लैटरल एंट्री क्या है? जानिए इसके नियम, विवाद और सरकार का पक्ष

परिचय

लेटरल एंट्री का अर्थ है उच्च पदों पर सीधी भर्ती द्वारा नियुक्ति। सरकार इसके लिए कुछ अर्हताएँ निश्चित करती है, जिसके बाद इंटरव्यू और पूर्व उपलब्धियों के आधार पर नियुक्ति की जाती है। यह सामान्य भर्ती प्रक्रिया से अलग होती है, इसलिए इसे पार्श्व भर्ती (Lateral Entry) कहा जाता है।

यह चर्चा में क्यों है?

भारत सरकार ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के माध्यम से 24 मंत्रालयों में 45 पदों पर लेटरल एंट्री के लिए विज्ञापन (नोटिफिकेशन) जारी किया था। इन पदों में संयुक्त सचिव (जॉइंट सेक्रेटरी), उप सचिव (डिप्टी सेक्रेटरी) और निदेशक (डायरेक्टर) स्तर के पद शामिल हैं।

इस प्रक्रिया के तहत केंद्र सरकार, राज्य सरकार, सरकारी या स्वायत्त उपक्रम, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय संगठन, शोध संस्थान, यूनिवर्सिटी या किसी निजी कंपनी के योग्य व्यक्ति भी आवेदन करने के पात्र होते हैं। इन पदों पर नियुक्ति 3 वर्षों के अनुबंध के आधार पर होती है, जिसे प्रदर्शन के आधार पर बढ़ाकर 5 वर्षों तक किया जा सकता है।

लेटरल एंट्री का विरोध क्यों हो रहा है?

विपक्षी दल इस भर्ती प्रक्रिया का कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:

  1. आरक्षण का प्रावधान न होना: इन नियुक्तियों में आरक्षण लागू न होने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि 45 पदों को एक साथ संयुक्त रूप से निकालने के बजाय अलग-अलग मंत्रालयों के अनुसार विज्ञापित किया गया है, जिससे रोस्टर प्रणाली के तहत आरक्षण लागू नहीं हो पाता।
  2. पक्षपात की आशंका: सीधी भर्ती होने के कारण सरकार पर अपने पसंदीदा या समर्थक लोगों को इन उच्च पदों पर नियुक्त करने का अवसर मिलने का आरोप लगाया जाता है।
  3. पारंपरिक अधिकारियों के अधिकारों का हनन: जो अधिकारी कठिन प्रशासनिक परीक्षाओं और वर्षों की लंबी सेवा के बाद प्रमोशन पाकर इन उच्च पदों के हकदार बनते हैं, उनका हक इस प्रक्रिया से प्रभावित होता है।
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लेटरल एंट्री में आरक्षण लागू क्यों नहीं होता?

कानूनी और प्रशासनिक नियमों के अनुसार, किसी भी भर्ती में आरक्षण तब लागू होता है जब कुल रिक्तियों की संख्या एक निश्चित सीमा (जैसे 13-पॉइंट रोस्टर के अनुसार कम से कम 14 पद) तक हो। चूंकि इस बार विभिन्न मंत्रालयों के लिए अलग-अलग और कम संख्या में पद जारी किए गए, इसलिए किसी एक विभाग में पदों की संख्या न्यूनतम सीमा से कम होने के कारण आरक्षण का प्रावधान लागू नहीं हो सका।

सरकार का पक्ष और इसके लाभ

सरकार और समर्थकों का मानना है कि यह प्रशासनिक सुधार देश के हित में है। इसके मुख्य तर्क हैं:

पूर्व उदाहरण और सिफारिशें: यह व्यवस्था नई नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अकादमिक क्षेत्र से सीधे सरकार में उच्च पदों पर आए थे। इसके अलावा, प्रशासनिक सुधार आयोग (2005) और नीति आयोग (2017) ने भी इस तरह की नियुक्तियों की संस्तुति की थी।

विशेषज्ञता का उपयोग: आधुनिक युग में तकनीक, वित्त, स्वास्थ्य, पर्यावरण और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में विशेष विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। बाहरी क्षेत्रों से आने वाले पेशेवर उन विभागों में बेहतर सेवा दे सकते हैं जहाँ सामान्य प्रशासनिक अधिकारी को लंबा विशेष अनुभव नहीं होता।

योग्यता आधारित अवसर: सरकार का तर्क है कि यदि आरक्षित वर्गों के अधिकारी भी निर्धारित विशेषज्ञता रखते हैं, तो वे भी इन पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं।

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