प्राइवेट प्रतिरक्षा (private defence) (धारा 96-106)-part 4.5
परिचय
प्राइवेट-प्रतिरक्षा अर्थात शरीर और संपत्ति की रक्षा व्यक्ति की स्वाभाविक प्रवृति है। इसलिए कानून भी यह अधिकार देता है कि अगर व्यक्ति के
- स्वयं पर या उसके किसी संबंधी या मित्र के शरीर या संपत्ति पर;
- कोई तात्कालिक ख़तरा हो;
- यह ख़तरा गंभीर हो; और
- प्राधिकारी से सहायता लेने का अवसर नहीं हो–
तो इस स्थिति में वह अपनी रक्षा के लिए वह कार्य कर सकता है जो कि अन्यथा अपराध होता। इसे ही प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार कहते हैं। चूँकि यह अधिकार केवल तात्कालिक ख़तरे का प्रतिकार करने के लिए है, इसलिए इस पर कई तरह की सीमाएँ (limitations) भी हैं।
प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार किसी दोषपूर्ण कार्य से स्वयं को या किसी अन्य व्यक्ति का या अपनी सम्पत्ति को बचाने के प्रयास का अधिकार है, दोषकर्ता को सजा देने का नहीं। इसलिए यह अधिकार उस स्थिति में भी है जब दोषकर्ता किसी व्यक्तिगत अक्षमता के कारण दण्डनीय नहीं हो या दुराशय का उस कार्य में अभाव हो।
इसलिए किसी बालक, मत्त, विकृतचित्त या भ्रम के कारण किया जाने वाले कार्य के विरूद्ध भी प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार है, यद्यपि इन्हें करने वाला दुराशय के अभाव में दण्डनीय नहीं होता है। (धारा 98)
धारा 300 का अपवाद 2 प्राइवेट प्रतिरक्षा में किए गए कार्य को हत्या की कोटि से बाहर करता है। अगर वह (मृत्यु कारित करना) प्रतिरक्षा में किया गया है तो कोई अपराध नहीं होगा लेकिन यदि प्रतिरक्षा के अधिकार का अतिक्रमण कर किया गया कार्य आपराधिक मानव वध होगा, हत्या नहीं।
सम्पत्ति के प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उसे है जिसके कब्जे में उस समय वह सम्पत्ति हो, भले ही वह उसका वास्तविक स्वामी नहीं हो या उसके स्वामित्व विधितः नहीं हो।
ब्रिटेन में अपने अतिरिक्त अपने से किसी संबंधित व्यक्ति के शरीर के प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं है जबकि भारत और अमरीका में अन्य किसी व्यक्ति के लिए भी यह अधिकार है।

मानव शरीर के प्रति अपराधों के विरूद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार
मानव शरीर के प्रति अपराध से प्राइवेट प्रतिरक्षा कब हमलावर की मृत्य कारित करने तक हो सकता है?
प्रतिरक्षा का अधिकार हमलावर की मृत्यु कारित करने तक जा सकता है यदि हमले से निम्न में से कोई क्षति होने की युक्तियुक्त आशंका हो (धारा 100):
- मृत्यु;
- घोर उपहति;
- बलात्संग;
- प्रकृति विरुद्ध काम तृप्ति
- व्यपहरण या अपहरण
- सदोष परिरोध
- अम्ल फेंकना
कब प्रतिरक्षा का अधिकार निर्दोष व्यक्ति को अपहानि के जोखिम कारित करने तक होता है?
- जब हमले में मृत्यु की आशंका युक्तियुक्त रूप से हो; और
- निर्दोष व्यक्ति को अपहानि के बिना प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग नही किया जा सकता हो (धारा 106)।
कब प्रतिरक्षा का अधिकार हमलावर की मृत्यु कारित करने को छोड़कर अन्य अपहानि करित करने तक होता है?
- ऐसा कोई भी अपराध जिससे मानव शरीर प्रभावित होता है और यह संहिता उसे अपराध मानता है।
- लेकिन यह अपराध धारा 100 में परिगणित सात अपराधों में नहीं आता है (धारा 97)।
सम्पत्ति प्रति अपराधों के विरूद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार
सम्पत्ति के प्रति अपराध से प्राइवेट प्रतिरक्षा कब हमलावर की मृत्य कारित करने तक हो सकता है?
प्रतिरक्षा का अधिकार हमलावर की मृत्यु कारित करने तक जा सकता है यदि निम्न अपराध या उसके लिए प्रयास हो (धारा 103):
- लूट या लूट का प्रयत्न;
- रात्रौ गृह-भेदन या इसका प्रयत्न;
- अग्नि द्वारा ऐसे स्थान की रिष्टि जो मानव आवास या सम्पत्ति की अभिरक्षा के लिए हो;
- चोरी, रिष्टि या गृह अतिचार ऐसी परिस्थिति में हो जिसमें मृत्यु या घोर उपहति की आशंका हो।
कब सम्पत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार हमलावर की मृत्यु कारित करने को छोड़कर अन्य अपहानि करित करने तक होता है?
- (1) चोरी (2) लूट (3) रिष्टि (4) आपराधिक अतिचार;
- (1) चोरी (2) लूट (3) रिष्टि (4) आपराधिक अतिचार का प्रयत्न;
- लेकिन यह अपराध धारा 103 में परिगणित अपराधों में नहीं आता है। (डकैती लूट का तीव्र रूप है इसलिए इसमें इसका वर्णन नहीं है। लूट में चोरी और उद्दापन दोनों शामिल है।) (धारा 97)
शरीर और सम्पत्ति के प्रतिरक्षा का अधिकार किन सीमाओं के अधीन है अर्थात् इन स्थितियों में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं होता है?
आईपीसी का सेक्शन 99 ऐसे सीमाओं (limitations) के विषय में उपबंध करता है।
लोक सेवक के कार्यों के विरूद्ध प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं होता है, बशर्ते:
- लोक सेवक का वह कार्य सद्भावपूर्वक किया गया हो
- यह कार्य अपने पदीय कर्तव्यों के अनुपालन में समझ कर किया गया हो और यह समझ युक्तियुक्त हो;
- उसके उस कार्य से मृत्यु या घोर उपहति की युक्तियुक्त आशंका नहीं हो;
- उसका लोक सेवक होना ज्ञात हो;
यदि उपर्युक्त तत्व उपस्थित हो तो लोक सेवक के कार्यों के विरूद्ध कोई प्रतिरक्षा नहीं है भले ही उसका कार्य विधि के अनुसार न्यायसंगत नहीं हो या अनियमित हो लेकिन यदि उसका पूरा कार्य उसके क्षेत्राधिकार से बाहर हो या विधिविरूद्ध हो तो प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार होगा (खण्ड 1)
2. लोक सेवक के निर्देश से किया गया कार्य या कार्य करने का प्रयत्न, जबकिः
- वह कार्य ऐसे लोक सेवक के पदाभास (color of his office) में किया गया हो;
- वह कार्य सद्भावपूर्वक हो;
- ऐसे कार्य द्वारा युक्तियुक्त रूप से घोर उपहति या मृत्यु की आशंका न हो;
- यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार हो कि यह कार्य लोक सेवक के निर्देश से किए जा रहें है
(संभव है कि उपर्युक्त कार्य विधि द्वारा न्यायसंगत न ठहराया जाय लेकिन अगर ये चार तत्त्व हो, तो प्रतिरक्षा का अधिकार होगा। (खण्ड 2, स्पष्टीकरण 2)
3. जब लोक प्राधिकारियों से सहायता प्राप्त करने का अवसर हो (खण्ड 3);
4. अपहानि की मात्रा अपनी प्रतिरक्षा के लिए आवश्यकता से बहुत अधिक न हो (खण्ड 4)।
सम्पत्ति की प्रतिरक्षा के अधिकार का आरंभ कब होता है?
जब सम्पत्ति पर संकट की युक्तियुक्त आशंका शुरू होती हैं। (धारा 105)
सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार कब समाप्त होता है?
यह अधिकार निम्न स्थितियों में समाप्त हो जाता हैः
1. चोरी
(1). जब अपराधी सम्पत्ति सहित पहुँच से बाहर हो जाय;
(2). जब लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त हो जाय;
(3). सम्पत्ति पुनः प्राप्त कर ली जाय।
2. लूट
(1) जब अपराध के या उसके प्रयत्न के क्रम में किसी व्यक्ति की मृत्यु, उपहति या सदोष अवरोध का प्रयत्न खत्म हो जाय;
(2) जब तत्काल मृत्यु, तत्काल उपहति या तत्काल वैयक्तिक अवरोध का भय खत्म हो जाय;
3.आपराधिक अतिचार और रिष्टि
जब आपराधिक अतिचार या रिष्टि खत्म हो जाय
4.रात्रौ गृहभेदन
जब गृहभेदन से हुआ अतिचार खत्म हो जाय अर्थात् अपराधी वहाँ से निकल जाय।
Case law
स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश वर्सेस रामस्वरुप (1974) 4 SCC 764: AIR 1974 SC 1570
गंगाराम को बदायूँ के म्यूनिसिपल बोर्ड से सब्जी बाजार के तहबाजारी के लिए 1954 से 1969 तक के लिए कांट्रैक्ट मिला था। साहिब दत्त मल, जिसे लोग मुनीमजी कहते थे, ने 1970-71 में हुए वार्षिक नीलामी में यह कांट्रैक्ट ले लिया। इस पर दोनों में दुश्मनी हो गई। 7 जून,1970 को सुबह सात बजे गंगाराम (अभियुक्त) का मुनीमजी (मृतक) से तरबूजे की टोकरी खरीदने की बात पर झगड़ा हुआ।
गंगाराम वहाँ से गुस्से में चला गया लेकिन एक घंटे बाद वह अपने तीन पुत्रों– रामस्वरुप, सोमी और सुभाष के साथ मुनीमजी के पास वापस बाजार आया। इस समय गंगाराम चाकू, रामस्वरुप बंदूक और सोमी और सुभाष लाठी लेकर आए थे।
वे सभी मुनीमजी की अधिकारिता को चुनौती देते हुए आक्रामक रूप से उसकी तरफ बढ़े। मुनीमजी पहले तो अचंभे में आ गया, फिर उसने पास ही बने एक कमरे में जाने का प्रयास किया। लेकिन तब तक रामस्वरुप ने उसे नजदीक से गोली मार दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गई।
सेशन कोर्ट ने आईपीसी से सेक्शन 302 के तहत रामस्वरुप को मृत्यु दंड दिया जबकि गंगाराम को सेक्शन 302 सहपठित सेक्शन 34 के तहत आजीवन कारावास का दंड दिया। उन्हे आर्म्स एक्ट के तहत भी दंडित किया गया। सोमी और सुभाष को बरी कर दिया गया।
लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गंगाराम और रामस्वरुप को बरी कर दिया और सोमी और सुभाष को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा। राज्य सरकार ने रामस्वरुप और गंगाराम को बरी करने के फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पेटीशन फ़ाइल किया।
7 जून की सुबह सात बजे की घटना का यद्यपि कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं था लेकिन यह निर्विवाद था कि दोनों अभियुक्तों (रामस्वरुप और गंगाराम) सुबह के लगभग 8 बजे बाजार गए थे। अभियुक्तों की तरफ से यह कहा गया कि रामस्वरुप ने अपनी प्रतिरक्षा (private defence) में गोली चलाया था। लेकिन साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर सेशन कोर्ट ने इस बचाव को विश्वसनीय नहीं माना था।
पर हाई कोर्ट के अनुसार सुबह सात बजे की घटना का विश्वसनीय साक्ष्य नहीं था। इसलिए उसने बचाव पक्ष का यह दलील स्वीकार किया कि मृतक और गंगाराम में हाथापाई हुई थी। मृतक, उसके एक व्यावसायिक भागीदार और एक नौकर ने मिलकर लाठी से गंगाराम को पीटा। वे दोनों गंगाराम पर लगातार प्रहार कर रहे थे, तब अपने पिता को बचाने के लिए रामस्वरुप ने गोली चलाया और इसलिए उसका यह कृत्य प्राइवेट प्रतिरक्षा में किया गया माना जा सकता है।
यह संभव है कि गोली मृतक को लगी न कि उन्हे जो लाठी से प्रहार कर रहे थे। लेकिन अगर हम एक बार इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि रामस्वरुप में उपर्युक्त परिस्थितियों में अपने बूढ़े पिता को हमलावरों के चंगुल से छुड़ाने के लिए गोली चलाया तो उसे हत्या के लिए दोषी नहीं माना जा सकता है।
हाई कोर्ट ने गंगाराम को भी दोषी नहीं माना क्योंकि वह सब्जी मंडी मृतक की हत्या करने नहीं बल्कि तरबूज खरीदने गया हो सकता है। हाई कोर्ट के अनुसार अभियोजन पक्ष अभियुक्तों का दोष “युक्तियुक्त संदेह से परे (beyond reasonable doubt)” साबित नहीं कर पाया।
उपर्युक्त परिस्थितियों में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दो दृष्टियों से केस पर विचार किया। पहला, यह कि क्या अभियोजन पक्ष केस को “युक्तियुक्त संदेह से परे (beyond reasonable doubt)” साबित कर पाया? और दूसरा, क्या अभियुक्तों ने अपनी प्रतिरक्षा में कार्य किया था?
सुप्रीम कोर्ट ने पहले उन पाँच गवाहों की समीक्षा किया जिनके बयानों को सेशन कोर्ट ने विश्वसनीय माना था लेकिन हाई कोर्ट के अनुसार इन पाँच में से दो मृतक के करीबी रिश्तेदार थे और अन्य तीन मृतक के तहबाजारी के कांट्रैक्ट में उसके सहभागीदार थे और सहभागीदार होने के कारण उन्हे उस समय मृतक के पास नहीं बल्कि बाजार में होना चाहिए था।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार यह सही है कि कोर्ट को सावधानीपूर्वक साक्ष्यों और बयानों का अवलोकन करना चाहिए लेकिन पूर्वधारणा पर संदेह करने को न्यायोचित नहीं माना जा सकता है। हाई कोर्ट ने मृतक के अकाउंट बुक में तरबूज की एंट्री नहीं होने के कारण तरबूजे वाले पार्ट को साबित हुआ नहीं माना। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अनुसार अकाउंट बुक की कुछ हद तक प्रासंगिकता हो सकती है लेकिन मुख्य बात यह है कि दोनों में व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता थी जिस कारण मृतक ने उसे तरबूज की टोकरी बेचने से मना कर दिया
तरबूज वाली घटना इस घटना की पूर्व प्रस्तावना की तरह थी जो कि हत्या का तात्कालिक कारण बना। पर हाई कोर्ट ने इसे छोटी घटना माना (जिसके कारण हत्या नहीं होगी)। हाई कोर्ट ने इस पर भी विचार नहीं किया कि अभियुक्तगण हथियारों से साथ बाजार क्यों गए थे। हाई कोर्ट ने बचाव पक्ष के इस दलील को मान लिया कि अभियुक्तों को मृतक से जान का खतरा था (“शेर से माँद में जाना”) इसलिए वे अपनी सुरक्षा के लिए हथियारों से साथ आए थे और मृतक के पास इतने व्यक्ति थे कि उनके हथियार आसानी से छीन सकते थे।
लेकिन यह सामान्य अनुभव कि बात है बंदूक से लैस कोई व्यक्ति अगर किसी बड़े जनसमूह में चला जाय तो इस समूह का प्रत्येक व्यक्ति उसे शस्त्रहीन करने के लिए घेर नहीं लेता है। हाई कोर्ट ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया कि अभियुक्त से बंदूक के दोनों बैरल में गोली भरा था (एक निशाना चूक गया, दूसरे से मृत्यु हुई)। आत्मरक्षा के लिए बाजार में एक गोली भरा होने पर भी जाया जा सकता था। इतना ही नहीं, गंगाराम ने चाकू भी ले रखा था। हाई कोर्ट ने अव्यवहारिक और अत्यंत कठोर परीक्षण लागू किया।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार प्रतिरक्षा के लिए होता है, प्रतिशोध के लिए नहीं। यह अधिकार उस व्यक्ति को है जो तत्क्षण खतरा का सामना कर रहा हो और सद्भावनापूर्वक (good faith) में कार्य कर रहा हो। अगर कोई व्यक्ति बंदूक लेकर किसी की हत्या करने जाता है और वह दूसरा व्यक्ति अपनी प्रतिरक्षा करता है तो पहले व्यक्ति को यह अधिकार नहीं होता है कि वह प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करे। पीनल कोड में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार देते समय यह आशय नहीं था कि हमला किसी को हत्या के लिए उकसाने का बहाना बन जाए।
आईपीसी का सेक्शन 99 स्पष्ट कहता है कि प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उस सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए जितनी कि बचाव के लिए आवश्यक हो। डॉक्टर के साक्ष्य के अनुसार गंगाराम को लगा हुआ चोट साधारण प्रकृति का था।
सेक्शन 100 में उन परिस्थितियों का वर्णन किया गया है जब प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार हमलावर की मृत्यु कारित करने तक हो सकता है। इस सेक्शन के अनुसार अगर हमले की प्रकृति ऐसी हो कि गंभीर चोट या मृत्यु के संभावना हो, तभी प्रतिरक्षा में किसी की जान ली जा सकती है। दूसरे कमरे के पास से गोली मिलना और उसकी चौखट पर एक गोली का पाया जाना साबित करता है कि मृतक अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा था। सेक्शन 102 के अनुसार प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार खतरा समाप्त होते ही समाप्त हो जाता है।
साक्ष्य अधिनियम (the Evidence Act) के सेक्शन 105 के अनुसार अगर कोई अभियुक्त किसी साधारण अपवाद (General Exception) का लाभ लेना चाहता है तो उसे यह साबित करना होगा, न कि कोर्ट यह धारणा (presume) करेगा। यद्यपि अभियुक्त के लिए यह आवश्यक नहीं है कि अभियोजन पक्ष की तरह अपने कथन को “संदेह से परे” साबित करे। लेकिन अगर उसके साक्ष्यों से अभियोजन पक्ष के कथन पर संदेह हो जाए तो अभियुक्त बरी किया जा सकता है।
कोर्ट ने ऋषिकेश सिंह वर्सेस स्टेट (AIR 1970 All 51) केस को उद्धृत किया जिसमें एविडेन्स एक्ट से सेक्शन 105 से उद्भूत होने वाले विभिन्न तरह की धारणाओं (presumptions) के वास्तविक प्रकृति की व्याख्या की गई थी।
इस केस में कोर्ट ने यह माना था कि यह हो सकता है कि “संभावनाओं का संतुलन (balance of probabilities)” के कारण प्राइवेट प्रतिरक्षा को साबित नहीं किया जा सके, लेकिन सम्पूर्ण तथ्यों और परिस्थितियों (facts and circumstances) पर विचार करने पर मेंस रिया के संबंध में तर्कयुक्त संदेह (reasonable doubt) हो जाए।
लेकिन प्रस्तुत केस ऐसा नहीं है। वास्तव में प्राइवेट प्रतिरक्षा का सामान्य कथन मृतक के शारीरिक क्षति (injury) की प्रकृति, जिस कारण मृत्यु हुई है, कि व्याख्या नहीं कर पता है। कोर्ट का मत था कि राम स्वरूप का कार्य सोचसमझ कर किया गया था और दुर्घटनावश या पिता की रक्षा में नहीं किया गया था।
उपर्युक्त दलीलों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और रामस्वरुप को दोषी माना। लेकिन सेशन कोर्ट द्वारा दिए गए मृत्यु दंड को घटा कर आजीवन कारावास कर दिया।
गंगाराम के संबंध में सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट और सेशन कोर्ट के इस बात से सहमति दिखाया कि उसने बंदूक नहीं ली थी लेकिन साक्ष्य अभाव में सेशन कोर्ट के इस विचार को नहीं माना कि रामस्वरुप ने उसके उकसाने पर गोली चलाया होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने आर्म्स एक्ट से भी उसे बरी कर दिया क्योंकि यह नहीं कहा जा सकता था कि गंगाराम ने अपना लाइसेंसी बंदूक रामस्वरूप को दिया होगा, बल्कि रामस्वरुप ने उसे ले लिया होगा। इसलिए हाई कोर्ट द्वारा उसे बरी करने के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।
कुछ अन्य महत्वपूर्ण केस लॉ
उत्तर प्रदेश बनाम पुसू (19830 Cri LJ 1356 SC)
जो व्यक्ति स्वयं आक्रमणकारी है और स्वतः अपने ऊपर आक्रमण को आमंत्रित करता है, उसे प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं है।
गोरधन बनाम राजस्थान राज्य (1987 Cri L J541 (Raj)
प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार युक्तियुक्त और तथ्यों पर आधारित खतरे के विरूद्ध है, अनुमानों और अटकलों पर आधारित खतरे के नहीं।
अरूण बनाम महाराष्ट्र राज्य (2009 2 Cri L J 2065 (SC)
अभियुक्त के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह शब्दों द्वारा स्पष्ट रूप से यह तर्क दे कि उसने प्रतिरक्षा में कार्य किया है। यदि परिस्थितियाँ यह दर्शाती है कि प्रतिरक्षा के अधिकार का विधि सम्मत ढ़ंग से प्रयोग किया गया है तो न्यायालय इस प्रकार के तर्क पर विचार कर सकती है।
ऐसा साक्ष्य देने का दायित्व अभियुक्त पर है। प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार को सम्पूर्ण घटना और परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह अधिकार वैसे ही प्रारम्भ हो जाता है जैसे शरीर को खतरा की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती है और यह अधिकार तब तक रहता है जब तक कि शरीर को खतरे की युक्तियुक्त आशंका वर्तमान रहती है।
राजेश कुमार बनाम धर्मवीर (1997 Cri LJ 2242 (SC)
आत्मरक्षा के अधिकार केवल विरूद्ध आक्रमण को विफल करने के लिए है, प्रतिशोध के लिए नहीं।
पम्मी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (AIR 1998 SC 1185)
आत्मरक्षा में किए गए कार्य के विरूद्ध आत्मरक्षा का अधिकार नहीं होता है।
सेकन बनाम राज्य (2003 Cri LJ 53 (SC)
किन्ही विशिष्ट परिस्थितियों में किसी व्यक्ति ने व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग किया है तथ्य सम्बन्धी प्रश्न है जिसका अवधारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है।
व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का अभिवचन करने वाले अभियुक्त से साक्ष्य प्रस्तुत करने की अपेक्षा नहीं की जाती, वह अपना अभिवचन अभियोजन साक्ष्य से प्रकट होने वाली परिस्थितियों के माध्यम से ही सिद्ध कर सकता है। ऐसे मामले में अभियोजन साक्ष्य के सही प्रभाव के मूल्यांकन का प्रश्न उठता है, और अभियुक्त द्वारा किसी दायित्व को निभाना नहीं है।
जयदेव बनाम पंजाब राज्य (1963 Cri LJ 495)
आत्मरक्षा में कारित अपहानि की मात्रा सदैव आक्रमणकारी द्वारा प्रस्तुत बल की मात्रा के समानुपात में होनी चाहिए जिससे आक्रमणकारी द्वारा प्रयुक्त बल को निवारित किया जा सके। लेकिन धमकाए गए व्यक्ति द्वारा आत्मरक्षा में प्रयुक्त बल की माप कठोरता से (golden scale) नहीं की जानी चाहिए।
मुन्नेखान (1970) 2 SCC 480)
प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का उपयोग दण्ड देने, आक्रमण करने या बदला लेने के प्रयोजन से नहीं किया जा सकता ।
पाटिल हरी में घजी तथा अन्य बनाम गुजरात राज्य (1983 Cri LJ 826 (SC)
किसी व्यक्ति को उस समय प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं होता है जबकि वह किसी ऐसे व्यक्ति पर प्रहार करता है जो कि भूमि पर गिर चुका है, शस्त्रविहीन है और प्रतिरोध उत्पन्न करने की स्थिति में नहीं है।


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