एक सभ्य समाज एक वयस्क, स्वस्थ और सक्षम पुरुष से यह अपेक्षा करता है कि वह अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता का भरण-पोषण करे। इस अपेक्षा को कानून भी मान्यता देता है। वर्तमान में चूंकि महिलाएं भी उपार्जन करने लगी हैं, इसलिए कुछ स्थितियों में उनका भी दायित्व कानून द्वारा माना गया है। इसे “भरण-पोषण के लिए खर्च” और अंग्रेजी में “Maintenance” कहते हैं।
खर्चा पाने का अधिकार किस-किसको है? (अर्थात खर्चे की मांग कौन कर सकता है?)
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 चार तरह के संबंधों के लिए भरण-पोषण की व्यवस्था करती है:
- पत्नी
- माता-पिता
- नाबालिग संतान
- कुछ परिस्थितियों में बालिग संतान
1. पत्नी
ऐसी पत्नी जो अपना खर्चा वहन करने में सक्षम नहीं है, अपने पति से मेंटेनेंस ले सकती है। ऐसी पत्नी जो छोटे-मोटे काम करके अपना गुजारा कर रही है या जिसकी आय पति से बहुत कम है, उसे भी अपना खर्च वहन करने में असक्षम माना जाता है और वह भी इस धारा के तहत पति से खर्चा पाने की हकदार है।
2. नाबालिग संतान
ऐसी नाबालिग (Minor) संतान जो अपना भरण-पोषण करने के लिए सक्षम नहीं है, को पिता से भरण-पोषण के लिए खर्चा पाने का अधिकार है। इसके लिए शर्त केवल यह है कि संतान नाबालिग हो, उसका वैध या अवैध होना कोई मायने नहीं रखता है।
3. बालिग संतान
बालिग (Major) संतान भी कुछ विशेष स्थितियों में पिता से खर्च ले सकती है। अगर कोई बालिग पुत्र शारीरिक या मानसिक असामान्यता या किसी गंभीर चोट के कारण अपना खर्च चलाने के लायक नहीं हो, तो वह पिता से यह हक मांग सकता है। यह अधिकार वैध या अवैध दोनों तरह के पुत्रों को है। लेकिन वयस्क विवाहिता पुत्री को यह अधिकार नहीं है, क्योंकि उसे अपने पति से खर्चा पाने का अधिकार होता है।
4. माता-पिता
ऐसे माता-पिता जो खुद का खर्च चलाने में सक्षम नहीं हैं, को भी बेटे से इस कानून के अनुसार खर्चा मिल सकता है।
अन्य कानूनी प्रावधान: ‘हिन्दू दत्तक एवं पालन-पोषण अधिनियम, 1956’ (Hindu Adoptions and Maintenance Act) की धारा 18 पत्नी को, धारा 19 विधवा बहू को, और धारा 20 बच्चों तथा माता-पिता को यह अधिकार देती है। इसके अलावा भरण-पोषण के खर्चे के लिए कई विशेष कानून भी हैं; जैसे—मुस्लिम महिलाओं के लिए 1986 में बना कानून, वरिष्ठ नागरिकों के लिए 2007 में बना कानून आदि।
खर्चा या मेंटेनेंस की मांग किससे की जा सकती है?
अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों का पालन-पोषण करना हर वयस्क व्यक्ति का नैतिक और कानूनी दायित्व होता है और साधन होने के बावजूद यदि वह जानबूझकर ऐसा नहीं करता है, तो कानून द्वारा उससे ऐसा करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
परंतु यदि वह व्यक्ति किसी मजबूरी से या पर्याप्त साधन नहीं होने की वजह से, चाहकर भी इनको ठीक से नहीं रख पाता यानी उचित मेंटेनेंस नहीं दे पाता हो, तो उसके विरुद्ध मेंटेनेंस का दावा नहीं किया जा सकता है। किसी नाबालिग से भी यह मांग नहीं की जा सकती है। धारा 125 लागू होने की मुख्य रूप से दो शर्तें हैं:
- पति, पिता या बेटा (जिससे भी क्लेम किया जा रहा हो) आर्थिक रूप से सक्षम हो।
- वह जानबूझकर खर्चा देने से मना कर रहा हो।
माता-पिता और अन्य बुजुर्गों को कानून द्वारा क्या अधिकार दिए गए हैं?
सीआरपीसी की धारा 125 माता-पिता को भी बेटे से खर्चा पाने का अधिकार देती है। यह ध्यान देने योग्य है कि यह धारा माता-पिता की परिभाषा में सौतेली माता या पिता को शामिल नहीं करती है।
लेकिन विभिन्न उच्च न्यायालयों (High Courts) और सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा की उदार व्याख्या करते हुए सौतेली माँ को इस धारा के तहत मेंटेनेंस पाने की अधिकारिणी (Entitled) माना है, बशर्ते वह विधवा हो, उसकी अपनी कोई संतान न हो और न ही उसकी आय का कोई अन्य साधन हो। यदि वह कोई छोटा-मोटा काम कर थोड़ा-बहुत कमा लेती है, तो उसे नियमित आय नहीं माना जाएगा।
बुजुर्गों को भरण-पोषण का अधिकार
मार्च 2011 में सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक नीति घोषित की थी, जिसके तहत वरिष्ठ नागरिकों को खर्चा पाने सहित कई लाभ दिए गए हैं। 2007 में पारित “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम” (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) के अनुसार, मेंटेनेंस पाने का अधिकार ऐसे सभी सीनियर सिटीजंस को दिया गया है जो अपनी आय या संपत्ति से अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं हैं।
इसमें माता-पिता के साथ-साथ दादा-दादी, नाना-नानी या अन्य बुजुर्ग भी शामिल हैं। जिन वरिष्ठ नागरिकों की कोई संतान नहीं है, वे अपने ऐसे किसी संबंधी या कानूनी उत्तराधिकारी से खर्चा पाने के हकदार हैं जो उनकी मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति का वारिस होगा।
पत्नी को पति से खर्चा पाने का क्या अधिकार है?
माता-पिता के अतिरिक्त पत्नी को भी अपने पति से भरण-पोषण के लिए खर्चा यानी मेंटेनेंस पाने का पूर्ण अधिकार होता है। यदि पति यह अधिकार देने से मना करे, तो वह अदालत से यह आदेश पारित करने की प्रार्थना कर सकती है।
पत्नी घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के अतिरिक्त सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भी मेंटेनेंस मांग सकती है। ‘हिन्दू दत्तक एवं पालन-पोषण अधिनियम’ की धारा 18 भी पत्नी को यह अधिकार देती है। यह अधिकार पति से अलग रहने वाली पत्नी को भी प्राप्त है।
क्या तलाकशुदा पत्नियों को भी खर्चा पाने का अधिकार है?
हाँ, तलाकशुदा पत्नियों को भी यह अधिकार प्राप्त है। ‘हिन्दू विवाह अधिनियम’ (Hindu Marriage Act) का सेक्शन 24 तलाकशुदा पत्नी को यह अधिकार देता है। तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को “मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986” (Muslim Women Protection of Rights on Divorce Act) के सेक्शन 3 के द्वारा यह अधिकार दिया गया है।
सीआरपीसी के सेक्शन 125 के तहत यह अधिकार हिंदू और मुस्लिम दोनों पत्नियों के लिए है। पत्नियों को तलाक के बाद भी मेंटेनेंस तब तक मिलता है, जब तक कि वे दूसरी शादी नहीं कर लेतीं।
क्या महिलाएं मेंटेनेंस केवल पति से मांग सकती हैं?
यदि कोई महिला विधवा है, उसका पति लापता है, या किसी गंभीर बीमारी या शारीरिक लाचारी के कारण वह पत्नी और बच्चे का खर्च वहन करने में असमर्थ है, तो क्या पत्नी सास-ससुर से मेंटेनेंस मांग सकती है?
इसका जवाब हाँ है। ‘हिन्दू दत्तक एवं पालन-पोषण अधिनियम, 1956’ के अनुसार, यदि किसी विधवा की अपनी आय या अपने पति द्वारा छोड़ी गई संपत्ति से इतनी आय नहीं है कि वह अपना खर्च चला सके, और न ही उसकी कोई संतान है जो उसका खर्च उठा सके, तो वह अपने ससुर से खर्चा मांग सकती है, बशर्ते ससुर के पास पर्याप्त संपत्ति हो।
क्या लिव-इन पार्टनर (Live-in Partner) इसके लिए क्लेम कर सकती है?
इसके लिए कोई पृथक और निश्चित कानून नहीं बना है, परंतु सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों के अनुसार, यदि लिव-इन पार्टनर लंबे समय से साथ रह रहे हों और आसपास के लोग उन्हें पति-पत्नी के रूप में जानते हों, तो ऐसी पार्टनर और उनके बच्चों को मेंटेनेंस पाने का कानूनी अधिकार मिल सकता है।
क्या पति को भी पत्नी से मेंटेनेंस मिल सकता है?

वर्तमान समय में “हाउस हसबैंड” (House Husband) का चलन भी शुरू हुआ है और महिलाएं भी अच्छी आमदनी अर्जित कर रही हैं। इसलिए यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है। इस संबंध में हालांकि कोई विशेष नया कानून नहीं है, परंतु अदालतों के विभिन्न निर्णयों को देखते हुए इसका उत्तर हाँ है।
यदि पत्नी की आय अच्छी है और पति किसी शारीरिक या अन्य वास्तविक कारण से कमाने में असमर्थ है, तो वह पत्नी से खर्चे की मांग कर सकता है। परंतु यदि वह नौकरी करने या किसी अन्य तरीके से कमाने के योग्य है और जानबूझकर काम नहीं कर रहा है, तो उस स्थिति में उसे पत्नी से मेंटेनेंस पाने का अधिकार नहीं मिलेगा।
बच्चों को अपने माता-पिता से मेंटेनेंस का क्या अधिकार है?
अपने माता-पिता और पत्नी के अतिरिक्त अपने बच्चों की उचित देखभाल करना और उन्हें आर्थिक सहयोग देना भी प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक और कानूनी कर्तव्य है। सीआरपीसी की धारा 125 पत्नी, बच्चों और माता-पिता को यह अधिकार देती है। इसके अतिरिक्त बच्चों के लिए ‘हिन्दू दत्तक एवं पालन-पोषण अधिनियम’ की धारा 20 में भी मेंटेनेंस का स्पष्ट प्रावधान है।
मेंटेनेंस की राशि कितनी होती है?
अदालत मेंटेनेंस की राशि तय करते समय कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार करती है, जैसे:
- देने वाले की आर्थिक स्थिति और हैसियत
- लेने वाले की आवश्यकता और उसकी अपनी आय
- दोनों पक्षों के रहन-सहन के स्तर में अंतर
- बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च तथा बुजुर्गों के मेडिकल खर्च आदि।
यह राशि एकमुश्त (One-time) या प्रति माह (Monthly) के रूप में दी जा सकती है। अदालत द्वारा एक बार मेंटेनेंस की राशि तय हो जाने के बाद, यदि भविष्य में परिस्थितियों में कोई बड़ा बदलाव आता है (जैसे देने वाले की इनकम बढ़ जाए या नौकरी छूट जाए), तो इस राशि को घटाया या बढ़ाया भी जा सकता है।
इन कानूनों के तहत मेंटेनेंस पाने के लिए क्या करना चाहिए?
इसके लिए परिवार न्यायालय (Family Court) में एक याचिका (Petition) दायर करनी होती है। इसमें जिस व्यक्ति से आप मेंटेनेंस मांग रहे हैं, उसकी आय और संपत्ति का विवरण तथा अपने स्वयं के खर्चों का पूरा विवरण अवश्य लिखना चाहिए।
अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मेंटेनेंस की अंतिम राशि और भुगतान का तरीका तय करती है। जब तक मामले का अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक अदालत अंतरिम मेंटेनेंस (Interim Maintenance) यानी मुकदमे के दौरान मिलने वाले अस्थायी खर्चे का आदेश भी दे सकती है, ताकि सुनवाई के दौरान पीड़ित पक्ष को आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े।

