अपराध के लिए सामूहिक दायित्व क्या है?-part 2.2

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 सामूहिक दायित्व (Joint liablity) का सिद्धांत क्या है?

अपराध के सामूहिक दायित्व का सिद्धांत, जो आईपीसी के s. 34, 120क और 149 में निहित है, कई लोगों द्वारा किए गए अपराध के लिए उनमें से प्रत्येक के लिए दायित्व निर्धारित करता है।

अर्थात अपराध के सामूहिक दायित्व का सिद्धांत उस स्थिति में किसी अपराध के लिए उसे करने वाले का दायित्व और दण्ड का निर्धारण करने में सहायता करता है जब कोई अपराध कई व्यक्ति द्वारा मिल कर दिया जाय। अगर कोई आपराधिक कार्य कई लोगों द्वारा मिल कर किया जाय तो यह संभव है कि उन सब की विशेष भूमिका उस अपराध को करने में अलग-अलग हो, या उनकी भूमिका स्पष्ट नहीं हो। ऐसी स्थिति में उन सब का आपराधिक दायित्व क्या होगा, सामूहिक दायित्व का सिद्धांत इसी का उत्तर देता है।

भारतीय दण्ड संहिता के तीन अध्याय में इससे संबंधित उपबंध है। अध्याय 2, जो कि साधारण स्पष्टीकरण से संबंधित है, की धारा 34 सामान्य आशय (common intention) को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य के लिए सामूहिक दायित्व का निर्धारण करती हैं। अध्याय 5क (120, 120ख) आपराधिक षड्यंत्र के लिए दायित्व का निर्धारण करता है।

अध्याय 8A जो कि लोक प्रशांति के विरूद्ध अपराधों के विषय में है। इसकी धारा 149 विधिविरूद्ध जमाव के सदस्य को सामान्य उद्देश्य (common object) को अग्रसर करने के लिये किये गए कार्य के लिये उत्तरदायी बनाता है। अर्थात ये ऐसे कार्य हैं या ऐसी स्थितियाँ हैं जहाँ कोई व्यक्ति उस अपराध के लिए दंडित होता है जो वास्तव में उसने नहीं बल्कि किसी और ने किया है। लेकिन उसका आपराधिक दायित्व और इसलिए दंड वही होता है, जो वास्तव में करने वाले का होता है। इन धाराओं के तहत दायित्व के लिए निम्नलिखित शर्ते हैं।

अपराध के लिए सामान्य आशय (common intention) (सेक्शन 34)

सेक्शन 34 के अनुसार किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए ये अनिवार्य तत्त्व हैं: 1. कोई आपराधिक कार्य किया जाय। 2. यह दो या अधिक व्यक्तियों द्वारा किया जाय।3. यह ‘सामान्य आशय को अग्रसर करने में‘ किया जाय। अर्थात सामान्य आशय और अपराध करने में सहभागिता इसका मूल तत्व है।

आपराधिक षड्यंत्र (criminal conspiracy) (सेक्शन 120क -ख)

अध्याय 5क आपराधिक विधि (संशोधन अधिनियम), 1913 द्वारा अस्तित्व में आया। यह भारतीय अपराध विधि में एक नए अपराध “आपराधिक षड्यंत्र” का सृजन करता है। धारा 120 क और 120ख के तहत किसी अभियुक्त को दंडित करने के लिए अभियोजन पक्ष को इन तीन शर्तों की उपस्थिति अनिवार्य रूप से साबित करना होगा:

 1. दो या अधिक व्यक्ति थे,

2. उनमें सहमति या समझौता थी,

3. यह समझौता – या तो

(1) किसी अवैध कार्य को करने, या करवाने के लिए थी, या फिर

(2) ऐसे कार्य को अवैध साधनों द्वारा करने के लिए थी, जो स्वयं में अवैध न थे ।

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                   सामान्यतः किसी अपराध को करने के लिए केवल आशय रखना या केवल योजना बनाना दण्डनीय नहीं होता है, जब तक कि उस आशयित कार्य कि दिशा में कोई कार्य न कर दिय जाय। लेकिन आपराधिक षड्यंत्र के मामले में यदि किसी आशय के अनुसरण में एक से अधिक व्यक्ति कोई कार्य करने के लिए सहमत होते हैं या योजना बनाते हैं, तो यह ‘सहमति‘ दण्डनीय हो जाता है। सहमति के अनुसरण में किसी कार्य का होना आवश्यक नहीं है। सहमति केवल निष्क्रिय ज्ञान या आशय से अधिक होता है। अर्थात् किसी योजना का ज्ञान रखना अथवा किसी अवैध कार्य का आशय रखना मात्र आपराधिक षड्यंत्र नहीं होता है।

स्पष्टतः अवैध कार्य या किसी वैध कार्य को अवैध साधनों द्वारा करने के लिए सहमति ही आपराधिक षड्यंत्र है। लेकिन व्यवहारिक रूप से इसे साबित करना कठिन होता है। इसे परिस्थितियाँ और अभियुक्त के आचरण से ही जाना जा सकता है। सहमति साबित करने के लिए न तो प्रत्यक्ष विचार-विमर्श या प्रत्यक्ष संपर्क सिद्ध करने की जरूरत होती है। यह भी आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक षड्यंत्रकारी को योजना की सभी बातों की पूर्ण जानकारी हो। किसी कार्य को करने का करार आपराधिक षड्यंत्र का मूल तत्व है।

आपराधिक षड्यंत्र का प्रत्यक्ष साक्ष्य यदाकदा ही मिलता है। यह घटना के पूर्व और बाद की परिस्थितियों के आधार पर सिद्ध किया जाता है। सिद्ध परिस्थितियों को यह स्पष्ट दर्शाना चाहिए कि वे एक करार के अग्रसरण में कारित की गयी है। (सेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन, हैदराबाद बनाम नारायण राव) (2010) IV Cri LJ 4610 (SC)

चूँकि किसी अवैध कार्य को करने के लिए दो या अधिक व्यक्तियों की सहमति से ही आपराधिक षड्यंत्र का गठित होता है। इसलिए इसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि इसके अनुसरण में कोई कार्य किया जाय। अतः कोई कार्य, जिसके लिए षड्यंत्र किया गया था, अगर नहीं हो फिर भी षड्यंत्र दण्डनीय होगा।

उदाहरण के लिए क, ख और ग आपस में सहमत होते हैं कि घ को ङ के घर में आग लगाने के लिए तैयार करेंगे। उनके दुष्प्रेरण के फलस्वरूप घ आग लगाने के लिए तैयार हो जाता है और इस कार्य के लिए निकल पड़ता है लेकिन उसका विचार बदल जाता है और वह आग नहीं लगाता है। ऐसी स्थिति में यद्यपि घ किसी अपराध का दोषी नहीं होगा लेकिन क, ख और ग आपराधिक षड्यंत्र के लिए दण्डनीय होंगे क्योंकि उन्होंने अवैध कार्य के लिए सहमति और उसके अनुसार घ को दुष्प्रेरित करने का अपराध कर दिया था और उनका यह कार्य षड्यंत्रित कार्य से स्वतंत्र अपने आप में एक सारभूत अपराध है।

सारभूत अपराध होने के कारण आपराधिक षड्यंत्र के लिए किसी व्यक्ति पर अलग से आरोप लगाया जा सकता है अर्थात् उस पर षड्यंत्र तथा अपराध दोनों का आरोप लगाया जा सकता है। धारा 109 और धारा 120क द्वारा सृजित अपराध बिल्कुल अलग है तथा जबकि अपराध षड्यंत्र के अनुसरण में अनेक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तब यह सामान्य नियम है कि उन पर उस अपराध तथा उस अपराध के षड्यंत्र दोनों का आरोप लगाया जाता है। (भारतीय दण्ड संहिता, प्रो सूर्य नारायण मिश्र, पृष्ठ 270)

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आपराधिक षड्यंत्र के अपराध का समापन तीन परिस्थितियों में से हो सकता है:

पहला, वह कार्यान्वित हो जाय।

दूसरा, स्वेच्छा या आवश्यकतावश इसका त्याग कर दिया जाय। और

तीसरा, यह असफल हो जाय।

                 यदि ऐसा (इन तीनों में से कोई नहीं) नहीं होता है तो यह चलता रहता है क्योंकि यह घटना नहीं बल्कि एक प्रक्रिया होता है। इसलिए यह एक निरन्तर अपराध है। संजय दत्त बनाम महाराष्ट्र राज्य, बाबरी मस्जिद, तमिलनाडु राज्य बनाम नलिनी इत्यादि मामलों में कोर्ट ने इस धारा की विस्तृत व्याख्या किया है।

सामान्य उद्देश्य (common object) (सेक्शन 149)

धारा 141 के तहत व्यक्तियों के जमाव को विधि­विरूद्ध जमाव तभी माना जाएगा यदि –

1. पाँच या अधिक व्यक्तियों के जमाव हो
2. उन सब का सामान्य उद्देश्य (common object) हो,
3. उन सब का सामान्य उद्देश्य आपराधिक बल के प्रयोग या इसके प्रदर्शन द्वारा निम्नलिखित में से किसी एक हो आतंकित करना हो-

i. केन्द्रीय सरकार को, या
ii. राज्य सरकार को, या
iii. संसद, या
iv. किसी लोकसेवक को,
4. अथवा किसी विधि या विधिक आदेश के निष्पादन का प्रतिरोध करना हो,
5. अथवा रिष्टि या आपराधिक अतिचार या अन्य अपराध करना होए

6. आपराधिक बल या इसके प्रदर्शन द्वारा –
i. किसी सम्पत्ति का कब्जा लेना हो,
ii. किसी व्यक्ति को अमूर्त अधिकारों से वंचित करना हो,
iii. किसी अधिकार या अनुमानित अधिकार को प्रवर्तित करना हो,
7. अथवा किसी व्यक्ति को आपराधिक बल या इसके प्रदर्शन द्वारा –
i. वह कार्य करने के लिए जिसे करने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध है नहीं है, या
ii. उस काय का लोप करने के लिए जिसे करने के लिए वह वैधरूप से हकदार है, विवश करना हो।

धारा 149 के तहत अपराध गठित करने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य अवयव हैं –

  1. कोई विधिविरूद्ध जमाव हो,
  2. अभियुक्त उस जमाव का सदस्य हो,
  3. जमाव या उसके किसी सदस्य द्वारा कोई अपराध किया गया हो,
  4. ऐसा अपराध जमाव के सामान्य उद्देश्य को अग्रसर करने में किया गया हो या ऐसा हो जिसका किया जाना जमाव का हर सदस्य सम्भाव्य जानता हो।

अध्याय 5 कआपराधिक षड्यन्त्र

120क. आपराधिक षड्यन्त्र की परिभाषा-जबकि दो या अधिक व्यक्ति-

(1) कोई अवैध कार्य, अथवा

(2) कोई ऐसा कार्य, जो अवैध नहीं है, अवैध साधनों द्वारा, करने या करवाने को सहमत होते हैं, तब ऐसी सहमति आपराधिक षड्यन्त्र कहलाती है;

             परन्तु किसी अपराध को करने की सहमति के सिवाय कोई सहमति आपराधिक षड्यन्त्र तब तक न होगी, जब तब कि सहमति के अलावा कोई कार्य उसके अनुसरण में उस सहमति के एक या अधिक पक्षकारों द्वारा नहीं कर दिया जाता।

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स्पष्टीकरण- यह तत्वहीन है कि अवैध कार्य ऐसी सहमति का चरम उद्देश्य है या उस उद्देश्य का आनुषांगिक मात्र है।

120ख. आपराधिक षड्यन्त्र का दण्ड-

(1) जो कोई मृत्यु, आजीवन कारावास या दो वर्ष या उससे अधिक अवधि के कठिन कारावास से दण्डनीय अपराध करने के आपराधिक षड्यन्त्र में शरीक होगा, यदि ऐसे षड्यन्त्र के दण्ड के लिए इस संहिता में कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं है, तो वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा, मानो उसने ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण किया था।

(2) जो कोई पूर्वोक्त रूप से दण्डनीय अपराध को करने के आपराधिक षड्यन्त्र से भिन्न किसी आपराधिक षड्यन्त्र में शरीक होगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से जिसकी अवधि छह मास से अधिक की नहीं होगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।

अध्याय 8- लोक प्रशांति के विरूद्ध अपराधों के विषय में
141. विधिविरूद्ध जमाव-

              पाँच से अधिक व्यक्तियों का जमाव विधिविरूद्ध जमाव कहा जाता है, यदि उन व्यक्तियों का जिनसे वह जमाव गठित हुआ है, सामान्य उद्देश्य हो-

पहला- केन्द्रीय सरकार को, या किसी राज्य सरकार को, या संसद को, या किसी राज्य के विधान-मण्डल को या किसी लोक सेवक को, जबकि वह ऐसे लोक सेवक के विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग कर रहा हो, आपराधिक बल द्वारा, या आपराधिक बल के प्रदर्शन द्वारा आतंकित करना, अथवा

दूसरा- किसी विधि के, या किसी वैध आदेशिका के, निष्पादन का प्रतिरोध करना, अथवा

तीसरा- किसी रिष्टि या आपराधिक अतिचार या अन्य अपराध करना, अथवा

चौथा- किसी व्यक्ति पर आपराधिक बल द्वारा या आपराधिक बल के प्रदर्शन द्वारा, किसी सम्पत्ति का कब्जा लेना या अभिप्राप्त करना या किसी व्यक्ति को किसी मार्ग के अधिकार के उपभोग से, या जल का उपभोग करने के अधिकार या अन्य अमूर्त अधिकार से जिसका वह कब्जा रखता हो, या उपभोग करता हो, वंचित करना या किसी अधिकार या अनुमति अधिकार को प्रवर्तित करना, अथवा किसी अधिकार या अनुमति अधिकार को प्रवर्तित करना, अथवा

पाँचवाँ-आपराधिक बल द्वारा या आपराधिक बल के प्रदर्शन द्वारा, किसी व्यक्ति को वह करने के लिए, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध न हो या उसका लोप करने के लिए, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से हकदार हो, विवश करना।

स्पष्टीकरण- कोई जमाव, जो इकट्ठा होते समय विधिविरूद्ध नहीं था, बाद को विधिविरूद्ध जमाव हो सकेगा।

149. विधिविरूद्ध जमाव का हर सदस्य, सामान्य उद्देश्य को अग्रसर करने के लिए किए गए अपराध का दोषी-

                 यदि विधिविरूद्ध जमाव के किसी सदस्य द्वारा उस जमाव के सामान्य उद्देश्य को अग्रसर करने में अपराध किया जाता है, या कोई ऐसा अपराध किया जाता है, जिसका किया जाना उस जमाव के सदस्य उस उद्देश्य को अग्रसर करने में सम्भाव्य जानते थे, तो हर व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस जमाव का सदस्य है, उस अपराध का दोषी होगा।

23 thoughts on “अपराध के लिए सामूहिक दायित्व क्या है?-part 2.2”
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