1. Bijoy v. The State of West Bengal (2017)
इस मामले में अभियुक्त को यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया गया था और कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) ने बाल पीड़ित (Child Victim) की गरिमा की रक्षा के लिए जांच एजेंसियों द्वारा पालन किए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण निर्देश दिए:
- पुलिस अधिकारी को POCSO Act की धारा 19 के अनुसार अनिवार्य रूप से FIR दर्ज करनी होगी। साथ ही, उन्हें पीड़ित और उसके माता-पिता को कानूनी सहायता और प्रतिनिधित्व के अधिकार के बारे में सूचित करना होगा।
- FIR दर्ज होने के तुरंत बाद, बच्चे को POCSO Act की धारा 27 के तहत चिकित्सीय परीक्षण (Medical Examination) के लिए भेजा जाना चाहिए। यदि बच्चा किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 (Juvenile Justice Act, 2000) की धारा 2/घ (2)(d) के तहत ‘देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे’ की परिभाषा के अंतर्गत आता है, तो उसे संबंधित बाल कल्याण समिति (CWC) के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
- किसी भी मीडिया में पीड़ित की पहचान (Identity) को उजागर नहीं किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने पीड़ितों को दिए जाने वाले मुआवजे (Compensation) के संबंध में कुछ दिशा-निर्देश जारी किए:
- POCSO Act की धारा 33(8) के तहत विशेष न्यायालय द्वारा अंतरिम चरण (Interim Stage) पर मुआवजा दिया जा सकता है।
- अंतरिम चरण में मिलने वाला मुआवजा, अभियुक्त को सजा मिलने पर उसके द्वारा दिए जाने वाले मुआवजे से स्वतंत्र होता है।
- मुआवजा प्रदान करने का मुख्य उद्देश्य बाल पीड़ित की राहत और पुनर्वास (Relief and Rehabilitation) तथा राज्य द्वारा व्यक्ति को अपराधों से बचाने में विफल रहने पर उसकी क्षतिपूर्ति करना है।
2. Vishnu Kumar v. State of Chhattisgarh (2017)
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अभियुक्त की अपील पर सुनवाई करते हुए यह पाया कि POCSO Act की धारा 36 का पालन उसकी अक्षरशः भावना (Letter and Spirit) के साथ नहीं किया गया था। इसलिए, न्यायालय द्वारा राज्य के सभी न्यायिक अधिकारियों के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए गए:
- पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) को बाल गवाह (Child Witness) को यथासंभव सहज महसूस कराना चाहिए। इन-कैमरा कार्यवाही के साथ-साथ, पीठासीन अधिकारी को मंच (Dais) से नीचे आकर बच्चे से बातचीत करनी चाहिए। वह बाल गवाह को खिलौने और मिठाइयाँ भी दे सकते हैं, ताकि बच्चे को यह महसूस न हो कि वह किसी डरावनी या भव्य जगह पर है।
- सत्य की खोज और न्याय सुनिश्चित करने के लिए साक्ष्य के कठोर नियमों को नजरअंदाज किया जा सकता है।
- न्यायालय को बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि आवश्यक हो, तो बच्चे का बयान 3-4 घंटे बाद या अगले दिन दर्ज किया जा सकता है, क्योंकि मुख्य उद्देश्य बच्चे को सहज बनाना और किसी भी प्रभाव से मुक्त होकर उसके बयान दर्ज करना होना चाहिए।
- एक बच्चा सामान्यतः सच बोलता है, लेकिन चूंकि वे आश्रित (Dependent) प्राणी होते हैं, इसलिए उनके बयान अन्य लोगों से प्रभावित हो सकते हैं। अतः विवेक और सावधानी के नियम (Rule of Prudence and Caution) के तहत बच्चे के बयानों की सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए।
3. Dinesh Kumar Maurya v. State of U.P. (2016)

यह मामला पीड़ित के चिकित्सीय साक्ष्य (Medical Evidence) की बारीकियों पर प्रकाश डालता है। इस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 14 वर्षीय पीड़िता के शरीर पर चोट के कोई निशान न होने के बावजूद, जबकि पीड़िता ने जबरन यौन संबंध बनाए जाने का बयान दिया था, POCSO Act की धारा 3 और 4 के तहत अभियुक्त की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। न्यायालय ने इस मामले में निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:
- यौन उत्पीड़न के अपराध को साबित करने के लिए शरीर पर चोट के निशान हमेशा अनिवार्य शर्त (sine qua non) नहीं होते हैं, लेकिन यदि पीड़िता यह कहती है कि उसके साथ असहायता पूर्वक बलात्कार किया गया है, तो जांघों, स्तनों, चेहरे, कलाइयों या शरीर के किसी अन्य हिस्से पर चोट के निशान उसके बयानों का जबरदस्त समर्थन कर सकते हैं।
- अदालतों को हमेशा इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि बलात्कार या यौन उत्पीड़न के झूठे आरोप आम हैं और माता-पिता अक्सर बदला लेने के लिए अपनी नाबालिग बेटियों को झूठ बोलने और कहानियां गढ़ने के लिए मना लेते हैं।
4. Sunderlal v. The State of M.P. and Ors. (2017)
यह एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसला है जिसमें नाबालिग बलात्कार पीड़िता के पिता ने उसकी गर्भावस्था को समाप्त करने (Termination of Pregnancy) की अनुमति पाने के लिए भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 226 के तहत एक याचिका दायर की थी। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने उस रिपोर्ट पर जोर दिया जिसके अनुसार गर्भावस्था की अवधि 20 सप्ताह थी। इस संबंध में उच्च न्यायालय द्वारा निम्नलिखित निर्देश जारी किए गए:
- एक नाबालिग के मामले में, गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए याचिकाकर्ता (पिता/संरक्षक) की सहमति ही पर्याप्त है और नाबालिग पीड़िता की सहमति प्राप्त करना आवश्यक नहीं है।
- गर्भावस्था को समाप्त करने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 से प्रवाहित होता है।
- चिकित्सा समानांतर समाप्ति अधिनियम, 1971 (Medical Termination of Pregnancy Act, 1971) के अनुसार गर्भावस्था को समाप्त करने के संबंध में 3 पंजीकृत चिकित्सा प्रैक्टिशनर्स से बनी एक समिति को अपनी राय बनानी होती है।
- यदि समिति गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देती है, तो प्रतिवादी यानी राज्य द्वारा पीड़िता को सभी सेवाएं और सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
- गर्भावस्था समाप्त करने के मामले में, भ्रूण (Foetus) का डीएनए सैंपल निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार एक सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
5. M. Loganathan v. State (2016)
बलात्कार का यह अपराध 28 सितंबर 2012 को यानी अधिनियम (POCSO Act) के लागू होने से पहले किया गया था। लेकिन ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को POCSO Act की धारा 4 के तहत दोषी ठहरा दिया। परिणामस्वरूप, मद्रास उच्च न्यायालय ने यह घोषित किया कि यह दोषसिद्धि भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 20(1) का उल्लंघन होने के कारण असंवैधानिक है और इसे संशोधित करके भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 376(1) के तहत सजा में बदल दिया गया।
6. Kanha v. State of Maharashtra (2017)
अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और POCSO Act की धारा 6 के तहत गंभीर प्रवेशक यौन उत्पीड़न (Aggravated Penetrative Sexual Assault) करने के लिए दोषी ठहराया गया था, जिसके परिणामस्वरूप पीड़िता गर्भवती हो गई थी। अभियुक्त ने तर्क दिया कि जब तक भ्रूण की आयु का प्रमाण नहीं मिल जाता, तब तक अपराध के कमीशन की तारीख 14 नवंबर 2012 के करीब होने का दावा नहीं किया जा सकता और इस प्रकार उस पर POCSO Act की धारा 6 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया और अभियुक्त को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि जब POCSO Act की प्रयोज्यता (Applicability) पर सवाल उठाया जाता है, तो अदालतें या तो अभियुक्त की दोषसिद्धि में बदलाव करती हैं या उन्हें बरी कर देती हैं।
7. Bijoy @ Guddu Das v. The State of West Bengal (2017)
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने धारा 23 के तहत बनाए गए कानून को दोहराया और यह घोषणा की कि यदि कोई भी व्यक्ति (जिसमें पुलिस अधिकारी भी शामिल है) गोपनीयता के उल्लंघन (Breach of Confidentiality) जैसा कृत्य करता है, तो उसे अभियोजित (Prosecuted) किया जाएगा।
8. State of Gujarat v. Anirudhsing and Another (1997)
सुप्रीम कोर्ट ने यह अवलोकन किया था कि हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह जांच एजेंसियों की सहायता और सहयोग करे तथा संज्ञेय अपराधों (Cognizable Offences) के बारे में जानकारी दे। कई मामलों में स्कूल और शिक्षक यौन शोषण के मामलों को अधिकारियों को रिपोर्ट करके बाल पीड़ितों की मदद करते हैं। उदाहरण के लिए, नर बहादुर बनाम सिक्किम राज्य (2016) के मामले में, शिक्षकों को जानकारी मिली कि एक बुजुर्ग अभियुक्त द्वारा बार-बार यौन उत्पीड़न किए जाने के कारण उनकी एक छात्रा गर्भवती हो गई है। शिक्षकों ने पंचायत को सूचित किया जिसके बाद पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई।
9. Shankar Kisanrao Khade v. State of Maharashtra (2013)
यह एक महत्वपूर्ण मामला है जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने अपराध की रिपोर्टिंग के संबंध में दिशानिर्देश तय किए। इस मामले में मध्यम बौद्धिक अक्षमता (Moderate Intellectual Disability) से पीड़ित 11 वर्षीय बच्चे के साथ बलात्कार किया गया था, लेकिन न तो इसकी सूचना पुलिस को दी गई और न ही किशोर न्याय बोर्ड को दी गई। न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि बौद्धिक अक्षमता वाले बच्चे अधिक संवेदनशील (Vulnerable) होते हैं, इसलिए जिन संस्थानों में वे रहते हैं, उन पर उनके खिलाफ यौन शोषण की घटनाओं की रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी होती है। इसके अलावा, यह निर्धारित किया गया कि POCSO Act के प्रावधानों के अनुसार अपराध की रिपोर्ट न करना एक गंभीर अपराध है।
10. Pranil Gupta v. State of Sikkim (2015)
15 वर्ष की पीड़िता अभियुक्त के साथ रहती थी और उसके जननांग क्षेत्र (Genital Area) में चोटें पाई गईं। उच्च न्यायालय ने अभियुक्त के उस बयान पर भरोसा किया जिसमें उसने स्वीकार किया कि उसने पीड़िता के कपड़े उतारकर एक ही रात में 5 बार उसके साथ बलात्कार किया था। अभियुक्त का यह तर्क कि उसे यह पता नहीं था कि पीड़िता नाबालिग है, स्वीकार नहीं किया गया और अभियुक्त को POCSO Act की धारा 3 के तहत दोषी ठहराया गया।
11. Sofyan v. State (2017)
स्वीमिंग पूल क्षेत्र में प्लांट ऑपरेटर के रूप में काम करने वाले अभियुक्त को ट्रायल कोर्ट ने 8 साल की एक बच्ची का यौन उत्पीड़न करने के लिए POCSO Act की धारा 10 और भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत दोषी ठहराया था। मामले के तथ्य यह थे कि जब पीड़िता चेंजिंग रूम क्षेत्र में अपनी स्विमिंग कॉस्ट्यूम पहन रही थी, तब अभियुक्त उसके पास आया और उसने अपना हाथ उसकी स्विमिंग कॉस्ट्यूम में डालकर यौन आशय से उसे छुआ। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अभियुक्त के इस तर्क को खारिज कर दिया कि उसे झूठा फंसाया गया है और उसकी सजा को बरकरार रखा गया।
12. Fatima A.S. v. State of Kerala (2020)
सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया जिसमें एक मां की नाभि के ऊपर के नग्न शरीर पर उसके दो नाबालिग बच्चों द्वारा पेंट किया जा रहा था, और उसने दावा किया कि इस वीडियो का उद्देश्य उन्हें यौन शिक्षा (Sex Education) देना था। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह टिप्पणी की कि, “शुरुआती वर्षों में, बच्चा अपनी मां से जो सीखता है, वह हमेशा उसके मन पर एक अमिट छाप छोड़ता है। आमतौर पर यह कहा जाता है कि माँ बच्चे के लिए दुनिया की खिड़की होती है।” इसलिए इस कृत्य को धारा 13 के दायरे में माना गया।
13. Vasudev v. The State of Karnataka (2018)
गवाही पत्रक (Deposition Sheet) से यह स्पष्ट हुआ कि पीड़िता से आक्रामक तरीके से पूछताछ की गई थी और केवल तब जब वह घटना का वर्णन करते समय भावुक हो गई, तब अभियुक्त को बाहर भेजा गया था। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अभियुक्त की अपील खारिज कर दी, जिसे POCSO Act की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया गया था।
14. Shubham Vilas Tayade v. The State of Maharashtra (2018)
विशेष अदालत ने संज्ञान लेने के 30 दिनों के भीतर साक्ष्य दर्ज करने की अभियोजन पक्ष (Prosecution) को अनुमति दे दी थी। इस आदेश को अभियुक्त द्वारा इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह POCSO Act की धारा 35 का उल्लंघन है। हालाँकि, उच्च न्यायालय ने एपीपी (APP) के इस तर्क से सहमति जताई कि चूंकि अभियुक्त ने अभियोजन के आवेदन पर आपत्ति नहीं जताई थी, इसलिए वह अब इस आदेश को चुनौती नहीं दे सकता। इसके अलावा, यह भी देखा गया कि इसके बावजूद भी विशेष अदालत 30 दिन के बाद साक्ष्य दर्ज कर सकती है और धारा 35 द्वारा प्रदान की गई एकमात्र शर्त यह है कि देरी के कारणों को लिखित रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।
15. Imran Shamim Khan v. State of Maharashtra (2019)
एक बच्ची ने अपनी दादी को बताया कि उसका यौन शोषण हुआ था और उसकी चिकित्सीय जांच (Medical Examination) से इस बात की पुष्टि भी हो गई। हालांकि, उसकी मां ने उसे इस बात को नजरअंदाज करने को कहा। मजिस्ट्रेट के समक्ष बाल पीड़ित और उसकी दादी के बयान दर्ज किए गए। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि, “यौन उत्पीड़न के मामले में भले ही कोई नाबालिग POCSO Act के तहत मुकर (Hostile) जाए, लेकिन यह साबित करने की जिम्मेदारी अभियुक्त पर होती है कि वह निर्दोष है। यह कहना बहुत आसान है कि अभियोजन पक्ष अभियुक्त का अपराध साबित करने में विफल रहा, लेकिन इस तरह के मामले में न्यायिक दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि पीड़ित को भी न्याय मिले।”




