राज्य के विरूद्ध अपराधों के विषय में-अध्याय 6
इनमें पाँच तरह के अपराधो के विषय में उपबंध हैं:
1. भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध (धारा 121, 121क, 122, 123)
2. राष्ट्रपति, राज्यपाल आदि पर हमला (धारा 124)
3. राजद्रोह (धारा 124क)
4. शांति शक्तियों के विरूद्ध युद्ध (धारा 125, 126, 127)
5. राजकैदियों को भागने में मदद (धारा 128, 129, 130)
धारा 121
यह संहिता में शामिल सबसे जघन्य अपराधों में से एक है जिसके लिए मृत्यु दण्ड का प्रावधान है।
इस धारा के तहत अपराध गठित होने के लिए दन दो शर्तों का पूरा होना अनिवार्य हैः
1. अभियुक्त
क. युद्ध करे, या
ख. युद्ध करने का प्रयत्न करे, या
ग. युद्ध करने का दुष्प्रेरण करे
2. ऐसा युद्ध भारत सरकार के विरूद्ध हो
मगन लाल राधा कृष्ण बनाम एम्परर (ए. आई. आर. 1946 नाग. 173) में इस अपराध के निम्नलिखित गुण बताये गये हैं:
- इस अपराध को गठित करने के लिये व्यक्तियों की किसी विशिष्ट संख्या की आवश्यकता नहीं होती है;
- सम्बधित व्यक्तियों की संख्या तथा उसके सुसज्जित होने की प्रकृति महत्वहीन है;
- वास्तविक परीक्षण यह है कि ‘‘किस आशय‘‘ से वे एकत्र हुये हैं;
- जमघट का उद्देश्य बल और हिंसा के प्रयोग द्वारा किसी सामान्य लोक प्रकृति के उद्देश्य की प्राप्ति और शासक के प्राधिकारों को प्रभावित करना होना चाहिये;
- मुख्य कर्ता तथा सहायक कर्ता में कोई अंतर नहीं है। जो कोई भी अवैध कार्य में भाग लेता है उसी अपराध का दोषी होगा।
(भारतीय दण्ड संहिता, प्रो. सूर्य नारायण मिश्र, पृष्ठ 275)
सामान्यतः मुख्य कर्ता तथा प्रयत्न या दुष्प्रेरण करने वालों के दण्ड में कुछ अंतर होता है लेकिन इस धारा में तीनो का आपराधिक दायित्व समान माना गया है। अगर कोई व्यक्ति सरकार के विरूद्ध लोगों को वैचारिक रूप से उकसाता है या उत्तेजित तो वह राजद्रोह होगा, किन्तु राज्य के विरूद्ध युद्ध नहीं। लेकिन यदि वह स्पष्टतः एवं निश्चयतः किसी कार्यवाही को उकसाता है तो यह भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध छेड़ना होगा। (गणेश डी सावरकर, (1909) 12 बाम्बे लॉ रि. 105) इसी केस में कविताओं के माध्यम से सरकार एवं श्वेत शासकों के विरूद्ध रक्त पिपासा एवं घातक उत्कंठाओं को प्रेरित करना, हथियार धारण करने के लिए असंदिग्ध भाषा में विचार प्रतिपादित करना, गुप्त संस्थाओं के निर्माण और गुरिल्ला युद्ध पद्धति को अपनाने का सुझाव देना, भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध छेड़ने के लिए दुष्प्रेरण माना गया।
भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध छेड़ने के अपराध के लिये अपराधियों की कोई विशिष्ट संख्या, अपराध का कोई विशिष्ट तरीका, किसी विशिष्ट तरीके से एकत्र होना या आयुध एकत्रित करना इत्यादि कोई और शर्त नहीं है। बल्कि इसका मूल तत्त्व अपराध का प्रयोजन है। इस धारा में जो कोई भी शब्द आया है इसलिए इसमें अभियुक्त भारतीय या विदेशी कोई भी हो सकता है यदि उसका प्रयोजन भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध, इसके लिए प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना हो, तो।
लेकिन सरकार बदलने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से किया गया प्रयत्न युद्ध नहीं माना जाएगा जब तक कि उसमें बल या हिंसा का प्रयोग नहीं हो। यदि कोई व्यक्ति कुछ व्यक्तियों का चयन करता है ताकि वह मौजूदा सरकार को हटाने में सहयोग करे और जो ऐसा सहयोग नहीं करते उसे दण्ड देता है, तो यह बल प्रयोग होने के कारण इस धारा के तहत अपराध है। इसी तरह किसी शस्त्रागार पर आक्रमण कर शस्त्रों पर कब्जा करने का अर्थ युद्ध नहीं होगा जब तक कि धारा के लिये आवश्यक अवयव सिद्ध न हो जाय। लेकिन अगर सरकारी सेना पर जानबूझ कर संगठित रूप से आक्रमण किया जाय जिसका उद्देश्य सशस्त्र सेना एवं हिंसा द्वारा लोक सेवकों को अपने आधिपत्य में करना और सामान्य टैक्स वसूली को स्थगित करना हो, तो यह युद्ध छेड़ने का अपराध होगा। (ओंग लॉ बनाम एम्परर (ए आई आर 1931 रंगून 235, पृ 239)
S. 121 deals with 3 aspects viz. abetment, attempt and actual war. The action is unique in itself as it places all the three aspects at par as regards the punishment. The first reform came in the year of 1870 where it was made illegal for conspiring against the nation itself. This was introduced in the form of section 121 A and 121 B. the position changed in 1913 when the Criminal Law Amendment Act came into force. It passes an emergency piece of legislation which gave an extended effect to the law of conspiracy of India. This added two new sections that are s. 120A and 120B of IPC. It was added in chapter V in which widened the scope of the conspiracy.
धारा 121क
यह धारा संहिता में संशोधन अधिनियम सं. 27 द्वारा 1870 में शामिल किया गया ।
धारा 121 द्वारा गठित अपराध अर्थात् भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध छेड़ने के अपराध को षड्यंत्र के माध्यम से करने और केन्द्र या राज्य सरकार को आतंकित करने के लिए यह धारा दण्ड की व्यवस्था करता है।
धारा 121क के तहत अपराध गठित होने के लिये निम्न अवयव आवश्यक हैंः
1. कोई षड्यंत्र किया जाय
2. यह षड्यंत्र धारा 121 में वर्णित अपराध अर्थात् भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करने, युद्ध करने का प्रयत्न करने या युद्ध करने के लिये दुष्प्रेरण करने, के लिये हो; अथवा
3. केन्द्र या राज्य सरकार को (1) आपराधिक बल, या (2) आपराधिक बल के प्रदर्शन द्वारा आतंकित करने के लिये हो।
धारा 121 में वर्णित अपराध के लिये षड्यंत्र देश के बाहर हो या देश के अंदर हो, वह इस धारा के तहत दण्डनीय है।
धारा 121क के अनुसार षड्यंत्र राज्य या केन्द्र सरकार को आतंकित करने (आपराधिक बल या इसके प्रदर्शन द्वारा) के लिये होना आवश्यक है। अतः केवल सामान्य विद्रोह (insurrection) के लिये षड्यंत्र ही नहीं बल्कि घातक बल्वा (serious riot) या एक विशाल एवं उपद्रवी अवैध सभा भी सम्मिलित है। आतंकित शब्द का अर्थ केवल आशंका या भय से अधिक होता है। यह आतंक लोक सम्पत्ति को या सामान्य जनता की सुरक्षा पर खतरे के कारण भी हो सकता है। षड्यंत्र चूँकि आपराधिक बल या इसके प्रदर्शन द्वारा आतंकित करने के लिये होना चाहिए इसलिये अगर सरकार में किसी परिवर्तन के लिये कोई षड्यंत्र किया जाय, लेकिन इसमें आपराधिक बल या इसके प्रदर्शन द्वारा आतंकित करने का उद्देश्य न हो तो वह इस धारा के तहत दण्डनीय नहीं होगा।
धारा 122
इस धारा के तहत अपराध गठित करने के लिए अनिवार्य अवयव हैं-
1. आदमियों, आयुधों या गोलाबारूदों इत्यादि को एकत्र करना;
2. ऐसा एकत्रण युद्ध या युद्ध की तैयारी के आशय से किया जाय;
3. अभियुक्त किसी न किसी तरह से इस एकत्रण में हिस्सा ले; और
4. ऐसा युद्ध या युद्ध की तैयारी भारत सरकार के विरूद्ध हो।
यह धारा युद्ध के लिये तैयारी को दण्डनीय बनाती है, प्रयत्न को नहीं, क्योंकि प्रयत्न धारा 121 के द्वारा दण्डनीय है।
धारा 123
इस धारा के तहत अपराध गठित करने के लिए अनिवार्य अवयव हैं-
1. भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध के परिकल्पना अर्थात् योजना के अस्तित्व की उपस्थितिए
2. अभियुक्त को ऐसी परिकल्पना का ज्ञान
3. जानते हुए भी इस तथ्य को छिपाया जाना
4. ऐसा छिपाव इस आशय से किया जाय कि इससे भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध सुकर बनेगा।

केस
1. मो. अजमल कसाब बनाम महाराष्ट्र राज्य (बेंच- आफताब आलम, चन्द्रमौली प्रसाद)
2. नवजोत सिंह सिंद्धू एवं मो. आरीफ बनाम स्टेट और दिल्ली (संसद पर हमला केस)
3. शौकत हुसैन गुरू बनाम स्टेट ऑफ दिल्ली एवं अन्य (14.5.2008)
राष्ट्रपति, राज्यपाल आदि पर हमला (धारा 124)
धारा 124 के तहत अपराध गठित होने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य तत्त्व हैं-
1. यह भारत के राष्ट्रपति या राज्यों के राज्यपाल के विरूद्ध कारित अपराध है;
2. अभियुक्त राष्ट्रपति या राज्यपाल के विरूद्ध निम्न में से कोई कार्य करे-
(1) हमला या हमला करने का प्रयत्न करेए
(2) सदोष अवरोध या उसका प्रयत्न करेए या
(3) आपराधिक बल का प्रयोग अथवा इसका प्रदर्शन करने द्वारा उन्हें आतंकित करे
3. ऐसा कार्य वह इसलिए करे कि वह राष्ट्रपति या राज्यपाल- (1) अपने पद के किसी विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग करने, या (2) ऐसे ऐसे किसी शक्ति के प्रयोग से विरत रहने, के लिये उत्प्रेरित हो या विवश हो।
राजद्रोह (धारा 124क)
धारा 124क
इस धारा को 1870 के संशोधन द्वारा संहिता में शामिल किया गया था। बाद में 1898 में इसमें संशोधन हुआ और यह अपने वर्तमान रूप में आया।
इस धारा के तहत अपराध गठित होने के लिए निम्न अवयवों की उपस्थिति अनिवार्य हैः
- भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति (1) घृणा या अवमान उत्पन्न करे, या (2) घृणा या अवमान उत्पन्न करने का प्रयत्न करे, या (3) अप्रीति प्रदीप्त करने का प्रयत्न करे
- ऐसा वह (1) बोले या लिखे गए शब्दों द्वारा, या (2) संकतों द्वारा, या (3) दृश्यरूपण (visible representation) द्वारा करे।
इस धारा में अपराध और प्रयत्न दोनों को समान स्तर पर दण्डनीय बनाया गया है। डाक द्वारा किसी ऐसे पैकेट का भेजा जाना जिसमें राजद्रोही प्रकाशन के पांडुलिपि की एक प्रति बन्द है तथा साथ में एक पत्र है जिसमें पावती से प्रार्थना किया गया है कि उसे अन्य लोगों में वितरित करे कितु यह पैकेट एक दूसरे व्यक्ति को मिल गया और पावती तक कभी नहीं पहुँच सका। इसे इस धारा के तहत अपराध कारित करने का प्रयत्न माना गया। (सुरेश नारायण आदिचार्या वाद, (1911) 39 कल. 522)। लेकिन अप्रकाशित रचना यदि लेखक के पास ही हो और किसी को भेजा नहीं गया हो तो वह इस धारा के तहत अपराध नहीं गठित करता है। चूँकि राजद्रोह के अपराध के लिये लेखन नहीं बल्कि उसका प्रकाशन और उसके पीछे का आशय अपराध है इसलिये मुद्रक, प्रकाशक, प्रेस मालिक और प्रोपराइटर भी लेखक की तरह ही आपराधिक दायित्व के अधीन होंगे जब तक कि वे सिद्ध न कर देते कि उन्हें राजद्रोही प्रकाशन का ज्ञान नहीं था। दूसरे समाचार पत्रों या विदेशी समाचार पत्रों को उद्धृत करते हुए लिखे गये राजद्रोही सामग्री भी इस धारा के अधीन दण्डनीय है भले ही उसे न्यायिक वाद के संदर्भ में प्रकाशित किया गया हो क्योंकि इनका पुनः प्रकाशन न्यायालय की रिपोर्ट नहीं होता है।
यह धारा संशोधन अधिनियम द्वारा 1870 में संहिता में जोड़ा गया। 1898 में इसमें पुनः संशोधन कर स्पष्टीकरणों को सम्मिलित किया गया। यह धारा शुरू से ही विवादों को आकर्षित करती रही है। इसमें प्रयुक्त ‘‘अप्रीति‘‘ शब्द के विषय में विभिन्न न्यायालयों ने भिन्न मत व्यक्त किया। अजादी के बाद जब संविधान लागू हुआ, तब इसे अभिव्यक्ति की आजादी के अनुच्छेद 19 (1)(ह) के मौलिक अधिकार की अवहेलना मानते हुए चुनौती दी गई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा की वैधता को मान्यता दिया। रमें श थापर वाद (AIR 1950 SC 124), ब्रिजभूषण वाद (AIR 1950 SC 129) तथा केदारनाथ सिंह वाद आदि में सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा की वैधता पर विचार किया था।
इस धारा के अन्तर्गत अपराध गठित करने के लिये ‘‘भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करना या करने का प्रयत्न करना” तथा ‘‘अप्रीति प्रदीप्त” करना या ऐसा करने का प्रयत्न करना ही पर्याप्त है। यह आवश्यक नहीं है कि अभियुक्त विद्रोह (rebellion) या गदर (mutiny) या किसी अन्य प्रकार की अशांति उत्तेजित करे या इसका प्रयत्न करे। इस धारा के अन्तर्गत अपराध का सार यह है कि किस आशय से भाषा का प्रयोग किया गया है। अर्थात् आशय के बिना अपराध गठित नहीं होगा। लेखक का आशय और पढ़ने वालों पर उसका प्रभाव प्रकाशन के समय, स्थान, परिस्थिति तथा अवसर से प्रभावित होते हैं इसलिए न्यायालयों को इन्हें भी ध्यान में रखना चाहिए।
इस धारा के अन्तर्गत अपराध तभी होगा जब घृणा, अवमान या अप्रीति ‘‘भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार” के विरूद्ध हो, किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह के प्रति नहीं। उदाहरण के लिये मुस्लिम युवा लीग के अध्यक्ष ने दिल्ली में एक सभा में यह कहा कि भारत ने कश्मीर के विरूद्ध आक्रमण का कार्य किया है, इसलिये भारत में मुसलमानों को सरकार के विरूद्ध विद्रोह करके उसे कश्मीर के हट जाने के लिए विवश करना चाहिए। उसने कश्मीरियों को यह सलाह दी कि उन्हें राज्य के कर अदा नहीं करना चाहिए। मुस्लिम युवा लीग के अध्यक्ष अपने इस भाषण हेतु राजद्रोह के अपराध के दोषी हैं क्योंकि उन्होंने अपने भाषण द्वारा भारत सरकार के विरूद्ध अप्रीति उत्तेजित करने का प्रयत्न किया है। उनका यह कार्य भारत के प्रति अनिष्ठापूर्ण है। भले ही भारत में प्रजातंत्र है पर उनका यह भाषण किसी व्यक्ति के विरूद्ध नहीं होकर विधि द्वारा स्थापित भारत सरकार के विरूद्ध है। कश्मीरियों को विद्रोह के लिये उकसाना और कर अदा न करने की सलाह देना राजद्रोह का अपराध है। (भारतीय दण्ड संहिता, प्रो. सूर्य नारायण मिश्र, पृष्ठ 280)। पर सरकार के स्वरूप में परिवर्तन का सुझाव देना, या कुछ अधिकारियों की सामान्य आलोचना, किसी मंत्री या पदाधिकारी को हटाने की माँग या संसद द्वारा पारित किसी अधिनियम को निरसित करने के लिये आंदोलन इस धारा के तहत अपराध नहीं है। लेकिन इन कार्यों के लिये अगर अवैध साधनों का प्रयोग किया जाय तो यह अपराध हो जाएगा।
शांति शक्तियों के विरूद्ध अपराध (धारा 125, 126, 127)
धारा 125
इस धारा के तहत अपराध गठित होने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य तत्त्व हैं-
- कोई एशियायी देश हो;
- ऐसा देश भारत को छोड़कर कोई अन्य देश हो;
- ऐसा देश भारत सरकार से मैत्री या शान्ति का संबंध रखता हो।
प्रत्येक राज्य का यह दायित्व होता है कि वह अपने शत्रुओं एवं मैत्रीपूर्ण संबंध रखने वाले शक्तियों के बीच अंतर रखे और उनके प्रति यथोचित दायित्व का निर्वहन करे। इसलिए राज्य का यह दायित्व होता है कि अपनी प्रजा के किसी ऐसी योजना जो मैत्रीपूर्ण शक्तियों के विपरीत हो, का दुष्प्रेरण या किसी प्रयास को प्रतिषिद्ध करे। इसी सिद्धांत के अनुरूप धारा 125 ऐसे भारतीय नागरिकों के उपद्रव से मैत्रीपूर्ण एशियाई शक्तियों को सुरक्षित रखने के लिए उपबंध करता है जो उनके सुरक्षा के विरूद्ध कार्य करते हैं।
धारा 126
इस धारा के तहत अपराध गठित होने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य तत्त्व हैं-
- लूटपाट करना या लूटपाट की तैयारी करना,
- ऐसी लूटपाट भारत सरकार के साथ शान्ति का सम्बन्ध रखने वाली शक्ति के राज्यक्षेत्र में होना चाहिए।
धारा 127
इस धारा के निम्नलिखित अवयव हैं:
1. वह सम्पत्ति-
- भारत सरकार के साथ मैत्री सम्बन्ध रखने वाली एशियाई शक्ति से युद्ध करके प्राप्त की गयी हो; या
- भारत सरकार के साथ शान्ति संबंध रखने वाली शक्ति के राज्य क्षेत्र में लूटपाट करके प्राप्त की गई हो
- यह युद्ध या लूटपाट का अपराध धारा 125 और 126 के अन्तर्गत दण्डनीय हो
- अभियुक्त ने यह सम्पत्ति प्राप्त किया हो
- अभियुक्त ने यह सम्पत्ति यह जानते हुए प्राप्त किया हो कि सम्पत्ति युद्ध द्वारा अथवा लूटपाट द्वारा प्राप्त की गयी है।
धारा 125
इस धारा के तहत अपराध गठित होने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य तत्त्व हैं-
- कोई एशियायी देश हो;
- ऐसा देश भारत को छोड़कर कोई अन्य देश हो;
- ऐसा देश भारत सरकार से मैत्री या शान्ति का संबंध रखता हो।
प्रत्येक राज्य का यह दायित्व होता है कि वह अपने शत्रुओं एवं मैत्रीपूर्ण संबंध रखने वाले शक्तियों के बीच अंतर रखे और उनके प्रति यथोचित दायित्व का निर्वहन करे। इसलिए राज्य का यह दायित्व होता है कि अपनी प्रजा के किसी ऐसी योजना जो मैत्रीपूर्ण शक्तियों के विपरीत हो, का दुष्प्रेरण या किसी प्रयास को प्रतिषिद्ध करे। इसी सिद्धांत के अनुरूप धारा 125 ऐसे भारतीय नागरिकों के उपद्रव से मैत्रीपूर्ण एशियाई शक्तियों को सुरक्षित रखने के लिए उपबंध करता है जो उनके सुरक्षा के विरूद्ध कार्य करते हैं।
धारा 126
इस धारा के तहत अपराध गठित होने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य तत्त्व हैं-
- लूटपाट करना या लूटपाट की तैयारी करना,
- ऐसी लूटपाट भारत सरकार के साथ शान्ति का सम्बन्ध रखने वाली शक्ति के राज्यक्षेत्र में होना चाहिए।
धारा 127
इस धारा के निम्नलिखित अवयव हैं:
1. वह सम्पत्ति-
- भारत सरकार के साथ मैत्री सम्बन्ध रखने वाली एशियाई शक्ति से युद्ध करके प्राप्त की गयी हो; या
- भारत सरकार के साथ शान्ति संबंध रखने वाली शक्ति के राज्य क्षेत्र में लूटपाट करके प्राप्त की गई हो
- यह युद्ध या लूटपाट का अपराध धारा 125 और 126 के अन्तर्गत दण्डनीय हो
- अभियुक्त ने यह सम्पत्ति प्राप्त किया हो
- अभियुक्त ने यह सम्पत्ति यह जानते हुए प्राप्त किया हो कि सम्पत्ति युद्ध द्वारा अथवा लूटपाट द्वारा प्राप्त की गयी है।
| शांति शक्तियों के विरूद्ध अपराध (धारा 125-127) | |||
| धारा | किया जाने वाला अपराध | अपराध किसके प्रति | दंड |
| 125 | युद्ध, यायुद्ध का प्रयत्न, यायुद्ध का दुष्प्रेरण | भारत को छोड़कर कोई एशियायी देश जिसके साथ भारत सरकार का मैत्री या शान्ति का संबंध हो। | आजीवन कारावास जुर्माना सहित या रहित, या सात वर्ष तक के कठोर या सादा कारावास जुर्माना सहित या रहित या जुर्माना |
| 126 | लूटपाट, या लूटपाट की तैयारी | भारत को छोड़कर कोई अन्य देश, जो भारत सरकार के प्रति मैत्री और शान्ति का संबंध रखता है। | सात वर्ष तक का कठोर या सादा कारावास जुर्माना सहित या रहित। ऐसे लूटपाट द्वारा प्राप्त संपत्ति या लूटपाट के लिये प्रयोग में लाई गई या लाने के लिये आशयित सम्पत्ति का समपहरण। |
| 127 | 1. कोई सम्पत्ति किसी से प्राप्त की गई हो 2. ऐसी सम्पत्ति धारा 125 या 126 में वर्णित अपराधों द्वारा कब्जाधारी के पास आया हो। 3. सम्पत्ति यह जानते हुए प्राप्त किया गया हो कि यह उपरोक्त अपराध द्वारा अर्जित है। | – | सात वर्ष तक का कठोर या सादा कारावास जुर्माना सहित या रहित। ऐसे प्राप्त संपत्ति का समपहरण। |
राजकैदियों को भागने में मदद (धारा 128, 129, 130)
धारा 128
इस धारा के तहत अपराध गठित होने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य तत्त्व हैं-
1. अभियुक्त लोक सेवक हो,
2. कैदी उस लोकसेवक की अभिरक्षा में होना चाहिए,
3. कैदी राजकैदी या युद्ध कैदी हो,
4. कैदी ने उस स्थान से पलायन किया हो जहाँ उसे परिरूद्ध किया गया था, तथा
5. अभियुक्त ने स्वेच्छया उसे पलायन करने दिया हो।
धारा 129
इस धारा के तहत अपराध गठित होने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य तत्त्व हैं-
1. अभियुक्त लोक सेवक हो;
2. अभियुक्त अपनी अभिरक्षा में किसी राज्य कैदी को रखता हो;
3. अभियुक्त अपनी उपेक्षा के कारण जिस स्थान पर कैदी को परिरूद्ध किया गया था, उस स्थान से उसे निकल भागने देता है।
धारा 130
इस धारा के तहत अपराध गठित होने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य तत्त्व हैं-
1. राजकैदी या युद्धकैदी विधिपूर्ण अभिरक्षा में हो;
2. अभियुक्त ने ऐसे राजकैदी या युद्धकैदी को-
- निकल भागने में सहायता किया हो;
- या निकल भागने में सहायता करने का प्रयत्न किया हो;
- या ऐसे कैदी को संश्रय दिया हो;
- या एसे कैदी को छिपाया हो;
- ऐसे कैदी को पकड़ने का प्रतिरोध किया हो या प्रतिरोध करने का प्रयत्न किया हो;
3. अभियुक्त ने ऐसा जानबूझ कर किया हो।
इस धारा में “जो कोई” शब्द आया है न कि लोक सेवक इसलिए इस धारा के लिए अभियुक्त का सरकारी कर्मचारी या अधिकारी होना आवश्यक नहीं है।
केस
बाबरी मस्जिद केस
| राजकैदी या युद्धकैदी के भागने में सहायता (धारा 128–130) | |||
| धारा | अभियुक्त | अपराध | दंड |
| 128 | लोक सेवक, जिसकी अभिरक्षा में वह कैदी हो | कैदी को परिरोध स्थान से निकल भागने देगा; ऐसा वह स्वेच्छया करेगा | आजीवन कारावास या दस वर्ष तक का कठोर या सादा कारावास और जुर्माना |
| 129 | लोक सेवक, जिसकी अभिरक्षा में वह कैदी हो | कैदी का परिरोध स्थान से निकल भागना सहन करेगा ऐसा वह उपेक्षा से करेगा | तीन वर्ष तक के सादा कारावास और जुर्माना |
| 130 | कोई भी व्यक्ति, चाहे वह लोक सेवक हो या नहीं | ऐसे कैदी को विधिपूर्ण अभिरक्षा से भागने में सहायता करेगा, या सहायता का प्रयत्न करेगा, या ऐसे भागे हुए कैदी को संश्रय देगा, या ऐसे भागे हुए कैदी को पुनः पकड़े जाने का प्रतिरोध या इसके लिये प्रयत्न करेगा। | आजीवन कारावास, या दस वर्ष तक के कठोर या सादा कारावास और जुर्माना |


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