न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021): मुख्य उद्देश्य, प्रावधान, विवाद और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश

परिचय

भारत में न्याय प्रणाली को अधिक त्वरित, सुव्यवस्थित और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) लाया गया था। इस अधिनियम ने देश की ट्रिब्यूनल प्रणाली में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए, जिनका विधिक और न्यायिक जगत में व्यापक प्रभाव पड़ा। आइए इस अधिनियम से जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को प्रश्न-उत्तर के माध्यम से विस्तार से समझते हैं।

Table of Contents

प्रश्न 1 – न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reform Act 2021) के मुख्य उद्देश्य क्या थे?

उत्तर – इसका मुख्य उद्देश्य भारत में ट्रिब्यूनल प्रणाली को सुव्यवस्थित करना, अनावश्यक/अक्रिय ट्रिब्यूनलों को समाप्त करना और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक त्वरित व प्रभावी बनाना। इसके उद्देश्यों को इन बिन्दुओं में रखा जा सकता है:

मुख्य उद्देश्य (Main Objectives)

  1. निष्क्रिय/अनावश्यक ट्रिब्यूनलों को समाप्त करना: जिन ट्रिब्यूनलों के पास काम का बोझ बहुत कम था या जो समानांतर कार्य कर रहे थे, उन्हें बंद करके उनके मामलों को सीधे उच्च न्यायालयों (High Courts) या सिविल न्यायालयों में स्थानांतरित करना।
  2. कार्यप्रणाली में एकरूपता और पारदर्शिता: विभिन्न ट्रिब्यूनलों के अध्यक्षों (Chairpersons) और सदस्यों (Members) की नियुक्ति, योग्यता, कार्यकाल और सेवा शर्तों में एकरूपता लाना।
  3. मामलों का शीघ्र निपटारा: न्याय वितरण प्रणाली में आ रही देरी को कम करना और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना।

प्रश्न 2 – न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reform Act 2021) द्वारा क्या मुख्य बदलाव लाया गया था?

उत्तर- इस अधिनियम द्वारा ये मुख्य सुधार लाए गए थे:

  • 8 अपीलीय ट्रिब्यूनलों को समाप्त किया गया: जैसे फिल्म प्रमाणन अपीलीय अधिकरण (FCAT), कॉपीराइट बोर्ड, सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय अधिकरण के कुछ भाग आदि। इनके अधिकार अब सीधे High Courts या Commercial Courts को दे दिए गए।
  • कार्यकाल तय किया गया: ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष (Chairperson) का कार्यकाल 4 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) और सदस्यों का कार्यकाल 4 वर्ष या 67 वर्ष की आयु तक निर्धारित किया गया।
  • आयु सीमा: ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष या सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 50 वर्ष तय की गई।
  • खोज-सह-चयन समिति (Search-cum-Selection Committee): नियुक्तियों के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति बनाने का प्रावधान किया गया।

प्रश्न 3 – इस अधिनियम के तहत किन-किन ट्रिब्यूनलों का विलय या गठन किया गया था?

उत्तर- अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) के तहत किसी नए ट्रिब्यूनल का गठन नहीं किया गया था, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य मौजूदा ट्रिब्यूनल प्रणाली को सुव्यवस्थित करना था।

इस अधिनियम के माध्यम से 9 अपीलीय अधिकरणों/बोर्डों (Appellate Tribunals/Boards) को समाप्त (Abolish) कर दिया गया और उनके न्यायिक कार्यों व अपीलों को सीधे उच्च न्यायालयों (High Courts) तथा अन्य मौजूदा न्यायिक निकायों में स्थानांतरित (Transfer/Merge) कर दिया गया।

 समाप्त/विलय किए गए ट्रिब्यूनलसंबंधित मूल अधिनियममामले किस न्यायालय/संस्था को सौंपे गए
1फिल्म प्रमाणन अपीलीय अधिकरण (FCAT)चलचित्र अधिनियम, 1952उच्च न्यायालय (High Court)
2कॉपीराइट बोर्ड (Copyright Board)कॉपीराइट अधिनियम, 1957वाणिज्यिक न्यायालय (Commercial Court) या उच्च न्यायालय
3पेटेंट अपीलीय बोर्ड (IPAB का हिस्सा)पेटेंट अधिनियम, 1970उच्च न्यायालय
4ट्रेडमार्क अपीलीय बोर्ड (IPAB का हिस्सा)ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999उच्च न्यायालय
5भौगोलिक संकेत अपीलीय बोर्ड (IPAB का हिस्सा)माल का भौगोलिक उपदर्शन अधिनियम, 1999उच्च न्यायालय
6पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण बोर्डपौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001उच्च न्यायालय
7  हवाई अड्डा अपीलीय अधिकरण (Airport Appellate Tribunal)भारतीय विमानपतन प्राधिकरण अधिनियम, 1994केंद्र सरकार या संबंधित सिविल न्यायालय
8राष्ट्रीय राजमार्ग अधिकरण (National Highways Tribunal)राष्ट्रीय राजमार्ग (भूमि और यातायात नियंत्रण) अधिनियम, 2002सिविल न्यायालय (Civil Court)
9सीमा शुल्क अग्रिम विनिर्णय अपीलीय प्राधिकरणसीमा शुल्क अधिनियम, 1962उच्च न्यायालय

प्रश्न 4 – ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया में क्या नए नियम बनाए गए हैं?

उत्तर- अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) के तहत ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष (Chairperson) और सदस्यों (Members) की नियुक्ति, योग्यता और कार्यकाल से जुड़े कई प्रमुख नियम लागू किए गए हैं:

1. खोज-सह-चयन समिति (Search-cum-Selection Committee)

अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा एक विशेष खोज-सह-चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है:

  • अध्यक्षता: इस समिति के अध्यक्ष भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उनके द्वारा नामित उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीश होते हैं।
  • सदस्य:
    • भारत सरकार द्वारा नामित दो सचिव (Secretaries)।
    • संबंधित ट्रिब्यूनल के निवर्तमान (outgoing) या वर्तमान अध्यक्ष।
    • उस मंत्रालय/विभाग के सचिव जिसके तहत ट्रिब्यूनल का गठन हुआ है (सदस्य-सचिव के रूप में)।
  • निर्णायक मत: समिति के अध्यक्ष (CJI या SC जज) के पास कास्टिंग वोट (निर्णायक मत) का अधिकार होता है।

2. न्यूनतम आयु सीमा (Minimum Age Limit)

  • ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त होने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 50 वर्ष होनी अनिवार्य है।

3. निश्चित कार्यकाल (Fixed Tenure)

  • अध्यक्ष (Chairperson): कार्यकाल 4 वर्ष का होगा, या जब तक वे 70 वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेते (जो भी पहले हो)।
  • सदस्य (Members): कार्यकाल 4 वर्ष का होगा, या जब तक वे 67 वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेते (जो भी पहले हो)।

4. पुनर्नियुक्ति की पात्रता (Re-appointment)

  • अध्यक्ष और सदस्य अधिनियम के प्रावधानों के तहत पुनर्नियुक्ति (Re-appointment) के लिए पात्र हैं।
  • पुनर्नियुक्ति के मामलों में व्यक्ति द्वारा की गई पिछली सेवा को प्राथमिकता दी जाती है।
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5. सिफारिश प्रक्रिया

  • चयन समिति पदों के लिए उपयुक्त उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजती है, जिसके आधार पर केंद्र सरकार अंतिम नियुक्ति की अधिसूचना जारी करती है।

प्रश्न 5 – 2021 के अधिनियम से ट्रिब्यूनल सदस्यों की योग्यता, कार्यकाल और सेवानिवृत्ति की आयु में क्या बदलाव किए गए हैं?

उत्तर- न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) के माध्यम से ट्रिब्यूनल सदस्यों की योग्यता, कार्यकाल और सेवानिवृत्ति की आयु में कई बदलाव किए गए थे। हालांकि, इनमें से कई नियमों पर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के महत्वपूर्ण फैसले भी आ चुके हैं।

नियमों की स्थिति:

1. योग्यता और न्यूनतम आयु (Qualification & Minimum Age)

  • 50 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा: अधिनियम में प्रावधान किया गया था कि किसी भी व्यक्ति को ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष या सदस्य बनने के लिए कम से कम 50 वर्ष की आयु होना आवश्यक है।
  • वकीलों के लिए अनुभव: 10 साल की वकालत का अनुभव रखने वाले वकील पात्र माने गए थे।
  • वर्तमान न्यायिक स्थिति: सुप्रीम कोर्ट (Madras Bar Association केस) ने इस 50 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा वाली शर्त को रद्द (strike down) कर दिया। कोर्ट का तर्क था कि यह योग्य युवा वकीलों को अवसर से वंचित करता है।

2. कार्यकाल (Tenure)

  • 4 वर्ष का निश्चित कार्यकाल: अधिनियम के अनुसार अध्यक्ष (Chairperson) और सदस्यों (Members) दोनों का कार्यकाल 4 वर्ष निर्धारित किया गया।
  • पुनर्नियुक्ति (Re-appointment): सदस्य नियम व शर्तों के अनुसार पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र बनाए गए।
  • वर्तमान न्यायिक स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने 4 वर्ष के कार्यकाल के प्रावधान को भी असंवैधानिक ठहराते हुए कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता और स्थायित्व के लिए सदस्यों का न्यूनतम कार्यकाल 5 वर्ष होना चाहिए।

3. सेवानिवृत्ति की अधिकतम आयु (Retirement Age)

अधिनियम में अध्यक्ष और सदस्यों के लिए सेवानिवृत्ति की ऊपरी आयु सीमा इस प्रकार तय की गई है:

  • अध्यक्ष (Chairperson): अधिकतम 70 वर्ष की आयु।
  • सदस्य (Members): अधिकतम 67 वर्ष की आयु।

(कार्यकाल या सेवानिवृत्ति की आयु में से जो भी पहले पूरा होगा, व्यक्ति उसी अनुसार सेवानिवृत्त माना जाएगा।) हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कई प्रावधानों में बदलाव कर दिए।

प्रश्न 6 – ट्रिब्यूनल के सदस्यों को हटाने की प्रक्रिया क्या है और इसमें केंद्र सरकार की भूमिका क्या होगी?

उत्तर- न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) और संबंधित नियमों के तहत ट्रिब्यूनल (अधिकरण अथवा न्यायाधिकरण) के अध्यक्ष या सदस्यों को पद से हटाने (Removal) की एक निर्दिष्ट प्रक्रिया है, जिसमें केंद्र सरकार और न्यायिक जांच समिति दोनों की भूमिकाएं होती हैं।

1. सदस्यों को हटाने के आधार (Grounds for Removal)

अध्यक्ष या किसी भी सदस्य को निम्नलिखित आधारों पर पद से हटाया जा सकता है:

  • दिवालिया घोषित होना: यदि व्यक्ति को दिवालिया (insolvent) घोषित कर दिया गया हो।
  • शारीरिक या मानसिक असमर्थता: यदि वह अपने कर्तव्यों का पालन करने में शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो गया हो।
  • नैतिक पतन का अपराध: यदि उसे किसी ऐसे अपराध में दोषी ठहराया गया हो जिसमें नैतिक पतन (moral turpitude) शामिल हो।
  • हितों का टकराव: यदि उसने ऐसा कोई वित्तीय या अन्य हित हासिल कर लिया है जो उसके सदस्य के रूप में काम करने पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
  • पद का दुरुपयोग: यदि उसने अपने पद का इस तरह दुरुपयोग किया है कि उसका पद पर बने रहना जनहित के प्रतिकूल हो।
  • साबित हुआ दुर्व्यवहार या अक्षमता: (Proven Misbehaviour or Incapacity)।

2. हटाने की प्रक्रिया (Procedure for Removal)

  1. शिकायत या प्राथमिक जांच: जब केंद्र सरकार को किसी अध्यक्ष या सदस्य के खिलाफ दुर्व्यवहार या अक्षमता की शिकायत मिलती है, तो मामला तुरंत खोज-सह-चयन समिति (Search-cum-Selection Committee) के पास भेजा जाता है।
  2. समिति द्वारा जांच (Inquiry):
    • इस समिति की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या सर्वोच्च न्यायालय के उनके द्वारा नामित न्यायाधीश करते हैं।
    • समिति आरोपों की निष्पक्ष जांच करती है या जांच के लिए किसी उपयुक्त एजेंसी/न्यायिक निकाय को निर्देशित कर सकती है।
  3. सफाई का अवसर (Right to be Heard): संबंधित सदस्य/अध्यक्ष को अपने बचाव में पक्ष रखने और जवाब देने का पूरा और उचित अवसर दिया जाता है।
  4. सिफारिश: यदि जांच में आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो समिति अपनी जांच रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपती है और पद से हटाने की सिफारिश करती है।

3. इसमें केंद्र सरकार की भूमिका (Role of the Central Government)

  • शिकायत अग्रेषित करना: केंद्र सरकार के पास शिकायत आने पर वह स्वयं सीधे किसी सदस्य को नहीं हटा सकती; उसे मामला CJI की अध्यक्षता वाली समिति को ही भेजना होता है।
  • अंतिम आदेश जारी करना: चयन समिति की जांच रिपोर्ट और उसकी सिफारिश के आधार पर केंद्र सरकार औपचारिक रूप से हटाने का आदेश (Removal Order) जारी करती है।
  • जांच के दौरान निलंबन (Suspension during Inquiry): यदि गंभीर आरोप हों, तो चयन समिति से परामर्श/सिफारिश के बाद केंद्र सरकार जांच लंबित रहने के दौरान संबंधित सदस्य को निलंबित भी कर सकती है।

निष्कर्ष

ट्रिब्यूनल के सदस्यों को हटाने की प्रक्रिया में न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका (CJI की अध्यक्षता वाली समिति की जांच) रखी गई है ताकि ट्रिब्यूनलों की न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) बनी रहे और केंद्र सरकार अपनी मर्जी से या प्रशासनिक दबाव बनाकर किसी सदस्य को सीधे पद से न हटा सके।

प्रश्न 7 – सर्च कमेटी और चयन समिति का गठन कैसे होगा और इनमें कौन-कौन शामिल होंगे?

उत्तर – अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) की धारा 3 के तहत ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सदस्यों की सिफारिश के लिए खोज-सह-चयन समिति (Search-cum-Selection Committee) के गठन का प्रावधान किया गया है।


1. केंद्रीय ट्रिब्यूनलों के लिए समिति की संरचना (Composition)

केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित ट्रिब्यूनलों के लिए समिति में निम्नलिखित सदस्य शामिल होते हैं:

  • अध्यक्ष (Chairperson): भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उनके द्वारा नामित उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के कोई न्यायाधीश।
  • सदस्य (Members):
    1. भारत सरकार द्वारा नामित दो सचिव (Secretaries)।
    2. संबंधित ट्रिब्यूनल के निवर्तमान (Outgoing) या वर्तमान अध्यक्ष (यदि अध्यक्ष की नियुक्ति हो रही है, तो सर्वोच्च न्यायालय के कोई सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश)।
    3. उस मंत्रालय या विभाग के सचिव (Secretary) जिसके तहत वह ट्रिब्यूनल कार्य करता है (यह सदस्य-सचिव के रूप में कार्य करते हैं)।

2. राज्य प्रशासनिक अधिकरण (SAT) के लिए विशेष संरचना

यदि समिति राज्य प्रशासनिक अधिकरण (State Administrative Tribunal – SAT) के अध्यक्ष या सदस्यों के चयन के लिए गठित की जाती है, तो उसकी संरचना इस प्रकार होती है:

  • अध्यक्ष: संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) या उनके द्वारा नामित उच्च न्यायालय के कोई न्यायाधीश।
  • सदस्य:
    1. राज्य सरकार के मुख्य सचिव (Chief Secretary)।
    2. राज्य सरकार के लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) के अध्यक्ष।
    3. संबंधित राज्य प्रशासनिक अधिकरण के निवर्तमान या वर्तमान अध्यक्ष।
    4. राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन/कार्मिक विभाग के सचिव (सदस्य-सचिव के रूप में)।
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3. निर्णय प्रक्रिया और कास्टिंग वोट (Casting Vote)

  • समिति के अध्यक्ष (CJI, SC के जज या HC के चीफ जस्टिस) के पास कास्टिंग वोट (निर्णायक मत) का अधिकार होता है। यदि किसी नाम पर सदस्यों के वोट बराबर (50-50) हो जाएं, तो अध्यक्ष का वोट अंतिम माना जाता है।
  • समिति केवल योग्य उम्मीदवारों के नामों का एक पैनल तैयार करके केंद्र सरकार को सिफारिश भेजती है, जिसके आधार पर केंद्र सरकार नियुक्तियां अधिसूचित करती है।

प्रश्न 8 – इस एक्ट के आने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रभाव के विषय में क्या विवाद था और पक्ष और विपक्ष के मुख्य तर्क क्या थे?

उत्तर – अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) के कुछ प्रावधानों के कारण न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary) के बीच का मुद्दा काफी चर्चा और विवाद का विषय रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि “न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान का एक मूल ढांचा (Basic Structure) है,” और ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली में सरकार का अत्यधिक हस्तक्षेप इस स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।

इस मुद्दे पर पक्ष (सरकार का दृष्टिकोण) और विपक्ष (न्यायपालिका व कानूनी विशेषज्ञों का दृष्टिकोण) के मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:

पक्ष के तर्क (Arguments In Favor)

सरकार और अधिनियम के समर्थकों के अनुसार यह कानून न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित किए बिना प्रणाली में सुधार लाता है:

  1. संसदीय संप्रभुता (Parliamentary Sovereignty): नीति निर्माण (policy making) और कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है। ट्रिब्यूनलों के गठन, कार्यकाल और पात्रता से जुड़े नियम तय करना विधायिका का अधिकार क्षेत्र है।
  2. प्रशासकीय दक्षता और जवाबदेही: निश्चित कार्यकाल (4 वर्ष) और 50 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा तय करने से अधिक अनुभवी, वरिष्ठ और प्रशासनिक विशेषज्ञता वाले लोग ही नियुक्त होंगे, जिससे मामलों के त्वरित निपटारे में मदद मिलेगी।
  3. CJI की अध्यक्षता वाली समिति: चयन प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उनके द्वारा नामित SC जज को ही अध्यक्ष बनाया गया है और उनके पास निर्णायक वोट (Casting Vote) का अधिकार है। इससे नियुक्तियों में निष्पक्षता और न्यायिक वर्चस्व बना रहता है।
  4. अति-न्यायिक हस्तक्षेप पर रोक: सरकार का मानना है कि केवल प्रशासनिक शर्तों (जैसे कार्यकाल या आयु) को तय करने से न्यायिक स्वतंत्रता खत्म नहीं होती, बल्कि इससे एक व्यवस्थित ढांचा बनता है।

विपक्ष के तर्क (Arguments Against)

सर्वोच्च न्यायालय, बार एसोसियेशन्स और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह अधिनियम न्यायिक स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा खतरा है:

  1. कार्यपालिका (Executive) का अत्यधिक प्रभाव: ट्रिब्यूनलों में कई बार सरकार स्वयं एक पक्षकार (litigant) होती है। यदि सदस्यों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और पुनर्नियुक्ति का नियंत्रण सरकार के हाथ में अधिक रहेगा, तो सदस्य सरकार के पक्ष में प्रभावित हो सकते हैं।
  2. छोटा कार्यकाल (4 वर्ष) और न्यायिक स्वतंत्रता: 4 वर्ष का कार्यकाल बहुत छोटा होता है। सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने के समय वे पुनर्नियुक्ति के लिए सरकार की इच्छा पर निर्भर हो सकते हैं, जिससे निष्पक्ष निर्णय देने में उनका मनोबल प्रभावित हो सकता है।
  3. युवा वकीलों का बहिष्कार (50 वर्ष की न्यूनतम आयु): 50 वर्ष की न्यूनतम आयु तय करने से प्रतिभाशाली और ऊर्जावान युवा वकीलों/कानूनी विशेषज्ञों को अवसर नहीं मिलता, जिससे ट्रिब्यूनलों में सेवानिवृत्त अधिकारियों/अधिकारियों का वर्चस्व बढ़ सकता है।
  4. न्यायिक फैसलों की अनदेखी: सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी इसी तरह के अध्यादेशों और नियमों (Madras Bar Association केस) में 4 साल के कार्यकाल और 50 वर्ष की आयु सीमा को असंवैधानिक ठहराया था। इसके बावजूद संसद द्वारा दोबारा वही प्रावधान लागू करना सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अवहेलना और ‘शक्ति के पृथक्करण’ (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन माना गया।

निष्कर्ष

अधिनियम के समर्थकों का मानना है कि इससे ट्रिब्यूनल प्रणाली अधिक अनुशासित और त्वरित बनती है, जबकि आलोचकों का तर्क है कि कार्यकाल की अनिश्चितता और सरकारी हस्तक्षेप के कारण ट्रिब्यूनल अपनी निष्पक्षता खो सकते हैं। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने अधिनियम की कई विवादास्पद धाराओं (जैसे 50 वर्ष की आयु और 4 वर्ष के कार्यकाल) पर रोक लगाई और बदलाव के निर्देश दिए हैं।

प्रश्न 9 – 2021 के अधिनियम (Act) के अनुसार ट्रिब्यूनल के आदेशों के खिलाफ अपील किस कोर्ट में होनी थी और समय-सीमा क्या तय की गई थी?

अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) के तहत ट्रिब्यूनलों के आदेशों के खिलाफ अपील करने के लिए न्यायालय (Forum of Appeal) और समय-सीमा (Limitation Period) संबंधित मूल अधिनियम (Parent Act) के संशोधनों के अनुसार तय की गई थी:

1. किस कोर्ट में होती अपील? (Appellate Forum)

अधिनियम के तहत समाप्त किए गए अपीलीय बोर्डों और ट्रिब्यूनलों के अधिकार क्षेत्र को सीधे उच्च न्यायालय (High Court) या वाणिज्यिक न्यायालय (Commercial Court) में स्थानांतरित कर दिया गया था:

  • उच्च न्यायालय (High Court): अधिकांश मामलों में (जैसे चलचित्र अधिनियम, पेटेंट अधिनियम, ट्रेडमार्क अधिनियम, सीमा शुल्क अधिनियम आदि के तहत दिए गए आदेशों के खिलाफ) अपील सीधे संबंधित High Court में दायर होती।
  • वाणिज्यिक न्यायालय (Commercial Court / High Court Commercial Division): कॉपीराइट अधिनियम (Copyright Act) से जुड़े विवादों और आदेशों की अपील वाणिज्यिक न्यायालयों या उच्च न्यायालय के वाणिज्यिक प्रभाग में होती।
  • सिविल कोर्ट (Civil Court): राष्ट्रीय राजमार्ग (भूमि और यातायात नियंत्रण) अधिनियम से जुड़े मामलों की अपील संबंधित सिविल न्यायालयों में होती।

2. समय-सीमा (Time-Limit / Limitation Period)

अपील दायर करने की समय-सीमा संबंधित कानून के प्रावधानों के आधार पर तय की गई है:

  • सामान्य समय-सीमा: कानून के तहत आदेश या निर्णय प्राप्त होने की तिथि से आमतौर पर 3 महीने (90 दिन) के भीतर अपील दायर करनी होती है। (उदाहरण के लिए, कॉपीराइट और ट्रेडमार्क से संबंधित अपीलों के लिए 3 महीने की सीमा है)।
  • प्रमाणित प्रति की अवधि को छूट (Exclusion of Copying Time): 3 महीने या निर्धारित समय-सीमा की गणना करते समय आदेश की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) प्राप्त करने में लगा समय कुल समय-सीमा में से घटाया/हटाया (exclude किया) जाता है।
  • देरी की माफी (Condonation of Delay): यदि कोई व्यक्ति निर्धारित समय-सीमा के भीतर अपील दायर नहीं कर पाता है, तो यदि न्यायालय के पास पर्याप्त और उचित कारण (Sufficient Cause) प्रस्तुत किया जाता है, तो अदालत देरी को माफ करके अपील स्वीकार कर सकती है।

इस संशोधन से कई स्तरों पर होने वाली अपीलों की जटिलता कम हुई और पीड़ित पक्ष सीधे उच्च न्यायालय का रुख कर सकते थे।

प्रश्न 9 – ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम 2021 के तहत कर्मचारियों और वित्तीय मामलों का नियंत्रण किसके पास रहना था?

उत्तर- अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) के तहत ट्रिब्यूनलों के कर्मचारियों और वित्तीय मामलों (Financial and Administrative Control) का नियंत्रण निम्नलिखित तरीके से व्यवस्थित किया गया है:

1. कर्मचारियों का नियंत्रण (Administrative Control & Staffing)

  • पैरेंट मिनिस्ट्री (Parent Ministry / Nodal Ministry): ट्रिब्यूनल के प्रशासनिक मामलों और कर्मचारियों की व्यवस्था का मुख्य नियंत्रण उसी संबंधित मंत्रालय या विभाग (Nodal Department) के पास होता है जिसके तहत वह ट्रिब्यूनल गठित किया गया है।
  • उदाहरण के लिए: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के प्रशासनिक मामले पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत आते हैं, जबकि आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) कानून और न्याय मंत्रालय / वित्त मंत्रालय से जुड़े प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत रहता है।
  • अध्यक्ष की भूमिका (Chairperson’s Administrative Power): ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष (Chairperson) ट्रिब्यूनल का प्रशासनिक प्रमुख होता है। कर्मचारियों के आंतरिक कार्यों के आवंटन, दैनिक प्रशासन और अनुशासन पर ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष का नियंत्रण रहता है।
  • कर्मचारियों का कैडर: जिन अपीलीय ट्रिब्यूनलों को समाप्त किया गया है, उनके मौजूदा कर्मचारियों और अधिकारियों को संबंधित मंत्रालय या स्थानांतरण वाले न्यायालयों/विभागों में नियमों के अनुसार समायोजित (absorbed/redeployed) करने का प्रावधान किया गया।
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2. वित्तीय मामलों का नियंत्रण (Financial Control)

  • केंद्र सरकार/संबंधित मंत्रालय द्वारा बजट का आवंटन: ट्रिब्यूनल के वित्तीय संचालन (जैसे सदस्यों व कर्मचारियों के वेतन, भत्ते, पेंशन और कार्यालय के बुनियादी ढांचे का खर्च) का बजट संबंधित केंद्र सरकार (मंत्रालय) द्वारा संसद द्वारा स्वीकृत अनुदानों (Grants) के माध्यम से दिया जाता है।
  • वित्तीय शक्तियां (Delegation of Financial Powers): ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष या उनके द्वारा नामित रजिस्ट्रार (Registrar) को दैनंदिन खर्चों के लिए निर्धारित वित्तीय शक्तियाँ दी जाती हैं, लेकिन बजट में बढ़ोतरी या नए ढांचागत कोष के लिए अंतिम मंजूरी केंद्र सरकार के वित्त विभाग/नोडल मंत्रालय से ही लेनी होती है।

3. न्यायिक स्वतंत्रता बनाम प्रशासनिक नियंत्रण पर विवाद

विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों का तर्क रहा है कि जब तक ट्रिब्यूनल के कर्मचारियों और वित्तीय संसाधनों के लिए उन्हें प्रशासनिक मंत्रालयों (जिनमें सरकार स्वयं अक्सर विवाद में एक पक्षकार होती है) पर निर्भर रहना पड़ेगा, तब तक उनकी पूर्ण स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

इसके समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले ‘राष्ट्रीय अधिकरण आयोग’ (National Tribunals Commission – NTC) बनाने का सुझाव दिया था, जो ट्रिब्यूनलों के प्रशासन और बजट को स्वतंत्र रूप से संभाल सके। हालांकि, इस अधिनियम के तहत प्रशासनिक व वित्तीय बजट का नियंत्रण मुख्य रूप से नोडल मंत्रालयों के अधीन ही रखा गया है।

प्रश्न 10 – सर्वोच्च न्यायालय (supreme court) ने इन नियमों में क्या परिवर्तन किए?

उत्तर- अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) के कई प्रावधानों को सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2021) मामले में असंवैधानिक (Unconstitutional) ठहराया था।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, संसद द्वारा इस अधिनियम में पुनः वही प्रावधान शामिल किए गए थे जिन्हें अदालत पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुकी थी। ऐसा करना शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत (Principle of Separation of Powers) और न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary) का उल्लंघन था।

जिन प्रमुख धाराओं/प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराया गया

धारा 3(2) — 50 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा: ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु 50 वर्ष तय की गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 50 साल की आयु सीमा रखने से युवा और प्रतिभाशाली वकीलों का चयन नहीं हो पाएगा। इससे ट्रिब्यूनलों में केवल सेवानिवृत्त नौकरशाहों का दबदबा बढ़ेगा और योग्य युवा कानूनी विशेषज्ञों का अनुभव प्रणाली को नहीं मिल सकेगा।

धारा 3(1) व 3(7) — 4 वर्ष का छोटा कार्यकाल:  अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल 4 वर्ष निर्धारित किया गया था। इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित किया गया। न्यायालय के अनुसार 4 साल का कार्यकाल बहुत छोटा होता है। इतने कम समय में सदस्यों का एक बड़ा हिस्सा कार्यकाल समाप्त होने पर पुनर्नियुक्ति के लिए सरकार (जो कि खुद अधिकांश मामलों में पक्षकार होती है) पर निर्भर हो सकता है। न्यायिक स्वतंत्रता और स्थायित्व बनाए रखने के लिए सदस्यों का न्यूनतम कार्यकाल 5 वर्ष होना अनिवार्य है।

      धारा 3(8) — पुनर्नियुक्ति में पिछली सेवा को प्राथमिकता: पुनर्नियुक्ति के मामलों में खोज-सह-चयन समिति द्वारा पिछली सेवा को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी। इसे असंवैधानिक ठहराया गया। न्यायालय के अनुसार इससे कार्यपालिका (सरकार) के पास अपने पसंदीदा सदस्यों को पद पर बनाए रखने की अनुचित शक्ति आ सकती थी, जो न्यायिक निष्पक्षता को प्रभावित करती।

चयन समिति द्वारा सिफारिशों की संख्या (सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटी): समिति को प्रत्येक पद के लिए दो नामों के पैनल की सिफारिश करने का नियम दिया गया था और सरकार को निर्णय लेने की छूट दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समिति को एक पद के लिए केवल एक नाम की सिफारिश करनी चाहिए, तथा एक नाम वेटिंग लिस्ट में रखा जा सकता है। सरकार अपनी पसंद के अनुसार चयन नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट का मुख्य निष्कर्ष (रद्द करने के कारण)

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ट्रिब्यूनल न्यायालयों का ही विकल्प हैं। यदि उनकी सेवा शर्तें और कार्यकाल कमजोर होंगे, तो वे स्वतंत्र होकर सरकार के खिलाफ निष्पक्ष फैसले नहीं दे पाएंगे।

संवैधानिक मर्यादा और न्यायिक फैसलों की अनदेखी: कोर्ट के अनुसार, यदि सर्वोच्च न्यायालय किसी नियम को खारिज कर देता है, तो संसद अध्यादेश या नया कानून लाकर बिना आधार बदले केवल वही पुराने नियम दोबारा लागू नहीं कर सकती।

संक्षेप में (मूल अधिनियम बनाम सर्वोच्च न्यायालय का रुख)

धारा (section)पहलूअधिनियम 2021 का प्रावधानसर्वोच्च न्यायालय का निर्देश
धारा 3(2) न्यूनतम आयु50 वर्षरद्द (कम उम्र के योग्य वकील भी पात्र)
धारा 3(1) व 3(7) कार्यकाल4 वर्षन्यूनतम 5 वर्ष का कार्यकाल आवश्यक
धारा 3(8) पुनर्नियुक्ति में पिछली सेवा को प्राथमिकतापुनर्नियुक्ति के मामलों में खोज-सह-चयन समिति द्वारा पिछली सेवा को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी।  असंवैधानिक
 अध्यक्ष की रिटायरमेंट आयु70 वर्ष70 वर्ष (सहमति)
 सदस्य की रिटायरमेंट आयु67 वर्ष67 वर्ष (सहमति)

इस फैसले के बाद ही संसद और न्यायपालिका के बीच ट्रिब्यूनल के नियमों और सेवा शर्तों को लेकर संवैधानिक चर्चा तेज हुई थी।

प्रश्न 11 – पुराने ट्रिब्यूनल एक्ट जैसे Finance Act 2017 और Tribunal Reforms Ordinance 2021 से यह अधिनियम कैसे अलग था?

Tribunal Reforms Act, 2021 को Finance Act, 2017 और Tribunal Reforms Ordinance, 2021 (अध्यादेश) के बाद लाया गया था। यह अधिनियम इन दोनों कानूनी ढांचों की तुलना में निम्नलिखित तरीकों से अलग है:

1. Finance Act, 2017 बनाम Tribunal Reforms Act, 2021 – वित्त अधिनियम, 2017 ने भारत में ट्रिब्यूनल प्रणाली के बड़े पुनर्गठन की शुरुआत की थी, लेकिन 2021 का अधिनियम उससे कई मायनों में भिन्न है:

ट्रिब्यूनलों का पूर्ण उन्मूलन (Abolition vs Consolidation): Finance Act, 2017 ने ट्रिब्यूनलों की संख्या 26 से घटाकर 19 कर दी थी। इसमें मुख्य रूप से ट्रिब्यूनलों को आपस में मिलाया (merge) गया था (जैसे Cyber Appellate Tribunal को TDSAT के साथ मिलाना)।

पर Tribunal Act, 2021 ने ट्रिब्यूनलों के विलय के बजाय 9 अपीलीय बोर्डों/ट्रिब्यूनलों को पूरी तरह समाप्त (abolish) कर दिया और उनके कार्यों को सीधे नियमित अदालतों (High Courts / Commercial Courts) को सौंप दिया।

अधिकार क्षेत्र का हस्तांतरण: 2017 Act के अनुसार मामले (केस) एक ट्रिब्यूनल से दूसरे ट्रिब्यूनल को स्थानांतरित किए गए थे। जबकि 2021 Act ने मामले ट्रिब्यूनल प्रणाली से बाहर निकालकर संवैधानिक उच्च न्यायालयों (High Courts) को वापस सौंपे गए।

सेवा शर्तें तय करने की शक्ति: 2017 Act के अनुसार संसद ने सदस्यों की योग्यता, कार्यकाल और वेतन तय करने की शक्ति पूरी तरह से केंद्र सरकार को (नियमावली/Rules के माध्यम से) दे दी थी। 2021 Act में नियमों के स्थान पर अधिनियम (Act) की मूल धाराओं में ही 50 वर्ष की न्यूनतम आयु और 4 वर्ष का कार्यकाल स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया (जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती दी)।

2. Tribunal Reforms Ordinance, 2021 (अध्यादेश) बनाम Tribunal Reforms Act, 2021 (अधिनियम)

अध्यादेश (Ordinance) और अधिनियम (Act) की विषय-वस्तु लगभग एक जैसी ही थी, लेकिन इनमें कुछ प्रमुख अंतर हैं:

संसदीय स्वीकृति और स्थायी कानूनी दर्जा: Ordinance (अप्रैल 2021) राष्ट्रपति द्वारा आपातकालीन शक्तियों के तहत लाया गया एक अस्थायी कानून था, जो संसद के सत्र में न होने पर लागू किया गया था। Act (अगस्त 2021) को संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) द्वारा पारित करके एक स्थायी अधिनियम बनाया गया।

सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप और संवैधानिक टकराव: अप्रैल 2021 में अध्यादेश आने के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई 2021 में Madras Bar Association मामले में अध्यादेश के प्रमुख प्रावधानों (4 साल का कार्यकाल और 50 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा) को अवैध/असंवैधानिक घोषित करके रद्द कर दिया था। इसके बावजूद, सरकार ने अगस्त 2021 में संसद में विधेयक पेश करते समय उन्हें रद्द किए गए प्रावधानों को पुनः कानून (Act) के रूप में शामिल कर दिया, जिससे संसद और न्यायपालिका के बीच सीधा संवैधानिक टकराव उत्पन्न हुआ।

संक्षेप में अंतर तालिका  
पहलूFinance Act, 2017Tribunal Ordinance, 2021Tribunal Reforms Act, 2021
प्रकृतिमुख्य रूप से ट्रिब्यूनलों का विलय (Merging)ट्रिब्यूनलों को समाप्त करने वाला अध्यादेश (Ordinance)अध्यादेश को कानून में बदलने वाला संसदीय अधिनियम
मामलों का हस्तांतरणट्रिब्यूनल से ट्रिब्यूनल मेंट्रिब्यूनल से सीधे High Courts मेंट्रिब्यूनल से सीधे High Courts में
सेवा शर्तेंसरकार को नियम (Rules) बनाने का अधिकार दियाअध्यादेश में धाराएं जोड़ी गईंअध्यादेश की धाराओं को ही कानून में बदला गया
संवैधानिक स्थितिसुप्रीम कोर्ट द्वारा नियमों में संशोधन कराया गयासुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रावधानों को रद्द किया गयाअध्यादेश रद्द होने के बाद भी सरकार द्वारा पुनः पारित किया गया

प्रश्न 12 – न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 को लाने की आवश्यकता क्यों हुई? (Why was it needed?)

  • उत्तर- अधिकतम ट्रिब्यूनलों का सही से काम न करना: कई छोटे ट्रिब्यूनल बिना पर्याप्त संसाधनों और न्यायाधीशों/सदस्यों की कमी के कारण निष्क्रिय पड़े थे, जिससे मामलों का निपटारा होने के बजाय वे लंबित (pending) हो रहे थे।
  • समानांतर संरचना और भ्रम: अलग-अलग कानूनों के तहत कई अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunals) बना दिए गए थे, जिससे क्षेत्राधिकार (jurisdiction) को लेकर उलझन रहती थी और न्याय प्रक्रिया महंगी व जटिल हो रही थी।
  • सेवा शर्तों और नियुक्तियों में अस्पष्टता: विभिन्न ट्रिब्यूनलों के सदस्यों का कार्यकाल और चयन प्रक्रिया अलग-अलग थी। केंद्र सरकार का मानना था कि एक केंद्रीकृत और पारदर्शी मानदंड होने से अनुभवी लोगों की नियुक्ति आसान होगी।
  • उच्च न्यायालयों की दक्षता का लाभ उठाना: ट्रिब्यूनलों के बजाय सीधे उच्च न्यायालयों को अपील का अधिकार देने से न्यायिक प्रक्रिया में विशेषज्ञता और विश्वसनीयता बनी रहती है।
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