प्रतिफल: वैध संविदा के लिए अनिवार्य तत्त्व-भाग 6
प्रतिफल एक वैध संविदा के लिए अनिवार्य घटक है। व्यवहार में बिना किसी प्रतिफल के अगर किसी को कोई वस्तु या अधिकार दिया जाता है तो वह एकपक्षीय वचन होता है। ऐसा वचन दान या उपहार (gift) हो सकता है लेकिन संविदा नहीं। इससे किस विधिक अधिकार का सृजन नहीं होता है।
प्रतिफल (consideration) क्या है?
कांट्रैक्ट एक्ट के सेक्शन 10 में एक वैध संविदा के लिए जिन घटकों को अनिवार्य बनाया गया है उनमें प्रतिफल भी है। सेक्शन 2 (d) इसके वैधता के लिए अनिवार्य तत्वों को बताता है। लेकिन सेक्शन 25 कुछ ऐसे अपवादों का प्रावधान करता है जिसमे प्रतिफल के बिना भी संविदा विधिक रूप से मान्य होता है।
भारतीय संविदा अधिनियम के सेक्शन 2 (d) के अनुसार:
“जबकि वचनदाता की वांछा पर वचनग्रहिता या कोई अन्य व्यक्ति कुछ कर चुका है या करने से विरत रहा है, या करता है या करता है या करने से प्रविरत रहता है, या करने का या करने से प्रविरत रहने का वचन देता है, तब ऐसा कार्य या प्रविरती या वचन उस वचन के लिए प्रतिफल कहलाता है”;
(“when, at the desire of the promisor, the promise or any other person has done or abstained from doing, or does, or abstains from doing, or promises to do or to abstain from doing, something, such act or abstinence or promise is called a consideration for promise)
सामान्य अर्थों में प्रतिफल का आशय है वचन के बदले कुछ देना। सेक्शन 2 (d) के अनुसार प्रतिफल के लिए आवश्यक है कि यह : 1. वचनदाता की वांछा पर दिया जाय; 2. वचन ग्राहिता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिया जाय; 3. प्रतिफल के रूप में कुछ करने का या करने से प्रविरत रहने का वचन दिया जाय
एक वैध संविदा के लिए अनिवार्य घटक कौन-से हैं?
संविदा अधिनियम की धारा 10 के अनुसार:
“सब करार संविदाएँ हैं, यदि वे संविदा करने के लिए सक्षम पक्षकारों की स्वतंत्र सम्मति से किसी विधिपूर्ण प्रतिफल के लिए और किसी विधिपूर्ण उद्देश्य से किए गए हैं और एतद्द्वारा अभिव्यक्ततः शून्य घोषित नहीं किए गए हैं।
इसमे अंतर्विष्ट कोई भी बात भारत में प्रवृत और एतदद्वारा अभिव्यक्ततः निरसित न की गई किसी ऐसी विधि पर, जिसके द्वारा किसी संविदा का लिखित रूप में या साक्षियों की उपस्थिति में किया जाना अपेक्षित हो, या किसी ऐसी विधि पर जो दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण से संबंधित प्रभाव न डालेगी।
(all agreements are contracts it they are made by the free consent of the parties competent to contract, for a lawful consideration and with a lawful object, and are not hereby expressly declared to be void.
Nothing herein contained shall affect any law in force in India, and not hereby expressly repealed, by which any contract is required to be made in writing or in the presence of witnesses, or any law relating to the registration of documents. )
इस सेक्शन के अनुसार एक वैध संविदा के लिए निम्नलिखित अनिवार्यताएँ हैं:
- स्वतंत्र सहमति (free consent);
- विधिपूर्ण प्रतिफल (lawful consideration);
- पक्षकारों की सक्षमता (parties must be competent to contract);
- विधिपूर्ण उद्देश्य (lawful objective);
- किसी विधि द्वारा प्रतिषिद्ध नहीं की गई है।
।
किसी संविदा के लिए क्या प्रतिफल अनिवार्य है? क्या इस का कोई अपवाद भी है?
धारा (section) 10 के अनुसार विधिपूर्ण प्रतिफल एक विधिमान्य संविदा के लिए अनिवार्य है। लेकिन सेक्शन 25 में इसके कुछ अपवादों का उल्लेख है जहाँ बिना इसके भी संविदा वैध होती है। ये अपवाद निम्नलिखित हैं:
प्रतिफल के बिना विधिमान्य करार के अपवाद (धारा 25)
- 1. नैसर्गिक प्रेम और स्नेह के कारण दिया गया वचन – (1) निकट संबंधी (2) नैसर्गिक प्रेम और स्नेह के कारण (3) वचन लिखी एवं रजिस्ट्रीकृत होना चाहिए।
- 2. पूर्वकालिक स्वेच्छिक सेवा के लिए प्रतिकार
- 3. काल अवरोधित ऋण चुकाने का वचन
अगर किसी संविदा में एक से अधिक पक्षकार हो तो प्रतिफल किसके वांछा पर दिया जाना चाहिए?
एक से अधिक पक्षकार अगर संयुक्त के रूप में हो तो, संयुक्त वचनदाताओं में से किसी एक के द्वारा इसकी की प्राप्ति को भी मान्य माना जाता है। अर्थात इस इस स्थिति में माना जाएगा कि एक वैध प्रतिफल चुका दिया गया है और संविदा वैध होगी।
भारत में कितने प्रकार के प्रतिफल को मान्यता दिया गया है? इंग्लिश विधि से इसमें क्या भिन्नता है?
सेक्शन 10 के अनुसार भारत में प्रतिफल वचनदाता की वांछा (इच्छा) पर (1) पूर्वकालिक (2) निष्पादित और (3) भावी हो सकता है। लेकिन इंग्लिश लॉ पूर्वकालिक प्रतिफल को नहीं मानता है।
निष्पादित प्रतिफल (executed consideration) में यह संविदा के समय ही चुका दिया जाता है जबकि पूर्वकालिक में संविदा होने से पहले ही यह चुका दिया जाता है जिसे संविदा के समय प्रतिफल के रूप में मान लिया जाता है।
इंग्लैंड में संविदा के दो भाग होते है: 1. मुहरबंद या विलेख के रूप में संविदा – बिना प्रतिफल के भी विधिमान्य 2. साधारण संविदा या मौखिक संविदा – प्रतिफल अनिवार्य। लेकिन भारत ऐसा कोई विभाजन नहीं है।
प्रतिफल के रूप में क्या दिया जा सकता है?
सेक्शन 25 (2) के अनुसार यह यथोचित या पर्याप्त होना आवश्यक नहीं लेकिन प्रतिफल वास्तविक होना चाहिए। साथ ही ऐसा कोई कार्य करना जिसे करने के लिए पक्षकार वैधानिक रूप से पहले से ही बाध्य है, प्रतिफल नहीं है।
इस संबंध में एक विधिक सिद्धांत का पहली बार प्रतिपादन पीनेल केस में किया गया था । पीनेल वाद (1604) के अनुसार एक अधिक राशि के बदले एक छोटी राशि देने का करार बाध्यकारी नहीं होता है क्योंकि करार बिना प्रतिफल के होता है।
इस संबंध में एक लिडिंग भारतीय केस है तुलसीबाई वर्सेस नारायण (1974) – वाद लाने से प्रविरत रहने का वचन विधिमान्य बनाने के लिए यह आवश्यक है कि वह दावा जिसके लिए वचन दिया गया है, अस्तित्वयुक्त हो तथा जो प्रवर्तनीय हो सके।

15 thoughts on “प्रतिफल: वैध संविदा के लिए अनिवार्य तत्त्व-भाग 6”
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