आजकल अश्लीलता बहस का एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। सोशल मीडिया हो, मुख्यधारा का सिनेमा हो या फिर वेब सीरीज—हर जगह इसे सामान्य रूप से देखा जा रहा है। पर इस बारे में कानून क्या कहता है? क्या अश्लीलता रोकने के लिए कोई कानून है? अगर है, तो क्या यह पर्याप्त है? और उससे भी बड़ी बात यह कि आखिर ‘अश्लीलता’ है क्या?
हालांकि, कानून ने ‘महिलाओं का अशिष्ट चित्रण’ का नाम देकर इसे परिभाषित करने का प्रयास किया है, पर इस बारे में सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या यह है कि यह एक व्यक्तिपरक (Subjective) विषय है। किसी व्यक्ति को कोई चीज अश्लील या अशिष्ट लग सकती है, जबकि दूसरे को नहीं।
फिर भी, आइए इस संबंध में मौजूदा कानूनी प्रावधानों पर विस्तार से नजर डालते हैं।
भारत में अश्लीलता से संबंधित सबसे प्रमुख कानून ‘स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986’ (The Indecent Representation of Women (Prohibition) Act) है। आईपीसी (IPC) की धारा 292 और वर्तमान बीएनएस (BNS) की धारा 294 भी इससे संबंधित प्रावधान करती हैं। लेकिन, संक्षेप में कहें तो IRWP Act इस विषय पर एक विशेष और व्यापक कानून है, जो अशिष्ट रूपण को परिभाषित भी करता है। इस अधिनियम में केवल 10 धाराएँ हैं, और हर अधिनियम की तरह इसकी धारा 2 परिभाषा खंड (Definition Clause) है।
इसके विपरीत, आईपीसी/बीएनएस केवल ‘अश्लील पुस्तकों की बिक्री’ आदि की बात करता है, लेकिन “अश्लीलता क्या है?” जैसे मौलिक प्रश्नों का उत्तर नहीं देता।
अश्लीलता क्या है?
इस अधिनियम में अश्लीलता के लिए ‘महिलाओं का अशिष्ट रूपण’ (Indecent Representation) शब्द का प्रयोग हुआ है। इसकी धारा 2 (c) के अनुसार, किसी स्त्री की आकृति, रूप, शरीर या उसके किसी भी अंग का ऐसा चित्रण—
- जिसका प्रभाव अशिष्ट हो,
- स्त्रियों के लिए अपमानजनक हो,
- निंदनीय हो, या
- लोक नैतिकता और नैतिक आचार को विकृत, क्षीण या भ्रष्ट करने की संभावना वाला हो—’अशिष्ट निरूपण’ कहलाता है।
अश्लीलता को कैसे पहचाना जा सकता है?
धारा 2 (c) में दी गई परिभाषा ‘नैतिकता’ और ‘नैतिक आचार में विकृति’ जैसे शब्दों का प्रयोग करती है, जो अनुभव की चीजें हैं जिन्हें सटीक रूप से मापा नहीं जा सकता। इसीलिए जब ऐसे मामले न्यायालयों के सामने आते हैं, तो सबसे बड़ा प्रश्न यह होता है कि संबंधित सामग्री को अशिष्ट माना जाए या नहीं।
न्यायालयों ने इसे मापने के लिए कई परीक्षण (Tests) विकसित किए हैं, जिनमें भारतीय संदर्भ में दो टेस्ट अत्यंत प्रासंगिक हैं:
1. हिकक्लिन टेस्ट (Hicklin Test)
इसे इंग्लैंड के क्वीन बेंच ने एक मामले में प्रतिपादित किया था। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 1965 के ‘रंजीत डी. उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में इस टेस्ट को लागू किया था, जिसकी देश भर में तीखी आलोचना हुई थी।
2. कम्यूनिटी स्टैंडर्ड टेस्ट (Community Standard Test)
2014 के ‘अवीक सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने निर्णय को पलटते हुए ‘समसामयिक समुदाय मानक परीक्षण’ (Contemporary Community Standard Test) को नया मापदंड बनाया।
अश्लीलता की कानूनी संकल्पना से जुड़े तीन ऐतिहासिक वाद (Cases)
देश में अश्लीलता से जुड़ी कानूनी अवधारणा के विकास में निम्नलिखित तीन मामलों का महत्वपूर्ण स्थान है:
1. रेजिना बनाम हिकक्लिन (Regina v. Hicklin), 1868
इस मामले में क्वीन बेंच ने ‘हिकक्लिन टेस्ट’ दिया। इसके अनुसार, ऐसी कोई भी सामग्री जो नैतिक रूप से दूषित मस्तिष्क वाले लोगों के विचार या व्यवहार पर अनैतिक प्रभाव डालती है, उसे अशिष्ट कहा जा सकता है। इसमें विषय-वस्तु के बजाय लोगों पर पड़ने वाले उसके संभावित प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया गया था।
2. रंजीत डी. उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य (Ranjith D. Udeshi v. State of Maharashtra), 1965
इस मामले में वादी एक विदेशी उपन्यास ‘लेडी चैटरलीज लवर’ (Lady Chatterley’s Lover) के भारत में प्रकाशन और वितरण को रोकना चाहता था। साथ ही, उसने आईपीसी की धारा 292 की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने इसमें ‘हिकक्लिन टेस्ट’ लागू किया और समाज के कमजोर नैतिकता वाले व्यक्ति पर इसके प्रभाव की संभावना को देखते हुए इस उपन्यास को ‘अश्लील’ माना। इस निर्णय की व्यापक आलोचना हुई, क्योंकि यह पूरी तरह व्यक्ति-केंद्रित (Subjective) था। आलोचकों का मानना था कि इससे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Expression) खतरे में पड़ सकती है। इसी बहस के बाद वर्ष 1986 में एक स्पष्ट कानून बनाया गया।
3. अवीक सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (Aveek Sarkar v. State of West Bengal), 2014
इस मामले में कोर्ट ने हिकक्लिन टेस्ट को खारिज करते हुए ‘समसामयिक कम्यूनिटी स्टैंडर्ड टेस्ट’ को अपनाया।
यह मामला एक प्रसिद्ध श्वेत टेनिस खिलाड़ी (बोरिस बेकर) द्वारा अपनी अश्वेत मंगेतर के साथ रंगभेद के विरोध में करवाए गए नग्न फोटोशूट से जुड़ा था, जिसे भारत की दो पत्रिकाओं ने छापा था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि केवल सेक्स से संबंधित सामग्री, जिसकी प्रकृति “कामुक विचारों को उत्तेजित करना” हो, उसे ही अश्लील माना जा सकता है। यह आकलन समाज के एक ‘सामान्य व्यक्ति’ के दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए, न कि किसी नैतिक रूप से कमजोर व्यक्ति के दृष्टिकोण से। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला के नग्न या अर्ध-नग्न शरीर के फोटो को तब तक अश्लील नहीं कहा जा सकता, जब तक कि उसका उद्देश्य देखने वाले की कामुक उत्तेजना जगाना न हो।
विज्ञापनों और पुस्तकों में महिलाओं के अशिष्ट चित्रण से जुड़े कानून

- विज्ञापनों पर रोक (धारा 3): IRWP एक्ट की धारा 3 सरकार को ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगाने की शक्ति देती है जो महिलाओं का अशिष्ट चित्रण करते हैं। ‘विज्ञापन’ शब्द के दायरे में नोटिस, लेबल, रैपर, दृश्य निरूपण (प्रकाश, ध्वनि, धुआँ या गैस द्वारा निर्मित) और प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सभी विज्ञापन शामिल हैं। ऐसे विज्ञापनों का प्रकाशन या प्रदर्शन करना दंडनीय अपराध है।
- पुस्तकें और पम्फलेट (धारा 4): यह धारा ऐसी अशिष्ट सामग्रियों के प्रकाशन और डाक द्वारा भेजने पर प्रतिबंध लगाती है।
- महत्वपूर्ण अपवाद: लोक कल्याण (विज्ञान, साहित्य, कला, शिक्षा), धार्मिक उद्देश्यों, प्राचीन स्मारकों/मंदिरों (जैसे खजुराहो, अजंता-एलोरा) की मूर्तियों के प्रदर्शन, और ‘सिनेमाटो ग्राफ एक्ट, 1952’ के तहत आने वाले माध्यमों पर यह कानून लागू नहीं होता है।
जांच एजेंसियों और अधिकारियों की शक्तियाँ (धारा 5)
राज्य सरकार द्वारा अधिकृत राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) को अपने क्षेत्र में तलाशी (Search) और जब्ती (Seizure) की शक्ति प्राप्त है।
- अधिकारी किसी भी ऐसे स्थान पर तलाशी ले सकता है जहाँ उसे अपराध होने का संदेह हो।
- हालांकि, निजी आवास पर बिना वारंट के प्रवेश नहीं किया जा सकता, जबकि सार्वजनिक स्थानों पर बिना वारंट के भी तलाशी संभव है।
- जब्त की गई सामग्रियों की सूचना तुरंत नजदीकी मजिस्ट्रेट को देनी होती है।
अपराध और सजा के प्रावधान (धारा 6)
- प्रथम बार अपराध करने पर: 2 साल तक का कारावास और ₹2,000 तक का जुर्माना।
- दूसरी या अधिक बार अपराध करने पर: 6 महीने से 5 वर्ष तक का कारावास और ₹10,000 से ₹1 लाख तक का जुर्माना।
- कंपनियों द्वारा अपराध: यदि कोई कंपनी अपराध करती है, तो उसके निदेशक (Director), प्रबंधक (Manager) या सचिव (Secretary) तब तक दोषी माने जाएंगे जब तक कि वे यह साबित न कर दें कि उन्हें अपराध की जानकारी नहीं थी या उन्होंने इसे रोकने के लिए पूरी सावधानी बरती थी।
- अपराध की प्रकृति: इस अधिनियम के तहत अपराध संज्ञेय (Cognizable) और जमानतीय (Bailable) होते हैं।
वर्तमान समय में इस कानून की कमियाँ और चुनौतियाँ
- डिजिटल युग और सोशल मीडिया: 1986 का यह कानून आज के सोशल मीडिया, रील्स, ओटीटी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब पर पूरी तरह प्रभावी साबित नहीं होता।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सहमति: यदि कोई महिला अपनी मर्जी से इंटरनेट पर कोई सामग्री साझा करती है, तो उसे इस कानून के दायरे में किस श्रेणी में रखा जाए, यह स्पष्ट नहीं है।
- सीमाओं का विस्तार: इंटरनेट के जरिए विदेशों से आने वाली अश्लील सामग्री पर नियंत्रण पाना कठिन है।
- दुरुपयोग की संभावना: चूँकि ‘अश्लीलता’ की परिभाषा व्यक्ति-सापेक्ष होती है, इसलिए कानून के दुरुपयोग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का खतरा हमेशा बना रहता है।
निष्कर्ष
अश्लीलता का प्रश्न सार्वजनिक नैतिकता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यवसाय की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार के बीच एक सूक्ष्म संतुलन का विषय है। इसे पूरी तरह अनियंत्रित भी नहीं छोड़ा जा सकता, लेकिन कानूनी रूप से इसे परिभाषित करना बेहद जटिल है।
इसका सबसे प्रभावी समाधान यह है कि तकनीक के मोर्चे पर कड़े नियंत्रण लागू किए जाएं, सरकार एक अधिक व्यापक और आधुनिक कानून लेकर आए, और साथ ही समाज स्वयं ऐसी सामग्रियों का नैतिक बहिष्कार करे।
