जमानत क्या है?
सामान्य शब्दों में, जमानत आपराधिक कार्यवाही के दौरान जेल से बाहर रहने की सशर्त अनुमति है। आपराधिक कार्यवाही में पुलिस जांच, न्यायिक जांच और अदालत में मुकदमे का विचारण शामिल हैं। दूसरे शब्दों में, जमानत एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से न्यायालय यह सुनिश्चित करने के बाद कि अभियुक्त मुकदमे की जांच-पड़ताल और दोषी पाए जाने पर सजा के लिए उपलब्ध रहेगा, उसे लंबित आपराधिक कार्यवाही के दौरान जेल में रहने से मुक्ति देता है।
जमानत अभियुक्त को मिलने वाला कोई तात्विक अधिकार (substantive legal right) नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य विचारण या अन्वेषण के दौरान अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करना है।
जमानत क्यों दी जाती है?

जमानत के पीछे सैद्धांतिक आधार यह है कि यदि विचारण (trial) या अन्वेषण (investigation) के दौरान अभियुक्त को जेल में रखा जाए, तो इसका अर्थ होगा उसे दोषी साबित होने से पहले ही दंडित करना। वहीं, यदि उसे बिना शर्त छोड़ दिया जाए, तो यह संभव है कि वह सजा के लिए उपलब्ध न रहे या अपने विरुद्ध साक्ष्य को नष्ट करने का प्रयत्न करे।
वास्तव में, जमानत की अवधारणा न्यायपालिका प्रणाली के तीन बुनियादी सिद्धांतों से उत्पन्न हुई है:
- प्रत्येक आरोपी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक कि वह कानून की अदालत द्वारा दोषी साबित न हो जाए।
- प्रत्येक आरोपी व्यक्ति को दोषी पाए जाने पर सजा के लिए उपलब्ध होना चाहिए।
- किसी भी निर्दोष व्यक्ति को सजा नहीं मिलनी चाहिए।
इसका अर्थ यह है कि किसी भी आरोपी को तब तक जेल में नहीं रखा जाना चाहिए जब तक कि वह न्यायालय द्वारा दोषी करार न दिया जाए। लेकिन क्या होगा यदि वह फरार हो जाए और दोषी पाए जाने पर सजा के लिए उपलब्ध न हो? जमानत का प्रावधान इस स्थिति को संभालने के लिए एक बीच का रास्ता प्रदान करता है। न्यायालय सभी तथ्यात्मक परिस्थितियों, फरार होने की संभावना और आरोप की गंभीरता आदि पर विचार कर उसे जेल से बाहर रहने की सशर्त अनुमति देता है।
इस प्रयोजन के लिए, अदालत एक गारंटर (ज़मानती) से इस बात की गारंटी लेती है कि वह उस अभियुक्त को जब भी कोर्ट या अन्वेषण अधिकारी बुलाएगा, उपस्थित करेगा। कुछ विशेष स्थितियों में न्यायालय उसे उसके अपने निजी मुचलके (व्यक्तिगत बांड) पर भी रिहा करने का निर्देश दे सकता है।
न्यायालय कुछ राशि तय करता है जिसे बैंक में सावधि जमा (fixed deposit) या उतनी ही राशि की संपत्ति के दस्तावेजों के रूप में लिया जा सकता है। यदि अभियुक्त या उसका जमानती जमानत की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो न्यायालय इस राशि को जब्त कर लेता है। जमानती (surety), जमानत बंध पत्र (bail-bond) आदि प्रक्रियाओं के विषय में हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे।
जमानत संबंधी प्रावधान कहां दिए गए हैं?
भारत में आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (संक्षिप्त नाम = CrPC) आपराधिक मुकदमों के संचालन के लिए मौलिक प्रक्रियात्मक कानून है। इस संहिता का अध्याय 33 (Chapter XXXIII) जमानत और बांड के प्रावधानों से संबंधित है। इस अध्याय में धारा 436 से धारा 450 तक, कुल उन्नीस धाराएँ हैं (धारा 436A, 437A और 441A बाद में जोड़े गए)। धारा 437, 438 और 439 मुख्य रूप से तीन प्रकार की जमानत प्रदान करती हैं, जिनकी चर्चा नीचे की गई है।
जमानत कौन दे सकता है?
सीआरपीसी, 1973 के तहत अपराधों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है—जमानती अपराध और गैर-जमानती अपराध (प्रथम अनुसूची के अनुसार)। पहली श्रेणी के अपराध दूसरी श्रेणी की तुलना में कम गंभीर होते हैं।
- जमानती अपराध में जमानत: पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी द्वारा दी जा सकती है।
- गैर-जमानती अपराध में जमानत: केवल न्यायालय द्वारा दी जा सकती है।
जमानत कितने प्रकार की होती है?
सीआरपीसी की प्रथम अनुसूची में जिन अपराधों को जमानती अपराध के रूप में वर्गीकृत किया गया है, उनमें थाने से ही जमानत मिल जाती है और अभियुक्त को जेल में रहने की आवश्यकता नहीं होती। इसके विपरीत, गैर-जमानती अपराध के मामले में अभियुक्त को अदालत द्वारा जमानत मिल सकती है, लेकिन यह उसका अधिकार नहीं है, क्योंकि जमानत स्वीकार करना या न करना न्यायालय का पूर्ण विवेकाधिकार है।
1. जमानती अपराध में जमानत / पुलिस जमानत (धारा 436 CrPC)
- यदि किसी जमानती अपराध के आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो उसे उस थाने के प्रभारी अधिकारी द्वारा थाने से ही जमानत मिल सकती है। इसका अर्थ है कि उसे जेल नहीं जाना पड़ेगा।
- इसके लिए उसे या उसके जमानती को जमानत-बांड प्रस्तुत करना होता है। वर्ष 2005 में इस धारा में एक संशोधन किया गया, जिसका उद्देश्य ऐसे निर्धन व्यक्तियों को राहत देना था जो जमानत की राशि या मुचलका देने में असमर्थ हैं।
- संशोधित धारा 436(1) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति ज़मानत राशि देने में असमर्थ है, तो न्यायालय या अधिकारी उसे बिना ज़मानत के केवल व्यक्तिगत मुचलके पर छोड़ सकता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी गिरफ्तारी की तारीख के एक सप्ताह के भीतर जमानत देने में असमर्थ रहता है, तो सक्षम पुलिस अधिकारी या न्यायालय के लिए यह मानने हेतु पर्याप्त आधार होगा कि वह इस धारा के उद्देश्य के लिए एक दरिद्र व्यक्ति है (यह संशोधन 23.06.2006 से लागू हुआ)।
- जमानती अपराध में जमानत प्राप्त करना अभियुक्त का कानूनी अधिकार है।
- हालांकि, यदि वह पुलिस जमानत की शर्तों का उल्लंघन करता है या जमानत का दुरुपयोग करता है, तो उसे हिरासत में लिया जा सकता है। धारा 436 की उप-धारा (2) ऐसे व्यक्ति से निपटने का प्रावधान करती है, जो पिछले अवसर पर जमानती अपराध में जमानत पर रिहा होने पर फरार हो गया हो या उसने जमानत की शर्त का उल्लंघन किया हो। ऐसे मामले में वह दोबारा अधिकार के रूप में जमानत का हकदार नहीं होगा।
गैर-जमानती अपराध के मामले में दो स्थितियां हो सकती हैं:
- अभियुक्त पहले से ही न्यायिक हिरासत या पुलिस हिरासत में हो।
- अभियुक्त हिरासत में न हो, लेकिन उसे यह आशंका हो कि उसे किसी गैर-जमानती अपराध में गिरफ्तार किया जा सकता है।
- पहली स्थिति में: वह सीआरपीसी की धारा 437 के तहत नियमित जमानत (Regular Bail) के लिए आवेदन कर सकता है।
- दूसरी स्थिति में: वह धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए आवेदन कर सकता है।
- इसके अलावा, धारा 439 सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय को जमानत देने के संबंध में विशेष और व्यापक शक्तियां प्रदान करती है।
2. ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत / नियमित जमानत (धारा 437 CrPC)
- यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे गैर-जमानती अपराध का आरोपी या संदिग्ध है और उसे बिना वारंट के गिरफ्तार किया जाता है, तो अदालत उसे जमानत पर रिहा कर सकती है।
- बशर्ते अदालत इस बात से संतुष्ट हो कि वह जमानत पर जेल से बाहर रहने के दौरान फरार नहीं होगा अथवा जमानत का दुरुपयोग कर जांच या निष्पक्ष सुनवाई में बाधा नहीं डालेगा। अभियुक्त की आयु, लिंग और स्वास्थ्य की स्थिति आदि पर भी विचार किया जा सकता है।
- ऐसे अपराध जो मृत्युदंड, आजीवन कारावास या सात साल या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय हैं, उनमें अदालत सामान्यतः जमानत नहीं देती, क्योंकि सजा जितनी गंभीर होगी, अभियुक्त के फरार होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। यदि कोई व्यक्ति पहले भी किसी गंभीर गैर-जमानती अपराध में दोषी पाया गया हो, तो भी न्यायालय आमतौर पर जमानत नहीं देता है।
- धारा 437 में संशोधन: 1980 और 2005 के संशोधनों द्वारा आदतन अपराधियों को जमानत देने के प्रावधानों को कठोर किया गया। यदि कोई व्यक्ति संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध में पहले ही दो या अधिक बार दोषी ठहराया जा चुका है, तो उसे सामान्यतः जमानत नहीं मिलेगी, सिवाय इसके कि आरोपी—(1) 16 वर्ष से कम आयु का हो, (2) महिला हो, या (3) बीमार या दुर्बल व्यक्ति हो।
- यदि कोई अभियुक्त न्यायिक हिरासत के दौरान अदालत में पेश होकर जमानत की प्रार्थना करता है, तो अदालत अभियोजन पक्ष को सुनवाई का अवसर देने के बाद ही निर्णय लेगी, यदि अपराध मृत्युदंड, आजीवन कारावास या 7 वर्ष से अधिक के कारावास से दंडनीय है।
- यदि अभियुक्त स्वेच्छा से अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करता है और धारा 437 के तहत जमानत का आवेदन करता है, तो अदालत उस पर सुनवाई कर सकती है, क्योंकि अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करना कानून की नजर में हिरासत में होना ही माना जाता है।
- यद्यपि जमानत के लिए अदालत के समक्ष आवेदन कितनी भी बार दिया जा सकता है, किंतु यदि पूर्ववर्ती आवेदन किसी खास आधार पर खारिज हो चुका है, तो उन्हीं तथ्यों पर दोबारा आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता। यदि परिस्थितियों या तथ्यों में कोई नया बदलाव आया है, तभी बाद वाला आवेदन विचारणीय होगा।
- सीआरपीसी संशोधन अधिनियम, 2008 (31.12.2009 से लागू) द्वारा इस धारा के पश्चात धारा 437A जोड़ी गई है, जिसके तहत अपील में उच्च न्यायालय से नोटिस मिलने पर अभियुक्त को जमानत बांड निष्पादित करना होता है, जो छह महीने तक प्रभावी रहता है।
3. सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत (धारा 438 CrPC)
- ऐसी स्थिति में जहां आरोपी या संदिग्ध वर्तमान में हिरासत में नहीं है, लेकिन उसे यह उचित आशंका है कि उसे किसी गैर-जमानती अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है, वह इस धारा के तहत अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।
- अग्रिम जमानत केवल सत्र न्यायालय (Sessions Court) या उच्च न्यायालय (High Court) द्वारा ही दी जा सकती है।
- जमानत देते समय अदालत निम्नलिखित तथ्यों पर विचार करती है:
- आरोप की प्रकृति और गंभीरता।
- आवेदक का पूर्ववृत्त (जैसे कि वह पहले किसी संज्ञेय अपराध में दोषी ठहराया गया था या नहीं)।
- आवेदक के न्याय से भागने की संभावना।
- क्या आरोप उसे गिरफ्तार कर अपमानित करने या क्षति पहुंचाने के दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से लगाया गया है।
- अदालत अग्रिम जमानत देते समय कुछ शर्तें लगा सकती है, जैसे—आवेदक पुलिस पूछताछ के लिए स्वयं को उपलब्ध कराएगा, मामले के तथ्यों से जुड़े किसी गवाह को धमकाएगा नहीं, और अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेगा।
- राज्यीय संशोधन: उत्तर प्रदेश राज्य ने उत्तर प्रदेश अधिनियम, 1976 (28.11.1976 से प्रभावी) द्वारा धारा 438 को अपने यहां से हटा दिया है। इसलिए उत्तर प्रदेश में सीधे CrPC के तहत अग्रिम जमानत का प्रावधान लागू नहीं है, हालांकि उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की जा सकती है।
- आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 के अनुसार, 12 वर्ष और 16 वर्ष से कम उम्र की नाबालिग बालिकाओं के बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के मामलों में सामान्यतः अग्रिम जमानत नहीं दी जाएगी।
4. सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय की विशेष जमानत शक्तियां (धारा 439 CrPC)
- दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 439(1) के अनुसार, उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय यह निर्देश दे सकता है कि हिरासत में मौजूद किसी भी व्यक्ति को जमानत पर रिहा किया जाए और आवश्यकतानुसार उचित शर्तें लगाई जाएं। साथ ही, यह अदालत मजिस्ट्रेट द्वारा लगाई गई किसी शर्त को हटा या संशोधित भी सकती है।
- धारा 439(2) के अंतर्गत उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है कि वह जमानत पर रिहा किए गए किसी भी व्यक्ति को पुनः गिरफ्तार कर हिरासत में भेजने का आदेश दे सकता है।
- स्पष्ट है कि जमानत के मामलों में उच्च न्यायालय की शक्तियां बेहद व्यापक हैं। उच्च न्यायालय राज्य में कहीं भी लंबित मामलों में अभियुक्तों को जमानत दे सकता है या जमानत राशि कम कर सकता है।
- क्षेत्रधिकार संबंधी नियम: जहाँ किसी अन्य जिले में अपराध किया गया हो, केवल उस आधार पर दूसरे जिले के सत्र न्यायाधीश के पास जमानत देने का क्षेत्राधिकार नहीं होता कि अभियुक्त ने उसके समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है (रणवीर सिंह बनाम देशराज सिंह चौहान, 1983)।
- सत्र न्यायालय को जमानत आवेदन पर सुनवाई करने का स्वतंत्र क्षेत्राधिकार प्राप्त है, भले ही अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश या सहायक सत्र न्यायाधीश द्वारा पूर्व में जमानत आवेदन खारिज कर दिया गया हो, क्योंकि यह सत्र न्यायालय की एक विशेष स्वतंत्र शक्ति है।




