दुष्प्रेरण (Abetment)-chapt 5
परिचय
किसी भी अपराध में शामिल व्यक्ति इसमें कई तरह से भूमिका निभा सकते हैं। सहायक व्यक्तियों को दण्ड की मात्रा पर विचार करने के लिए उसकी भूमिका की सुस्पष्ट परिभाषा आवश्यक है। किसी अपराध में भूमिका मुख्य कर्ता होने के अतिरिक्त कर्ता के कार्य में सहयोग, दुष्प्रेरण, मुख्य कर्ता को दण्ड से बचाने में सहयोग आदि के रूप में हो सकता है।

अंग्रेजी विधि में गंभीर अपराधों को करने में सहयोगी व्यक्तियों को दो श्रेणियों में बाँटा जाता है- प्रथम कोटि का अपराधी (जो व्यक्ति स्वयं अपराध कारित करता है या किसी और से कराता है) और द्वितीय कोटि का अपराधी (जो व्यक्ति अपराध करने में सहायता और दुष्प्रेरण देता है)। द्वितीय कोटि का अपराधी पुनः दो श्रेणियों में विभाजित किए जा सकतें हैं- तथ्य पूर्व का अनुचारी (जो व्यक्ति मुख्य अपराधी को प्रोत्साहन, आदेश, सलाह, आयुध आदि उपलब्ध कराता है) और तथ्य पश्चात अनुचारी (जो व्यक्ति अपराध होने के बाद जानबूझ कर मुख्य अपराधी को शरण, सुविधा और दण्ड से बचने में सहायता करते हैं।) लेकिन यह अंतर केवल महाअपराधों के लिए उपयुक्त है, देशद्रोह तथा साधारण अपराधों के लिए नहीं। लेकिन भारतीय दण्ड संहिता केवल दुष्प्रेरक और मुख्य अपराधियों के बीच अन्तर करती है किंतु तथ्य पश्चात् के अनुचारी को सामान्यतः एक स्वतंत्र अपराध के रूप में नहीं स्वीकारती है फिर भी कुछ मामलों में अपराधियों को छिपाना एक मौलिक अपराध है और इसका संहिता में उल्लेख है।
भारतीय दण्ड संहिता का अध्याय 5 दुष्प्रेरण से संबंधित है। इस अध्याय में धारा 107 से धारा 120 तक की धाराएँ मोटे तौर पर तीन भागों में विभाजित है- धारा 107 से 108क यह बताता है कि वे कौन से तत्व हैं जो दुष्प्रेरण का अपराध गठित करतें हैं और किसी व्यक्ति को दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय बनातें हैं। धारा 109 से 117 तक दुष्प्रेरण के अपराध के लिए दण्ड को प्रावधान करता है। अंतिम तीन धाराएँ अर्थात् धारा 118 से 120 उन स्थितियों के विषय में है जब कोई व्यक्ति किसी आपराधिक कार्य के किए जाने की परिकल्पना को जानबूझकर छिपाता है ताकि उस कार्य को करने में सहुलियत हो। लेकिन धारा 107 की तरह वे सक्रिय रूप से षड्यंत्र, उकसाने या सहायता द्वारा किसी आपराधिक कार्य का कारित किया जाना साध्य नहीं बनाता है।
धारा 107
भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार निम्न तीन में से कोई एक या अधिक कार्य करने से दुष्प्रेरण के अपराध का गठन होता है-
1. आपराधिक कार्य के लिए उकसाने द्वारा
2. आपराधिक कार्य के लिए किसी षड्यंत्र में शामिल होने के द्वारा, और
3. आपराधिक कार्य में जानबूझ कर किसी की सहायता (कार्य द्वारा या अवैध लोप से) द्वारा
बशर्ते वह दुष्प्रेरित कार्य स्वतः अपराध हो तथा इस संहिता या किसी अन्य विधि के अन्तर्गत भारत में दण्डनीय हो।

उकसाने के द्वारा दुष्प्रेरण: (धारा 107 का पहला खण्ड और स्पष्टीकरण 1)
यह अपराध गठित होने के लिए निम्न अवयव की उपस्थिति अनिवार्य है:
1. कोई व्यक्ति जानबूझ कर (क) मिथ्या कथन कर सत्य छिपाता है, अथवा (ख) ऐसे तात्विक तथ्य को प्रकट नहीं करता है, जिसे प्रकट करने के लिए वह विधिक रूप से बाध्य है।
2. किसी कार्य का कारित किया जाना कारित या उपाप्त करता है अथवा कारित या उपाप्त करने का प्रयत्न करता है।
3. वह ऐसा स्वेच्छया करता है।
4. ऐसा वह इसलिए करता है ताकि कोई अन्य व्यक्ति किसी आपराधिक कार्य को करे।
अर्थात् उकसाना एक सक्रिय प्रक्रिया है जिसमें कोई व्यक्ति सुझाव, सलाह, निर्देश, फुसलाना (goad) या प्रेरित करने, प्रार्थना करने, उत्तेजित करने हेतु किसी अन्य व्यक्ति को प्रेरित करता है। यह प्रत्यक्ष या विवक्षित भाषा द्वारा, या संकेत द्वारा या किसी अन्य तरह से अभिव्यक्त कर सकता है बशर्ते उसके द्वारा प्रयुक्त शब्दों या भाषा के अर्थ के विषय में युक्तियुक्त निश्चतता हो। पर, प्रयुक्त यर्थाथ शब्दों का सिद्ध होना आवश्यक नहीं है। [(प्रेम नारायण AIR 1957 All 177)]। मूक सहमति या मात्र स्वीकृति या मौखिक आज्ञा उकसाना नहीं है। अर्थात् उकसाना मौन सहमति से अधिक है। लेकिन यदि वह उस तथ्य को प्रकट करने के लिए विधिक रूप से बाध्य है और जानबूझ कर नहीं बताता है तो यह उकसाना है। यदि परिस्थिति ऐसी हो कि उपस्थिति मात्र या सहमति किसी कार्य को प्रेरित करने के लिए पर्याप्त हो तो यह दुष्प्रेरण होगा।
किसी कार्य का प्रयत्न भी कुछ परिस्थिति में उकसाना हो सकता है, जैसे रिश्वत देने का प्रयत्न। अगर पत्र द्वारा दुष्प्रेरण हो और वह पत्र नहीं पहुँचे तो वह दुष्प्रेरण का प्रयत्न होगा।
षड्यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण: (धारा 107 का दूसरा खण्ड, धारा 108 का स्पष्टीकरण 5, धारा 120 क और 120 ख)
धारा 120 क के अनुसार आपराधिक षड्यंत्र का अर्थ है दो या अधिक व्यक्तियों के बीच हुआ ऐसा समझौता जोः (1) जो किसी अवैध कार्य को करने हेतु, अथवा (2) किसी वैध कार्य को अवैध साधनों द्वारा करने हेतु हो। इसलिए षड्यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण के लिए आवश्यक है किः
1. दो या अधिक व्यक्तियों के बीच कोई आपराधिक षड्यंत्र हो
2. कोई कार्य या अवैध लोप उस षड्यंत्र के परिणामस्वरूप कारित हो
3. ऐसा कार्य या अवैध लोप उस आपराधिक उद्देश्य के पूर्ति के लिए हो जिसके लिए षड्यंत्र किया गया हो।
षड्यंत्र का जो आशय धारा 107 के खण्ड के अन्तर्गत है और जो धारा 120 क के अन्तर्गत है उसमें मौलिक समानता होते हुए भी कुछ अंतर है। धारा 120क के अन्तर्गत किसी अपराध के लिए मात्र सम्मति पर्याप्त है यदि किसी आपराधिक कार्य को करने के लिए दी गई हो। लेकिन धारा 107 खण्ड दूसरे के अन्तर्गत आपराधिक कार्य करने के लिए कई लोगों के बीच मात्र एक सन्धि या समझौता प्रर्याप्त नहीं है। बल्कि किसी कार्य या अवैध लोप का होना भी आवश्यक है और यह कार्य या लोप उस निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए हो जिसके लिए षड्यत्र हुआ है।

धारा 108 का खण्ड दो और स्पष्टीकरण 5 को मिला कर पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि दुष्प्रेरण का अपराध कारित करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरक अपराधकर्ता से प्रत्यक्ष रूप से संबंध रखे। अगर वह उस षड्यंत्र में भाग लेता है जिसके अनुसरण में अपराध कारित होता है, तो भी वह दुष्प्रेरण का दोषी होगा।
एक षड्यंत्र मात्र दुष्प्रेरण के समतुल्य नहीं होता है। यदि षड्यंत्रकारियों की पहचान योजना विमर्श के दौरान ही हो जाती है तो वे दुष्प्रेरकों के रूप में दण्डित नहीं होंगे भले ही उनका साधारण आशय अपराध कारित करने का रहा हो। परन्तु यदि उनकी योजना ही एक अपराध कारित करने की थी तो वे संहिता की धारा ख के अन्तर्गत षड्यंत्र के लिए दायित्व के अधीन होंगे।
| धारा 120क और धारा 107 में अंतर | |
| धारा 120क (आपराधिक षड्यंत्र) | धारा 107 (दुष्प्रेरण) |
| 1. इसके अन्तर्गत षड्यंत्र एक सारभूत (substantive) अपराध है जिसका दुष्प्रेरण से संबंध नहीं है। धारा 120ख इसे विस्तृत परिभाषा देते हुए उन कार्यों को भी इसमें सम्मिलित कर लेता है जो धारा 107 के अन्तर्गत षड्यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण के समतुल्य है। 2. धारा 120क के अन्तर्गत सहमति पर्याप्त है यदि अपराध करने के उद्देश्य से हो। 3. धारा 120 ख के तहत दण्डनीय है। | 1. जहाँ आपराधिक षड्यंत्र धारा 107 के अन्तर्गत दुष्प्रेरण के समतुल्य है वहाँ धारा 120 क और 120ख के उपबंधों की सहायता लेना आवश्यक है क्योंकि संहिता में ऐसे षड्यंत्रों को दण्डित करने के लिए विशिष्ट उपबंध बनाए गए हैं। 2. धारा 107 के अन्तर्गत किसी षड्यंत्र लिए मात्र समुच्चय अथवा सहमति पर्याप्त नहीं है। कोई कार्य अथवा अवैध लोप षड्यंत्र के अनुसरण में होना चाहिए तथा षड्यंत्रित कार्य को सम्पादित करने के उद्देश्य से होना चाहिए। 3. षड्यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण धारा 109 से 117 तक वर्णित विभिन्न परिस्थितियों के अन्तर्गत दण्डनीय है। |
षड्यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण के अपराध के लिए कम से कम एक से अधिक अर्थात् दो या अधिक व्यक्ति होना चाहिए। अगर किसी मामलें में मूल रूप से दो या अधिक व्यक्ति आरोपित हो पर एक को छोड़कर सभी बरी हो गए हो तो अकेला अभियुक्त इस धारा के तहत षड्यंत्र के लिए दोषी नहीं हो सकता है क्योंकि षड्यंत्र या दुष्प्रेरण के लिए एक से अधिक व्यक्ति की आवश्यकता होती है। एक ही व्यक्ति मुख्य अपराधी के रूप में और दुष्प्रेरक के रूप में दण्डित नहीं हो सकता है।
सहायता द्वारा दुष्प्रेरणः (धारा 107 का तीसरा खण्ड, स्पष्टीकरण 2)
कोई व्यक्ति सहायता द्वारा दुष्प्रेरण करने के अपराध के लिए दोषी तब कहा जाएगा जब कि वहः
1. कोई ऐसा कार्य या लोप करता है जो उस अपराधिक कार्य के कारित होने में सहायक होता है।
2. ऐसा वह उस कार्य के किए जाने के पूर्व करता है या किए जाते समय करता है
3. ऐसा करते हुए वह जानता है कि अपराध कारित किया जा रहा है या करने की संभावना है।
4. ऐसा वह उस कार्य को सुकर बनाने अर्थात् उस कार्य करने में सहुलियत करने के लिए करता है अर्थात सहायता पहुँचाने का आशय आवश्यक है।
धारा 107 का तीसरा खण्ड और स्पष्टीकरण 2 को मिला कर पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि चूँकि कार्य सहायता कार्य को सुकर बनाने के लिए कार्य के दौरान या उससे पहले किया जाना चाहिए इसलिए अगर यह कार्य किया ही नहीं जाय या उसकी सहायता मिल नहीं पाए तो सहायता द्वारा दुष्प्रेरण का अपराध गठित नहीं होगा।
सहायता के माध्यम से दुष्प्रेरण के अपराध के लिए आशय होना अनिवार्य है इसलिए कोई व्यक्ति कार्य को करने में सहायता पहुँचाने के कारण दण्डित नहीं किया जा सकता यदि वह कार्य किया ही नहीं जाय या सहायता उसने बिना आशय या ज्ञान के किया हो।
घटनास्थल पर उपस्थिति मात्र या इस जानकारी के साथ उपस्थिति की कोई अपराध कारित होने वाला है अपनेआप में दुष्प्रेरण नहीं है जब तक यह सिद्ध न हो जाय कि इससे उस आपराधिक कार्य में सहायता मिली थी। सहयोग में जानकारी या सम्मति मात्र नहीं है बल्कि कोई कार्य या लोप आवश्यक है, जिससे उस आपराधिक कार्य में सहयोग मिले।
चूँकि किसी आपराधिक कार्य के लिए दुष्प्रेरण अपनेआप में एक अपराध है इसलिए दुष्प्रेरण का प्रयत्न भी धारा 511 के अधीन अपराध है।

धारा 108
चूँकि दुष्प्रेरक वह व्यक्ति होता है जो स्वयं प्रत्यक्ष रूप से आशयित अपराध नहीं करता है अपितु उकसाने, सहायता या षड्यंत्र के द्वारा अपराध कारित कराता है। यह संभव है कि वह जिस व्यक्ति या जिन व्यक्तियों के माध्यम से अपराध कराता है वह व्यक्ति या वे व्यक्ति अध्याय 4 में वर्णित साधारण अपवाद में से किसी अपवाद में आने के कारण दण्ड पाने से उन्मुक्त हो लेकिन फिर भी उसे या उन्हें दुष्प्रेरित कर अपराध कराने वाला दुष्प्रेरक दण्डनीय होगा। इसका कारण यह है कि चूँकि दुष्प्रेरण स्वयं में अपराध है इसलिए इसका दण्ड उस व्यक्ति से भिन्न होता है जिसने वास्तव में अपराध किया है।
धारा 108 और 108क को मिला कर पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि एक व्यक्ति दुष्प्रेरक कहा जाता है और इस रूप में दण्डनीय होता है अगर वह निम्न में से कोई कार्य करता है:-
1. वह किसी ऐसे व्यक्ति को कोई आपराधिक कार्य करने के लिए दुष्प्रेरित करे जो विधिक रूप से अपराध करने में सक्षम हो अर्थात् अध्याय 4 के तहत वर्णित किसी साधारण अपवाद में नहीं आता हो। (धारा 108 प्रथम खण्ड)
2. वह किसी ऐसे व्यक्ति को कोई आपराधिक कार्य करने के लिए दुष्प्रेरित करे जो विधिक रूप से अपराध करने में सक्षम नहीं हो अर्थात् अध्याय 4 के तहत वर्णित किसी साधारण अपवाद में आता हो और इसलिए दण्डनीय नहीं हो। (धारा 108 द्वितीय खण्ड, स्पष्टीकरण 3) उदाहरण के लिए किसी विकृतचित्त व्यक्ति या शिशु का कार्य या किसी भ्रम या भूल के अधीन किया गया कार्य।
3. वह किसी ऐसे व्यक्ति को अवैध लोप द्वारा किसी आपराधिक कार्य को करने के लिए दुष्प्रेरित करे जो उसे करने के लिए विधिक रूप से बाध्य हो। (धारा 108, स्पष्टीकरण 1)
4. वह किसी ऐेसे आपराधिक कार्य के लिए किसी व्यक्ति को दुष्प्रेरित करे जो कार्य वास्तव में किया नहीं जा सका हो या उसका परिणाम वह नहीं हुआ हो जिसका आशय दुष्प्रेरक ने किया था।
5. वह किसी दुष्प्रेरण के लिए दुष्प्रेरण करता हो (धारा 108, स्पष्टीकरण 4)
6. वह किसी षड्यंत्र द्वारा किसी आपराधिक कार्य के लिए दुष्प्रेरण करता है, भले ही उस कार्य को वास्तव में करने वाला व्यक्ति दुष्प्रेरक के साथ मिलकर योजना नहीं बनाए, बशर्ते वह उस षड्यंत्र के अनुसरण में अपराध करे (धारा 108, स्पष्टीकरण 5)
7. वह भारत में किसी व्यक्ति को भारत के बाहर और परे किसी ऐसे कार्य को करने के लिए दुष्प्रेरित करे जो भारत में अपराध है (धारा 108क)
अगर कोई दुष्प्रेरक दुष्प्रेरण का अपराध करता है तो इसका परिणाम निम्न में से कोई एक हो सकता है-
- ऐसा अपराध कारित कर दिया जाय और परिणाम वही निकले जिसका आशय दुष्प्रेरक ने किया था
- ऐसा अपराध कारित कर दिया जाय पर परिणाम भिन्न निकले
- ऐसा अपराध कारित करने का प्रयास किया जाय पर वह विफल रहे
- दुष्प्रेरित व्यक्ति कोई भिन्न कार्य कर दे जिसका आशय दुष्प्रेरक ने नहीं किया हो। ऐसे में दो स्थितियाँ हो सकती है एक, आशयित कार्य करने के क्रम में उस भिन्न कार्य के होने की संभावना हो और दूसरा आशयति कार्य को करने के क्रम में उस भिन्न कार्य की अधिसंभाव्यता हो भले ही यह संभावना दुष्प्रेरक को नहीं हो
- दुष्प्रेरित व्यक्ति वह कार्य करने से मना कर दे
- दुष्प्रेरण उस व्यक्ति तक पहुँचे ही नहीं जिसे दुष्प्रेरित करने का आशय था।
उपर्युक्त स्थितियों में एक संभावना यह भी हो सकती है कि जिस कार्य के लिए दुष्प्रेरण किया गया है उसके लिए इस संहिता में दण्ड की विशेष रूप से उपबंध हो। ऐसी स्थिति में इन धाराओं के तहत नहीं बल्कि उस विशेष धारा के तहत दण्ड दिया जाएगा लेकिन जहाँ कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं हो वहाँ इन धाराओं के तहत दण्ड दिया जाएगा।
दुष्प्रेरण के लिए दण्ड का प्रावधान 109, 115 और 116 में किया गया है। धारा 109 उस स्थिति में दण्ड का उपबंध करता है जब दुष्प्रेरित कार्य वास्तव में कारित हो जाय। धारा 110, 111, 112 और 113 उन विभिन्न स्थितियों में दुष्प्रेरक के दायित्व का निर्धारण करती हैं जब दुष्प्रेरित कार्य के साथ.साथ कोई अन्य आपराधिक कार्य भी कर दिया जाता है या दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न कार्य कर दिया जाता है। धारा 115 और 116 उस स्थिति में दण्ड का प्रावधान करती है जब दुष्प्रेरित कार्य नहीं किया जा सका हो या यदि किया भी गया हो तो विफल रहा हो या आंशिक रूप से ही सफल रहा हो।

धारा 109 से 117 में उपर्युक्त विभिन्न स्थितियों में दुष्प्रेरण के अपराध के लिए विभिन्न दण्ड का उपबंध किया गया है। दण्ड की समस्त योजना को निम्नलिखित डायग्राम के माध्यम से समझा जा सकता है
इस धारा के अनिवार्य अवयव निम्नलिखित हैं-
1. दुष्प्रेरण का अपराध किया गया हो
2. ऐसे दुष्प्रेरण के अनुसरण में कार्य किया गया हो
3. उस कार्य के दुष्प्रेरण के लिए संहिता में कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं हो
ऐसे दुष्प्रेरण के लिए दण्ड वही होगा जो उस अपराध के लिए संहिता में उपबंधित है।
इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि के लिए अलग से आरोप लगाना आवश्यक नहीं है। यदि अभियुक्त पर मुख्य अपराध के लिए आरोप लगाया गया हो और वह साबित नहीं हो पाया लेकिन दुष्प्रेरण का अपराध गठित होता है पर इसके लिए आरोप नहीं है तो भी उसे दुष्प्रेरण के लिए दोषी ठहराया जा सकता है।
धारा 110
धारा 110 को धारा 108 के स्पष्टीकरण 3 के साथ पढ़ने से स्पष्ट होता है कि अगर दुष्प्रेरित ने दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से भिन्न कार्य किया है और वह कार्य दुष्प्रेरण का अधिसंभाव्य परिणाम है और वह दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया है, तो दुष्प्रेरक व्यक्ति किए गए कार्य के लिए दण्डनीय होगा। (पर यदि वह कार्य अधिसंभाव्य परिणाम न हो तो वह उस कार्य के लिए दण्डनीय नहीं होगा।
धारा 110 के मुख्य अवयव हैं-
1. दुष्प्रेरण का अपराध किया गया हो
2. ऐसे दुष्प्रेरण के अनुसरण में कार्य किया गया हो
3. लेकिन वास्तव में दुष्प्रेरित व्यक्ति ने जो आपराधिक कार्य किया गया है उसका दुष्प्रेरण नहीं किया गया था और दुष्प्रेरक का न तो वह आशय था न ही उसका ज्ञान था, दुष्प्रेरक उस अपराध के लिए दण्डित होगा जिसके लिए उसने वास्तव में दुष्प्रेरण किया था।
धारा 111
अगर दुष्प्रेरित ने दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से भिन्न कार्य किया है, और वह कार्य दुष्प्रेरण का अधिसंभाव्य परिणाम है, और वह कार्य दुष्प्रेरण के कारण किया गया, तो दुष्प्रेरक व्यक्ति उस अपराध के लिए दण्डित होगा जो वास्तव में किया गया है। लेकिन अगर वह कार्य अधिसंभाव्य परिणाम न हो तो वह उस कार्य के लिए दण्डनीय नहीं होगा।
धारा 111 के अन्तर्गत दण्डित होने के लिए अनिवार्य अवयव हैः
1. दुष्प्रेरण किया गया हो
2. इस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप वह कार्य किया गया हो
3. लेकिन दुष्प्रेरित कर्ता ने वास्तव में अपराध किया हो वह दुष्प्रेरक के लिए आशयित नहीं था अर्थात् उस कार्य के लिए दुष्प्रेरण नहीं किया गया था (उदाहरण के लिए दुष्प्रेरक ने किसी शिशु को क के भोजन में विष देने के लिए दुष्प्रेरण किया लेकिन शिशु ने ख के भोजन में वह विष मिला दिया। किसी व्यक्ति को एक गृह में आग लगाने के लिए दुष्प्रेरित किया लेकिन आग लगाने के दौरान दुष्प्रेरित व्यक्ति वहाँ चोरी भी करता है। दुष्प्रेरक किसी व्यक्ति को लूट के लिए अर्द्धरात्रि में बसे हुए गृह का भेदन करने के लिए दुष्प्रेरित करता है और इसके लिए उसे आयुध देता है लेकिन दुष्प्रेरित व्यक्ति वहाँ हत्या कर देता है।)
दुष्प्रेरक उसी तरह दण्डनीय होगा जैसे उसने उसी कार्य के लिए दुष्प्रेरण किया था जो वास्तव में किया गया था। उपर्युक्त पहले और तीसरे उदाहरण में किया गया कार्य दुष्प्रेरित का अधिसंभाव्य परिणाम है इसलिए दुष्प्रेरक व्यक्ति इस कार्य के लिए भी उसी तरह दण्डनीय होगा जैसे कि उसने उस कार्य के लिए दुष्प्रेरण किया हो लेकिन दूसरे उदाहरण में चोरी का कार्य दुष्प्रेरित कार्य अर्थात् आग लगाने का अधिसंभाव्य परिणाम नहीं है इसलिए दुष्प्रेरक केवल उसी कार्य के लिए दण्डित होगा जिसके लिए उसने वास्तव में दुष्प्रेरण किया है।
इस धारा के पीछे यह आधार विचार है कि ‘‘व्यक्ति के कार्यों का स्वाभाविक परिणाम ही उसका आशय है (every man is presumed to intend the natural consequences of his act)”

धारा 112
अगर दुष्प्रेरित कार्य के अतिरिक्त अन्य अपराधिक कार्य भी किया जाय, जिसकी संभावना थी, तो दुष्प्रेरक ऐसे प्रत्येक कार्य के लिए दण्डनीय है। धारा 111 में अन्तनिर्हित सिद्धांत ही इस धारा में भी है केवल अधिसंभाव्य परिणाम के स्थान पर संभावना की बात करता है। इसका तात्पर्य यह है कि यह दुष्प्रेरक का दायित्व धारा 111 की तुलना में थोड़ा और विस्तृत करता है।
धारा 112 के अन्तर्गत दण्डित होने के लिए निम्न अवयवों की उपस्थिति आवश्यक है-
- दुष्प्रेरण किया गया हो
- इस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप वह कार्य किया गया हो
- लेकिन दुष्प्रेरित कर्ता ने जिस अपराध का दुष्प्रेरण किया गया था उसके साथ अन्य अपराध भी कर दिया जिसके लिए दुष्प्रेरक ने दुष्प्रेरण नहीं किया था
- किया गया अन्य कार्य दुष्प्रेरित कार्य का संभाव्य परिणाम था। उदाहरण के लिए किसी लोक सेवक के कार्य को अवरूद्ध करने के लिए दुष्प्रेरण किया गया हो लेकिन दुष्प्रेरित व्यक्ति ने इस क्रम में उस लोक सेवक को उपहति पहुँचा दिया हो।
ऐसी स्थिति में दुष्प्रेरक किए गए प्रत्येक कार्य के किए दण्डनीय होगा।
धारा 113
यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति कोई ऐसा अपराध करता है
धारा 114
धारा 114 उन मामलों में प्रवर्तनीय होता है जहाँ-
1. अपराध के लिए दुष्प्रेरण हुआ है,
2. दुष्प्रेरित अपराध वास्तव में कारित हुआ है
3. दुष्प्रेरक घटनास्थल पर विद्यमान रहा है
कभी कभी वास्तविक उपस्थिति अस्पष्ट होती है। इसे सिद्ध करने के लिए यह अवधारणा है कि वास्तविक उपस्थिति एवं पूर्व दुष्प्रेरण का अर्थ भागीदारी के अतिरिक्त कुछ नहीं हो सकता है। यह अवधारणा मामले को धारा 34 के अन्तर्गत लाता है। अर्थात् अगर दुष्प्रेरित अपराध कारित हो और दुष्प्रेरक अनुपस्थित रहता है तो वह धारा 109 के अधीन दण्डनीय है लेकिन अगर वह कार्य होते समय घटनास्थल पर मौजूद रहता है तो यह माना जाएगा कि उसने स्वयं अपराध किया है और प्रमुख कर्ता की तरह दण्डनीय होगा।
दुष्प्रेरण का अपराध वास्तविक अपराध कारित होने से पहले ही सम्पन्न हो जाना चाहिए।
इस धारा के प्रवर्तन के लिए यह आवश्यक है कि एक व्यक्ति किसी अपराध का दुष्प्रेरण एक स्थान पर करे तत्पश्चात् अपराध कारित होते समय घटनास्थल पर उपस्थित रहे। अतः सर्वप्रथम यह सिद्ध होना चाहिए कि वह व्यक्ति दुष्प्रेरण के लिए दोषी है ताकि यदि वह अनुपस्थित रहता तो दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय होता। तत्पश्चात् यह सिद्ध किया जाना चाहिए कि वह अपराध के समय घटनास्थल पर उपस्थित था।
यह धारा वहाँ लागू नहीं होती जहाँ दुष्प्रेरण अपराध होते समय किया जाता है तथा दुष्प्रेरक अपराध कारित करने में मदद करता है। उदाहरण के लिए क ख को, जो विकृतचित्त है, ग के घर में आग लगाने के लिए दुष्प्रेरित करता है। पर ख आग ग के घर में नहीं लगा कर घ के घर में लगा देता है। आग लगाते समय क वहाँ उपस्थित था यद्यपि उसने इस कार्य में ख की कोई मदद नहीं की। ख विकृतचित्त होने के कारण किसी अपराध का दोषी नहीं है लेकिन क इस तरह दण्डनीय होगा जैसे उसने स्वयं आग लगाया हो। यहाँ घटनास्थल पर उपस्थित होने का अर्थ यह नहीं है कि वह सम्पूर्ण घटना को देखे या सुने या सम्पूर्ण घटनावधि में उपस्थित रहे। अपितु उपस्थिति शब्द का अर्थ है सहायता प्रदान करने हेतु पर्याप्त नजदीक होना (बिंग्ले, R & R 446)
धारा 114 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए धारा 107 के तहत अपराध सिद्ध होना आवश्यक है। अर्थात् धारा 107 के सभी अवयव हो और दुष्प्रेरक घटनास्थल पर स्वयं उपस्थित भी हो।
| धारा 114 और धारा 34 में अंतर | |
| धारा 114 | धारा 34 |
| अभियुक्त दुष्प्रेरण के अपराध के लिए दण्डनीय होता है पुनःघटनास्थल पर उपस्थित रहता है, भले ही उसने अपराध कारित करने में भाग लिया हो या नहीं। दुष्प्रेरक मुख्य अभियुक्त की तरह दण्डनीय होगा।इसमें दुष्प्रेरण मूल तत्व है।घटनास्थल पर केवल उपस्थिति तभी मुख्य अभियुक्त की तरह दण्डनीय बनाता है यदि दुष्प्रेरण का अपराध सिद्ध हो चुका हो। अर्थात् यह दुष्प्रेरण के अतिरिक्त किसी अन्य अपराध में नहीं लगता है।यह तब भी दण्डनीय है जब मुख्य कर्ता आपराधिक दायित्व से मुक्त होता है क्योंकि दुष्प्रेरक का अपराध मुख्य कर्ता के अपराध से अलग होता है।5. यह धारा एक विधिक परिकल्पना प्रतिपादित करती है जिसके कारण यह माना जाता है कि दुष्प्रेरक ने स्वयं वह अपराध किया है क्योंकि अपराध होते समय वह घटनास्थल पर उपस्थित था। | कई लोग मिल कर किसी सामान्य आशय को अग्रसर करने के लिए कोई कार्य करते हैं, तो उनमें से प्रत्येक का वही दायित्व होगा जैसे कि उस कार्य को उसने अकेले किया हो।इसमें सामान्य आशय मूल तत्व है।यह केवल दुष्प्रेरण तक सीमित नहीं है बल्कि संहिता में वर्णित सभी अपराधों पर लागू होता है।इस धारा के अन्तर्गत इस स्थिति में दण्ड नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसके लिए सभी का सामान्य आशय होना आवश्यक है।यह धारा एक विधिक परिकल्पना प्रतिपादित करती है कि किसी सामान्य आशय को अग्रसर करने में यदि कई लोग मिल कर आपराधिक कार्य करते हैं और उन सबकी भूमिका अलग होती है तो यह माना जाएगा कि उनमें से प्रत्येक ने वह कार्य अकेले किया है। |
| दुष्प्रेरक का आपराधिक दायित्वः यदि अपराध कारित हो जाय | ||||
| धारा | अवयव | दुष्प्रेरण का परिणाम | उदाहरण | आपराधिक दायित्व एवं दंड |
| 109 | दुष्प्रेरण किया जाता हैंदुष्प्रेरण के फलस्वरूप वह कार्य किया जाता हैसंहिता में इस दुष्प्रेरण के लिए किसी दण्ड का उपबंध नहीं है | दुष्प्रेरित अपराध सफलतापूर्वक कारित होता है | दुष्प्रेरक किसी लोक सेवक का रिश्वत देने की प्रस्थापना करता है जो प्रतिग्रहित कर लिया जाता हैदुष्प्रेरक के उकसाने के परिणामस्वरूप दुष्प्रेरित व्यक्ति मिथ्या साक्ष्य देने का अपराध करता है।एक षड्यंत्र के अनुसरण में दुष्प्रेरक किसी व्यक्ति का विष उपलब्ध कराता है ताकि इससे वह किसी व्यक्ति की हत्या कारित करे और तदनुरूप हत्या होती है। | दुष्प्रेरक का विधिक दायित्व वही है जो मुख्य कर्ता का है और वह उसी दण्ड से दण्डनीय है जिसका उपबंध संहिता में उस अपराध के लिए किया गया है। |
| 110 | दुष्प्रेरण किया जाता हैदुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप वह कार्य किया जाता हैपर दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से भिन्न आशय या ज्ञान से कार्य करता है | दुष्प्रेरित अपराध सफलतापूर्वक किया जाता है यद्यपि उसके करने का आशय या ज्ञान दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से भिन्न होता है। | दुष्प्रेरित व्यक्ति विकृतचित्त, शिशु या मत्तता में हो या भ्रम या भूलवश वह कार्य कर रहा हो। अतः उसका ज्ञान या आशय दुष्प्रेरक से भिन्न है। उदाहरण के लिए क एक विकृतचित्त व्यक्ति ख को उकसा कर ग की हत्या कारित कराता है। मुख्य कर्ता ख का आशय यद्यपि हत्या कारित करने का नहीं था और इसलिए वह दण्डनीय नहीं है लेकिन क हत्या के लिए दण्डनीय है। | दुष्प्रेरक किए गए कार्य के लिए उसी आशय और ज्ञान के लिए उत्तरदायी है जो दुष्प्रेरित करते समय उसका था भले ही मुख्य कर्ता का ज्ञान या आशय उससे भिन्न है। |
| 11 | दुष्प्रेरण किया गया हैदुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप वह कार्य किया गया हैलेकिन किया गया कार्य वास्तव में उससे भिन्न होता है जिसके लिए दुष्प्रेरण किया गया था।किया गया कार्य दुष्प्रेरित कार्य का अधिसंभाव्य परिणाम है | दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप कार्य किया जाता है लेकिन जो कार्य किया जाता है उसके लिए दुष्प्रेरक ने दुष्प्रेरण नहीं किया था बल्कि किसी अन्य अपराध के लिए किया था। | दुष्प्रेरक किसी शिशु को किसी व्यक्ति के भोजन में विष मिलाने के लिए उकसाता है लेकिन शिशु किसी अन्य व्यक्ति के भोजन में विष मिला देता हैदुष्प्रेरक किसी व्यक्ति को किसी बसे हुए गृह में लूट के लिए रात्रौ गृहभेदन के लिए दुष्प्रेरित करता है और आयुध देता है। पर वह व्यक्ति गृहभेदन के दौरान वहाँ हत्या भी कारित कर देता हैदुष्प्रेरक किसी व्यक्ति को किसी के घर में आग लगाने के लिए दुष्प्रेरित करता है लेकिन वह आग लगाने के दौरान चोरी भी कर लेता हैपहले और दूसरे उदाहरण में अन्य व्यक्ति को विष देना और हत्या कारित करना ऐसा अपराध है जिसके लिए यद्यपि दुष्प्रेरण नहीं किया गया था पर यह दुष्प्रेरित कार्य का अधिसंभाव्य परिणाम है। लेकिन तीसरे उदाहरण में चोरी आग लगाने के कार्य का अधिसंभाव्य परिणाम नहीं है। | दुष्प्रेरक का दायित्व ऐसे होगा जैसे उसने उसी कार्य के लिए दुष्प्रेरण किया है जो वास्तव में किया गया है बशर्ते वह कार्य दुष्प्रेरित कार्य का अधिसंभाव्य परिणाम है और तदनुसार वह दण्डनीय होगा। |
| 112 | दुष्प्रेरण किया गया हैउस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप वह अपराध किया गया हैइस अपराध को करने के क्रम में कोई अन्य अपराध कर दिया गया है जिसके लिए दुष्प्रेरण नहीं किया गया थाकिया गया अन्य अपराध दुष्प्रेरित कार्य का अधिसंभाव्य परिणाम है। | दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप कोई कार्य वास्तव में किया जाता है पर साथ ही कोई अन्य कार्य भी कर दिया जाता है जिसके लिए दुष्प्रेरण नहीं किया गया था किंतु वह दुष्प्रेरित कार्य का अधिसंभाव्य परिणाम है अर्थात् कार्य की प्रकृति ऐसी थी कि इस कार्य की संभावना थी | दुष्प्रेरक किसी व्यक्ति को एक लोक सेवक के कार्य को अवरूद्ध करने के लिए दुष्प्रेरित करता है। लेकिन वह व्यक्ति कार्य को अवरूद्ध करने के दौरान लोक सेवक को घोर उपहति कारित कर देता है। यहाँ उस व्यक्ति ने दो सुभिन्न अपराध किया है जिनमें से केवल एक के लिए दुष्प्रेरण किया गया था। दूसरे कार्य के लिए यद्यपि दुष्प्रेरण नहीं किया गया था पर वह उस कार्य का अधिसंभाव्य परिणाम था जिसके लिए वह दुष्प्रेरण किया गया था। | दुष्प्रेरक का दायित्व इस तरह होगा जैसे उसने किए गए सभी कार्यों के लिए दुष्प्रेरण किया हो और तदनुरूप वह ऐसे प्रत्येक कार्य के दुष्प्रेरण के लिए दण्डनीय होगा। |
| 113 | दुष्प्रेरण किया गया हैदुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप कार्य किया गया हैलेकिन जो कार्य का जो परिणाम या प्रभाव हुआ हैै वह दुष्प्रेरक का आशय नहीं थापर जो परिणाम या प्रभाव हुआ है उसकी संभावना का ज्ञान दुष्प्रेरक को था। | दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप कार्य किया जाता है लेकिन परिणाम दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न निकलता है। पर इस भिन्न परिणाम की संभावना का ज्ञान दुष्प्रेरक को था। | दुष्प्रेरक ने किसी व्यक्ति की घोर उपहति कारित करने के लिए किसी को दुष्प्रेरित किया। इस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप उस व्यक्ति ने घोर उपहति कारित किया जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई। दुष्प्रेरक ने यद्यपि मृत्यु कारित करने का दुष्प्रेरण नहीं किया था लेकिन घोर उपहति के परिणास्वरूप मृत्यु कारित होने की संभावना का ज्ञान उसको था। | दुष्प्रेरक उस अपराध या प्रभाव के लिए उत्तरदायी होगा जो वास्तव में कारित हुआ है और यह माना जाएगा कि उसने उसी कार्य के लिए दुष्प्रेरण किया था और तदनुसार दण्डनीय होगा। |
| दुष्प्रेरक के आपराधिक दायित्वः यदि अपराध कारित नहीं हो | ||||
| 115 | दुष्प्रेरण किया गया हैदुष्प्रेरण उस अपराध के लिए किया गया है जो मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय है।इस संहिता में ऐसे दुष्प्रेरण के लिए दण्ड का प्रावधान नहीं है। | दुष्प्रेरित अपराध या तो किया नहीं जा सका या यदि किया भी गया तो उसका परिणाम उससे कम रहा जिसका आशय दुष्प्रेरक ने किया था। | दुष्प्रेरक किसी की हत्या कारित करने के लिए दुष्प्रेरण करता है, जो कि मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध है। दुष्प्रेरित व्यक्ति या तो हत्या करने से मना कर देता है या अगर प्रयास करता भी है तो हत्या कारित नहीं हो पाता। | दंड- अगर कार्य नहीं किया जाय तो सात वर्ष तक की कारावास और जुर्माना। कारावास कठोर या सादा हो सकता है। यदि कार्य कर दिया गया हो और आंशिक रूप से सफल रहा हो तो चौदह वर्ष तक का कारावास और जुर्माना। कारावास कठोर या सादा हो सकता है। |
| 116 | दुष्प्रेरण किया गया है दुष्प्रेरण उस अपराध के लिए किया गया है जो कारावास से दण्डनीय है ऐसे दुष्प्रेरण के लिए इस संहिता में अभिव्यक्त रूप से किसी दण्ड का प्रावधान नहीं है। | दुष्प्रेरित कार्य किया नहीं गया दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति लोक सेवक है जिसका कर्तव्य अपराध को रोकना है | दुष्प्रेरक किसी लोक सेवक का रिश्वत देने की प्रस्थापना करता है दुष्प्रेरक किसी व्यक्ति को मिथ्या साक्ष्य देने के लिए दुष्प्रेरित करता है | यदि दुष्प्रेरित कार्य नहीं किया जाय तो उस अपराध के लिए उपबंधित अधिकतम कारावास की अवधि का एक-चौथाई, जो कि कठोर या सादा और जुर्माना सहित या रहित हो सकता है यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित लोक सेवक है तो उस अपराध के लिए उपबंधित कारावास के अधिकतम अवधि का आधा, जो सादा या कठोर और जुर्माने सहित या रहित हो सकता है। |


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