क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने 6-1 के बहुमत से एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि:
- अनुसूचित जाति/जनजाति (एससी/एसटी) को मिलने वाले आरक्षण के कोटे में राज्य सरकारें उप-वर्गीकरण (Sub-category) कर सकती हैं।
- इन वर्गों में जो ‘क्रीमी लेयर’ (Creamy Layer) के दायरे में आते हैं, उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित किया जा सकता है। अभी तक यह प्रावधान केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में ही लागू था।
- राज्य सरकारें इन समुदायों में क्रीमी लेयर होने के मानदंड खुद निश्चित करें। ये मापदंड ओबीसी के मापदंडों से अलग होने चाहिए।
- वर्गीकरण किया जा सकता है, लेकिन एससी के भीतर किसी एक जाति को 100 प्रतिशत कोटा नहीं दिया जा सकता है।
- एससी में शामिल किसी जाति का कोटा तय करने से पहले उससे जुड़े पुख्ता आंकड़े (Data) एकत्र किए जाने चाहिए।
- जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा कि एससी/एसटी में आरक्षण का लाभ एक पीढ़ी तक ही सीमित होना चाहिए। यदि किसी की एक पीढ़ी ने आरक्षण का लाभ लेकर सामाजिक और आर्थिक उन्नति कर ली है, तो अब उसे और लाभ नहीं लेना चाहिए, बल्कि अपने समुदाय के अन्य वंचित लोगों को यह अवसर मिलना चाहिए।
- कोटे के भीतर कोटा संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार के विरुद्ध नहीं है। वर्ष 2004 के इवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश (EV Chinnaiah V. State of Andhra Pradesh) केस में इसे समानता के विरुद्ध माना गया था। साथ ही यह भी कहा गया था कि किसी जाति को एससी में शामिल करना अनुच्छेद 341 के अनुसार राष्ट्रपति का अधिकार है। लेकिन अब कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए यह अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया है।
- उप-वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 341(2) का उल्लंघन नहीं करता है। अनुच्छेद 15 और 16 में ऐसा कुछ भी नहीं है जो राज्य को किसी जाति को उप-वर्गीकृत करने से रोके।
निर्णय का व्यावहारिक पक्ष

- अभी देश में एससी/एसटी को कुल 15 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। इस फैसले के बाद इस 15 प्रतिशत के भीतर आने वाली किस जाति को कितना हिस्सा मिलेगा, यह राज्य सरकारें निश्चित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी राज्य में एससी वर्ग के तहत 39 जातियां हैं, तो इनमें से किसको कितना आरक्षण मिलेगा, यह राज्य सरकार तय कर सकती है। यानी एक तरह से ‘आरक्षण के अंदर आरक्षण’ जैसी स्थिति बन जाएगी।
- दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी तक आरक्षण मुख्य रूप से नीतिगत विषय रहा है और राज्य सरकारें केंद्र की नीति को लागू करती थीं, जिससे पूरे देश में एकरूपता थी। इस निर्णय से यह जिम्मेदारी राज्य सरकारों को मिल गई है। व्यावहारिक रूप से इसका परिणाम यह हो सकता है कि जो जाति एक राज्य में अधिक सामाजिक और आर्थिक रूप से विकसित हो तथा जिसका प्रतिनिधित्व अधिक हो, वह किसी दूसरे राज्य में पिछड़ी हो सकती है। ऐसी स्थिति में दोनों राज्यों में उस जाति के आरक्षण प्रतिशत में अंतर आ सकता है।
- यदि किसी राज्य में एससी के अंतर्गत 10 जातियां हैं और उनके लिए 15 प्रतिशत आरक्षण तय है। यदि राज्य सरकार को लगता है कि इनमें से 6 जातियों को आरक्षण की अधिक आवश्यकता है, तो वह इन 6 जातियों को कुल 15 प्रतिशत में से 10 प्रतिशत आरक्षण दे सकती है। हालांकि, राज्य सरकार के इस निर्णय की न्यायिक समीक्षा अनुच्छेद 13 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जा सकती है।
क्या है क्रीमी लेयर?
क्रीमी लेयर का अर्थ उस वर्ग से है जो अपने समुदाय के अन्य लोगों की तुलना में सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में होता है। यानी क्रीमी लेयर अपने समुदाय के सबसे संपन्न और अवसरयुक्त लोग होते हैं। वर्तमान प्रावधानों के तहत ओबीसी समुदाय के क्रीमी लेयर वर्ग को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी में क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर करने वाला ऐतिहासिक निर्णय इंदिरा साहनी मामले में दिया था। वर्तमान में ओबीसी के लिए क्रीमी लेयर की न्यूनतम आय सीमा 15 लाख रुपये सालाना (प्रस्तावित/संशोधित मानकों के आधार पर) है।
क्रीमी लेयर का सिद्धांत यह है कि यदि एक समुदाय का व्यक्ति आरक्षण का लाभ उठाकर अपने समुदाय के अन्य लोगों की तुलना में अधिक संपन्न हो चुका है, और उसे बार-बार आरक्षण का लाभ दिया जाए, तो वह और उन्नति करेगा जबकि उसी समुदाय के अन्य गरीब लोग वंचित रह जाएंगे। इससे एक ही समुदाय के भीतर असमानता बढ़ेगी। आरक्षण का लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए यह जरूरी है कि जो लोग इसके जरिए उन्नति कर चुके हैं, उन्हें आगे लाभ लेने से रोककर अन्य जरूरतमंदों को अवसर दिया जाए।
क्यों हो रही है आलोचना?
- एससी/एसटी समुदाय के कुछ धड़े इस बात से चिंतित हैं कि इससे वे आरक्षण के लाभ से वंचित हो सकते हैं।
- इससे जातिगत राजनीति को बढ़ावा मिल सकता है। देश में लगभग 17 राज्य ऐसे हैं जहां जातियां राजनीति और चुनाव परिणामों पर गहरा प्रभाव रखती हैं।
- सात जजों की बेंच में असहमति जताने वालीं जस्टिस श्रीमती बेला एम. त्रिवेदी का कहना था कि किस राज्य में किस जाति को एससी में शामिल किया जाए, यह राष्ट्रपति और केंद्र सरकार का अधिकार है। कोर्ट को अनुच्छेद 142 का उपयोग करके यह अधिकार राज्यों को देने का अधिकार नहीं है।
- आलोचना का एक आधार यह भी है कि इतना महत्वपूर्ण फैसला केवल अंग्रेजी भाषा में आया है। निर्णय सुरक्षित रखने के पांच महीने बाद यह फैसला आया है, इतने समय में इसके अनुवाद की व्यवस्था की जा सकती थी।
- भारत में जातिगत जनगणना पर अभी तक राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई है। सामान्य जनगणना (जो 2021 में होनी थी) अब तक नहीं हो पाई है। ऐसे में ठोस आंकड़ों के अभाव में इस नीति को जमीन पर उतारना कठिन होगा।
- कोर्ट ने अपने फैसले में कुछ ऐतिहासिक उदाहरण दिए हैं जिससे दलित वर्ग से जुड़े मामलों पर बहस तेज हो सकती है। कोर्ट ने देश में शोषित या दलित वर्ग (Depressed Class) और उनके निर्धारण के मानदंडों पर भी विचार किया है।
ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक विविधता
फैसले में 1917 में सर हेनरी शार्प द्वारा बनाई गई ‘डिप्रेस्ड क्लास’ की सूची का हवाला देते हुए बताया गया कि दलित समाज के भीतर की सभी जातियों में एकरूपता नहीं है और उनमें भी आपस में भेदभाव रहा है। सर हेनरी शार्प ने अपनी सूची में शोषित वर्ग के अलावा क्रिमिनल ट्राइब्स (आपराधिक मानी गई जनजातियां) और पहाड़ी जनजातियों को शामिल किया था। शार्प ने कहा था कि ये जातियां सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हैं, लेकिन जाति के दंश से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। इनमें कुछ मुस्लिम जातियां भी शामिल थीं, जिन्होंने जातिगत अपमान और छुआछूत का सामना किया था।
चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में 1916 की इंडियन लेजिस्लेटिव असेंबली की एक चर्चा का हवाला दिया, जिसमें सुझाव दिया गया था कि शोषित वर्ग में घुमंतु कबीलों को भी शामिल किया जाए। इन उदाहरणों से यह संकेत मिलता है कि कोर्ट यह स्वीकार कर रहा है कि कुछ अन्य समुदायों या समूहों ने भी ऐतिहासिक रूप से छुआछूत का सामना किया है।
इंडियन फ्रेंचाइजी कमेटी मानती थी कि ऐसा वर्ग जिसके स्पर्श मात्र से चीजें अपवित्र मान ली जाएं, वह ‘डिप्रेस्ड क्लास’ है। इसमें आदिवासी और उन हिंदुओं को शामिल नहीं किया जा सकता जिन्हें अछूत नहीं माना जाता। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि छुआछूत की डिग्री में अंतर हो सकता है—जैसे कुछ जातियों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति हो सकती है लेकिन गर्भगृह में जाने की नहीं।
असम के सेंसस अधीक्षक की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने बताया कि कुछ अछूत जातियां, जो समृद्ध और शैक्षणिक रूप से आगे थीं, वे दूसरी जातियों के साथ छुआछूत का व्यवहार करती थीं (जैसे असम में एक पाटनी जाति के नाविक ने मोची के लिए पतवार चलाने से इनकार कर दिया था)। इन ऐतिहासिक दृष्टांतों के माध्यम से कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जातियों के भीतर भी सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन एक समान नहीं है, इसलिए ठोस डेटा के आधार पर पहचान और वर्गीकरण जरूरी है।
क्या है असमंजस?
- अभी तक क्रीमी लेयर का प्रावधान केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण में था। अब पहली बार यह अनुसूचित जाति और जनजाति के मामले में भी लागू होगा। सवाल उठ रहा है कि क्या कोर्ट के सामने सीधे तौर पर क्रीमी लेयर का प्रश्न था? क्या सरकार एससी/एसटी के भीतर क्रीमी लेयर के इस सिद्धांत को स्वीकार करेगी, या संसद कानून बनाकर इस फैसले को पलट देगी?
- यह सिद्धांत केवल सरकारी नौकरियों में लागू होगा या कॉलेज एडमिशन और संसद/विधानसभा की सदस्यता पर भी लागू होगा, इसे लेकर असमंजस बना हुआ है।
- यह फैसला उप-वर्गीकरण के साथ-साथ यह भी स्वीकार करता है कि अनुसूचित जातियों के भीतर भी एक जाति दूसरी जाति के साथ भेदभाव करती है, इसलिए सबको समान रूप से देखना उचित नहीं है।
समर्थन में दिए जा रहे तर्क
- जो व्यक्ति एक बार आरक्षण का लाभ लेकर ‘क्रीमी लेयर’ में आ चुका है, यदि उसे बार-बार आरक्षण का लाभ दिया जाए, तो वर्ग के भीतर ही गहरी असमानता उत्पन्न होगी और जो अभी तक पिछड़े हैं, वे वंचित रह जाएंगे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी लाभ देना आरक्षण के मूल उद्देश्य के विपरीत है।
- ओबीसी की तरह एससी/एसटी भी कोई समरूप (Homogenous) वर्ग नहीं है। उनमें भी आंतरिक असमानता है। इसलिए अधिकतम कल्याण के लिए वास्तविक स्थिति के आधार पर वर्गीकरण होना चाहिए।
- कोई भी एक जाति सभी राज्यों में एक जैसी सामाजिक स्थिति में नहीं होती है। इसलिए राज्यों को एससी/एसटी के भीतर उप-वर्ग बनाने का अधिकार देना तर्कसंगत है क्योंकि स्थानीय परिस्थितियां राज्य बेहतर समझ सकते हैं।
इस निर्णय द्वारा कोर्ट ने किन पुराने फैसलों को बदला या अनुमोदन किया?
- इस केस में जिन तर्कों को दोहराया गया है, उन्हें कोर्ट पहले एम. नागराज वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया और जनल सिंह के मामलों में कह चुका है।
- हालांकि, 20 साल पुराने 2004 के ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश मामले के फैसले को इस बेंच ने पलट दिया है। 2004 में पांच जजों की बेंच ने फैसला दिया था कि एससी/एसटी के भीतर कोई उप-वर्गीकरण या कोटा नहीं हो सकता क्योंकि वे एक समरूप समूह हैं। वर्तमान निर्णय ने इस व्याख्या को बदलते हुए वर्गीकरण को वैध ठहराया है।
- इंदिरा गांधी साहनी मामले में दिए गए ‘क्रीमी लेयर’ के सिद्धांत को अब एससी/एसटी वर्ग तक भी विस्तृत कर दिया गया है।
किस केस में और कब आया यह फैसला?
- केस का नाम: State of Punjab vs. Davinder Singh and Others (Civil Appeal No(s). 2317/2011)
- निर्णय की तिथि: 1 अगस्त 2024
केस की पृष्ठभूमि
1975 में पंजाब सरकार ने अपने राज्य में आरक्षित कोटे को दो श्रेणियों में बांट दिया था—पहला, वाल्मीकि समाज और मजहबी सिख; और दूसरा, अन्य अनुसूचित जातियां। कुल 15 प्रतिशत कोटे का आधा हिस्सा इन दो वर्गों के लिए सुरक्षित कर दिया गया। यह व्यवस्था लगभग 30 वर्षों तक चली।
वर्ष 2004 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने ‘ईवी चिन्नैया केस’ में इसे गैर-कानूनी करार दिया। संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरे देश पर लागू होता है, इसलिए पंजाब सरकार 2006 में नया कानून लाई और पुनः वाल्मीकि व मजहबी सिखों को अलग कोटा दिया। इस कानून को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और 2010 में हाईकोर्ट ने इसे रद्द कर दिया।
इसके खिलाफ पंजाब सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। चूंकि मामला इंदिरा साहनी केस (जो 9 जजों की बेंच का था) से जुड़ा था, इसलिए 2010 में 7 जजों की बेंच गठित की गई। अंततः जनवरी 2024 में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा गया, जो 1 अगस्त 2024 को सुनाया गया।
बेंच के सदस्य और असहमति
इस सात सदस्यीय बेंच में निम्नलिखित जज शामिल थे:
- चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़
- जस्टिस बी.आर. गवई (जिन्होंने इस फैसले का सबसे मजबूत समर्थन किया)
- जस्टिस पंकज मित्तल
- जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
- जस्टिस विक्रम नाथ
- जस्टिस मनोज मिश्रा
- जस्टिस श्रीमती बेला एम. त्रिवेदी (जिन्होंने इस फैसले के विरुद्ध असहमति जताते हुए मत दिया)। उनका मानना था कि राष्ट्रपति को संविधान प्रदत्त अधिकार कोर्ट द्वारा राज्यों को सौंपना न्यायिक सीमा से बाहर है।
वैधानिक प्रश्न और न्यायिक सक्रियता
इस फैसले के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या कोर्ट को नीतिगत मामलों में इस तरह का हस्तक्षेप करने का अधिकार है? क्या यह विधायिका के कानून बनाने के अधिकार का अतिक्रमण नहीं है?
संविधान का अनुच्छेद 341 राष्ट्रपति को किसी जाति को एससी सूची में शामिल करने का अधिकार देता है। इस निर्णय से राज्यों को वर्गीकरण का अधिकार मिलने के बाद ‘न्यायिक सक्रियता’ (Judicial Activism) पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। हालांकि, अनुच्छेद 13, 32, 141 और 142 सुप्रीम कोर्ट को व्यापक अधिकार देते हैं ताकि वह औपचारिकताओं से परे जाकर न्याय सुनिश्चित कर सके।
भारत में आरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 16: राज्य के अधीन पदों पर नियुक्ति में अवसर की समानता की गारंटी देता है, लेकिन इसके तहत पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान (आरक्षण) का अपवाद भी है।
- अनुच्छेद 15(4) और 16(4): राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति देते हैं।
- वर्तमान आरक्षण संरचना: देश में वर्तमान में कुल 59.35% आरक्षण लागू है—10% ईडब्ल्यूएस (EWS), 27% ओबीसी (OBC), 15% एससी (SC), और 7.50% एसटी (ST), जबकि 40.5% पद अनारक्षित श्रेणी के हैं।
ओबीसी क्रीमी लेयर के मानक
ओबीसी वर्ग में क्रीमी लेयर तय करने के मुख्य आधार इस प्रकार हैं:
- संवैधानिक पद धारण करने वाले व्यक्ति (राष्ट्रपति, राज्यपाल, सुप्रीम/हाई कोर्ट के जज, यूपीएससी अध्यक्ष आदि)।
- केंद्र और राज्य सेवाओं के ग्रुप A और ग्रुप B अधिकारी, पीएसयू (PSUs), बैंक, बीमा कंपनियां और निजी क्षेत्रों में कार्यरत समकक्ष अधिकारी।
- इंजीनियर, डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील, सलाहकार जैसे प्रोफेशनल।
- सेना में कर्नल या उससे ऊपर की रैंक के अधिकारी।
- उद्योग, वाणिज्य और व्यापार से जुड़े संपन्न व्यक्ति।
- शहरी क्षेत्रों में भवन या एक निश्चित सीमा से अधिक भूमि वाले लोग।
- जिनकी वार्षिक पारिवारिक आय निर्धारित सीमा (वर्तमान में 8 लाख रुपये सालाना) से अधिक हो (इसमें वेतन और कृषि आय की गणना के अपने विशिष्ट नियम हैं)।




