और इसके लिए क्या दंड मिलेगा। हालांकि, यह यह नहीं बताता कि दंड देने की प्रक्रिया क्या होगी; प्रक्रिया से जुड़े नियम प्रक्रियागत कानून (Procedural Law) के तहत आते हैं। इसीलिए सारभूत कानून, प्रक्रियागत कानून से मौलिक रूप से भिन्न होता है।
आईपीसी में कुल कितनी धाराएँ हैं?
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में कुल 23 अध्याय (Chapters) और 511 धाराएँ (Sections) हैं। विभिन्न संशोधनों के माध्यम से इसमें समय-समय पर लगभग 27 नई धाराएँ और जोड़ी गई हैं। चूंकि नई धाराओं को पुरानी धाराओं के साथ ए, बी, सी, डी (A, B, C, D) आदि के रूप में जोड़ा गया है, इसलिए धाराओं की कुल मूल संख्या अभी भी 511 ही है।
भारतीय दंड संहिता में संशोधन
आईपीसी को लागू हुए करीब 160 वर्ष हो चुके हैं। बदलते समय की जरूरतों के अनुकूल इसे बनाए रखने के लिए इसमें अब तक कई संशोधन हो चुके हैं।
- द क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2013: निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा की बढ़ती मांग के मद्देनजर यह संशोधन किया गया था, जिसका उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की परिभाषा को विस्तृत करना और दंड को कठोर बनाना था।
- द क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2018: कठुआ और उन्नाव जैसे क्रूर मामलों के बाद आपराधिक कानून में पुनः संशोधन की आवश्यकता महसूस हुई। यह 21 अप्रैल को अध्यादेश के रूप में और 6 अगस्त को संसद द्वारा अधिनियम के रूप में पारित हुआ तथा राष्ट्रपति की सहमति के बाद यह 77वाँ संशोधन बना।
आईपीसी के लागू होने की तिथि

यह संहिता 6 अक्टूबर 1860 को पारित हुई (1860 का अधिनियम संख्यांक 45 के रूप में) और 1 जनवरी 1862 को लागू हुई। शुरुआत में यह उस समय के ब्रिटिश भारत में लागू हुई थी। भारतीय रियासतें (Princely States) इसमें बहुत बाद में, 1940 के दशक में शामिल हुईं।
गोवा, दमन और दीव स्वतंत्रता के बाद भारत का अंग बने, इसलिए वहाँ यह 1 अक्टूबर 1963 को लागू हुई। कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत था, लेकिन वहाँ यह अन्य रियासतों से पहले लागू हुआ था। प्रसिद्ध डोगरा शासक रणबीर सिंह (1830-1885) के समय वहाँ रणबीर दंड संहिता (Ranbir Penal Code – RPC) लागू की गई थी। 2019 तक वहाँ आरपीसी, 1989 लागू थी, लेकिन अब वहाँ भी आईपीसी लागू है।
आईपीसी का निर्माण और मैकाले का योगदान

आईपीसी का पहला प्रारूप प्रथम विधि आयोग (First Law Commission) द्वारा तैयार किया गया था। यह आयोग 1833 के चार्टर एक्ट के तहत 1834 में गठित हुआ था और इसके अध्यक्ष थॉमस बैबिंगटन मैकाले (Thomas Babington Macaulay) थे। इसलिए मैकाले को इस कोड का जन्मदाता माना जाता है, हालांकि न तो उन्होंने इसे पूरा किया और न ही उनके जीवनकाल में यह पारित हो सका।
मैकाले द्वारा तैयार ड्राफ्ट 1837 में गवर्नर-जनरल को सौंपा गया था। सर बार्नस पीकॉक (Barnes Peacock) ने इस ड्राफ्ट का अंतिम रिवीजन किया था। विधि आयोग की सिफारिशों की समीक्षा कर इसे अंतिम रूप देने में सर पीकॉक के अलावा सर जे.डब्ल्यू. कोलविले तथा इलियट जैसे विधिशास्त्रियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। यह ड्राफ्ट 1850 में पूरा होकर लेजिस्लेटिव असेंबली के समक्ष प्रस्तुत किया गया, लेकिन 1857 के विद्रोह के कारण यह 1860 में पारित हो सका। इससे पहले ही 1856 में मैकाले का निधन हो चुका था।

यह संहिता थोड़े-बहुत संशोधनों के साथ भारत के संपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र के अलावा अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों (जैसे पाकिस्तान पीनल कोड, सिंगापुर पीनल कोड आदि) में भी लागू हुई और आज भी वहाँ प्रचलन में है।
भारतीय दंड संहिता की पृष्ठभूमि
संहिता (Code) का शाब्दिक अर्थ होता है “संहतित” यानी एकत्रित किया हुआ। उस समय देश में विभिन्न प्रकार की आपराधिक विधियाँ लागू थीं। हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय अपनी-अपनी व्यक्तिगत विधियों (Personal Laws) से शासित होते थे। ऐसे में भिन्न धार्मिक समुदायों से जुड़े आपराधिक मामलों में यह कठिनाई आती थी कि कौन-सी विधि लागू की जाए। कानूनों में क्षेत्रीय आधार पर भी बहुत भिन्नताएँ थीं।
अतः एक ऐसे सामान्य कानून (Common Law) की आवश्यकता महसूस की गई जो धर्मनिरपेक्ष रूप से समस्त देश में लागू हो। इसी उद्देश्य से बंबई प्रेसीडेंसी के गवर्नर एलफिंस्टन के निर्देशन में एलफिंस्टन कोड तैयार किया गया था। यद्यपि उसमें मात्र 44 धाराएँ थीं, किंतु वह देश की पहली दंड संहिता थी। ऐसे ही प्रयासों का परिणाम अंततः भारतीय दंड संहिता, 1860 के रूप में सामने आया।
भारतीय दंड संहिता के मुख्य स्रोत
आईपीसी मुख्य रूप से निम्नलिखित चार स्रोतों से प्रभावित थी:
- ब्रिटिश कॉमन लॉ (British Common Law)
- भारतीय न्याय व्यवस्था की आवश्यकताएँ
- नेपोलियन कोड (Napoleonic Code)
- एडवर्ड लिविंगस्टोन का लूसियाना कोड, 1825 (Edward Livingston’s Louisiana Code)
भारतीय दंड संहिता का उद्देश्य
आईपीसी की उद्देशिका (Preamble) में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “भारत के लिए एक साधारण दंड संहिता का उपबंध करना समीचीन है, अतः यह निम्नलिखित रूप में अधिनियमित किया जाता है…”। इसका तात्पर्य यह है कि इसका उद्देश्य कोई नया कानून बनाना नहीं, बल्कि एक सामान्य कानून तैयार करना था।
चूंकि आईपीसी एक सामान्य विधि (General Law) है, इसलिए स्थानीय और विशेष कानूनों को यथावत रखा गया। यदि कोई कार्य आईपीसी और किसी विशेष कानून दोनों के तहत दंडनीय है, तो वह कार्य आईपीसी द्वारा उसी सीमा तक दंडनीय होगा जहाँ तक विशेष प्रावधान नहीं है (चंडी प्रसाद बनाम अब्दुर रहमान, 1894)।है। [चंडी प्रसाद बनाम अब्दुर रहमान, 1894, 22 इलाहाबाद, 131]




