हिन्दू विवाह का पंजीकरण: नियम, महत्व और धारा 8 (Registration of Marriage)

हिन्दू विवाह अधिनियम द्वारा जो सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया गया है, उनमें एक है विवाह का पंजीकरण या रजिस्ट्रेशन का उपबंध। इसमें विवाह के लिए किसी निश्चित विधि या अनुष्ठान का उल्लेख नहीं है, बल्कि केवल विवाह के लिए योग्यता (धारा 5) का उल्लेख है। धारा 7 का आशय यह है कि सामाजिक रूप से मान्य सभी हिन्दू विवाहों को इस अधिनियम के तहत वैध विवाह माना जाएगा। लेकिन धारा 8 में हिन्दू विवाह के पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) का प्रावधान किया गया है। हिन्दू विवाह का पंजीकरण एक नई संकल्पना थी, जिसका पहली बार प्रावधान इस अधिनियम के द्वारा किया गया।

पंजीकरण का उद्देश्य विवाहित जोड़े को विवाह का प्रमाणित दस्तावेजी सबूत उपलब्ध कराना है, ताकि वे विवाह संबंधी धोखाधड़ी से बच सकें तथा पति या पत्नी होने के नाते उन्हें और उनके बच्चों को जो कानूनी अधिकार मिले हैं, उनका सहजता से लाभ उठा सकें। अन्य कई औपचारिक कार्यों, जैसे पेंशन, वीजा आदि के लिए भी विवाह के सबूत के रूप में रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट की जरूरत होती है। इसीलिए सरकार का यह प्रयास रहता है कि सभी विवाहित जोड़े अपने विवाह का रजिस्ट्रेशन करवाएँ।

सुप्रीम कोर्ट ने अनेक निर्णयों में रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य करने पर बल दिया है। संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार ‘विवाह’ राज्य सूची का विषय है, अर्थात् इस पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों को है। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 8 भी राज्य सरकार को यह अधिकार देती है कि इसके लिए एक ‘हिन्दू विवाह रजिस्टर’ बनाया जाए, जिसमें किसी विवाह से संबंधित सभी मुख्य विवरण दर्ज रहेंगे। इसके लिए राज्य सरकार नियम बनाती है।

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रजिस्ट्रेशन में अनियमितता को एक अपराध माना जा सकता है और इसके लिए जुर्माना किया जा सकता है। लेकिन रजिस्ट्रेशन रजिस्टर में अगर कोई सूचना भूलवश छूट गई हो या कोई प्रविष्टि (Entry) त्रुटिपूर्ण हो, तो इससे विवाह की वैधता प्रभावित नहीं होगी, अर्थात् विवाह वैध बना रहेगा। आवश्यकता पड़ने पर इस रजिस्टर का उपयोग सबूत के तौर पर किया जा सकता है।

महत्वपूर्ण मुकदमा (Case Law)

सीमा वर्सेस अश्वनी कुमार (AIR 2006 SC 1158; (2006) 2 SCC 578)

यह केस इसलिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने हिन्दू विवाह के पंजीकरण (Registration) पर विस्तार से विचार किया और राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों को विवाह पंजीकरण अनिवार्य बनाने एवं इसके लिए एक समुचित दिशानिर्देश (Guideline) तैयार करने का निर्देश दिया।

न्यायालय ने यह भी कहा कि अधिकांश राज्यों में विवाहों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है, जिसका अनुचित लाभ उठाकर कई लोग विवाह के अस्तित्व को ही अस्वीकार कर देते हैं। बड़ी संख्या में ऐसे मामले न्यायालय के समक्ष आते हैं, जिनमें एक पक्ष विवाह के अस्तित्व से मुकर जाता है, जिससे पीड़ित पक्ष को उसका हक नहीं मिल पाता।

इस मामले में जो सबसे बड़ा विधिक प्रश्न था, वह यह था कि क्या राज्यों से अपने-अपने क्षेत्रों में विवाह के अनिवार्य पंजीकरण के लिए अधिसूचना जारी करने को कहा जाए।

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मामले में उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरिजित पसायत) ने विवाह के अनिवार्य पंजीकरण पर विचार करते हुए निम्नलिखित तर्क रखे:

  1. भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची, जो राज्यों और संघ के बीच विषयों के विभाजन से संबंधित है, की तीसरी सूची (समवर्ती सूची) की प्रविष्टि 5 में विवाह और विवाह-विच्छेद तथा प्रविष्टि 30 में महत्वपूर्ण आंकड़ों (Vital Statistics) की सूची है, जिसमें जन्म और मृत्यु पंजीकरण भी शामिल है। विवाह का पंजीकरण भी महत्वपूर्ण आंकड़ों के अंतर्गत आता है।
  2. हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 8 विवाह पंजीकरण का उपबंध करती है, लेकिन विवाह पंजीकार के समक्ष हो या अपनी पारंपरिक विधि से विवाह कर यहाँ पंजीकरण कराया जाए, यह विवाह के पक्षकारों पर छोड़ दिया गया है।
  3. साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि पंजीकरण में कोई प्रविष्टि भूलवश छूट जाने से विवाह की वैधता प्रभावित नहीं होगी।
  4. धारा 8 की उपधारा (2) राज्य सरकारों को यह शक्ति देती है कि वे विवाह पंजीकरण को अनिवार्य करने के लिए नियम बनाएँ।
  5. राज्य सरकार द्वारा बनाए गए इन नियमों का उल्लंघन दंडनीय अपराध होगा, जिसके लिए जुर्माना किया जा सकता है। लेकिन महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर किसी अन्य राज्य ने विवाह के पंजीकरण को अनिवार्य नहीं किया है।
  6. यदि विवाह का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया जाए और प्रत्येक विवाह का समुचित आधिकारिक रिकॉर्ड रखा जाए, तो विवाह से संबंधित कई कानूनी समस्याओं का समाधान सरल हो जाएगा।

राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार, अनिवार्य पंजीकरण न होने से महिलाओं को सर्वाधिक हानि होती है, क्योंकि:

  • यदि पति विवाह होने से ही इंकार कर दे, तो ऐसी स्थिति में विवाह साबित करना उनके लिए बहुत कठिन हो जाता है। यह बच्चों की वैधता (Legitimacy) साबित करने में भी सहायक होता है।
  • यद्यपि विवाह का पंजीकरण केवल विवाह के वैध होने का पूर्ण प्रमाण नहीं है, फिर भी जैसा कि स्वयं धारा 8 में कहा गया है, इसका मुख्य उद्देश्य विवाह का एक समुचित आधिकारिक सबूत उपलब्ध कराना है।
  • इससे बाल विवाह पर रोक लगाने में भी सहायता मिलती है।
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न्यायालय के निर्देश:

न्यायालय ने राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया कि वे अपने-अपने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सभी धर्मों के लोगों के लिए विवाह पंजीकरण को उनके व्यक्तिगत कानूनों के तहत अनिवार्य करने की व्यवस्था करें। साथ ही यह निर्देश भी दिया कि सभी राज्यों एवं केंद्र शासित क्षेत्रों में विवाह पंजीकरण की प्रक्रिया को तीन महीने के अंदर अधिसूचित किया जाए। इन नियमों में पंजीकरण के समय विवाह के पक्षकारों की उम्र और पूर्व वैवाहिक स्थिति स्पष्ट शब्दों में लिखने का उपबंध होना चाहिए।

पंजीकरण नहीं कराने या पंजीकरण के लिए गलत जानकारी देने के क्या परिणाम हो सकते हैं, यह भी स्पष्ट होना चाहिए। न्यायालय ने केंद्र सरकार को यह निर्देश भी दिया कि वह एक समन्वित विधि (Coordinated Legislation) बनाए और परीक्षण के लिए उसे न्यायालय के समक्ष रखे।

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