पेरोल, फरलो और जमानत, तीनों ही कुछ विशेष शर्तों के साथ जेल से बाहर रहने के कानूनी प्रावधान हैं। इनमें पेरोल और फरलो सजायाफ्ता कैदी को प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा दिए जाते हैं, जबकि जमानत विचाराधीन कैदी को न्यायालय द्वारा दी जाती है।
दूसरे शब्दों में, न्यायालय द्वारा किसी अपराधी को दोषी सिद्ध कर सजा सुनाए जाने के बाद भी, कुछ निश्चित आधारों और विशेष परिस्थितियों में सरकार द्वारा कुछ समय के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति दी जाती है, जिसे पेरोल (Parole) और फरलो (Furlough) कहा जाता है। हाल के वर्षों में इन प्रावधानों को लेकर आम लोगों में भी काफी उत्सुकता बढ़ी है।

विभिन्न चर्चित मामलों, जैसे—राम रहीम का बार-बार पेरोल पर बाहर आना, अभिनेता संजय दत्त का अवैध हथियार रखने के मामले में सजा के दौरान अलग-अलग कारणों से कुछ दिनों के लिए बाहर आना, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को बेटे की शादी के लिए पेरोल और स्वास्थ्य के आधार पर रांची हाईकोर्ट द्वारा प्रोविजनल बेल मिलना, या नीतीश कटरा हत्याकांड में विकास यादव को दादा के अंतिम संस्कार व भाई की सगाई में शामिल होने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा कस्टडी पेरोल मिलना—ने आम जनता की रुचि इन कानूनी प्रावधानों में काफी बढ़ा दी है।
1. पेरोल (Parole)
‘पेरोल’ शब्द को कानून द्वारा देश में कहीं भी पूर्ण रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) में भी इसके लिए कोई प्रत्यक्ष प्रावधान नहीं है। हालांकि, विभिन्न राज्यों ने अपने प्रशासनिक अधिकारों के तहत इसके लिए नियम और विनियम बनाए हैं। इसके अलावा, जेल समिति की सिफारिशों के आधार पर ‘सेंट्रल मॉडल रूल्स और रेगुलेशन्स’ भी बनाए गए हैं।
दिल्ली जेल अधिनियम, 2000 की धारा 2 की उपधारा (p) पेरोल प्रणाली को परिभाषित करते हुए कहती है:
“‘पारोल प्रणाली’ (parole system) से तात्पर्य नियमों के अनुसार कैदियों की सजा को निलंबित करके उन्हें पेरोल पर जेल से रिहा करने की प्रणाली से है।”
यानी सजा को स्थगित कर नियमों के अनुसार किसी कैदी को जेल से मुक्त करने की व्यवस्था ही पेरोल है। शब्दकोश के अनुसार, पेरोल का अर्थ है—“किसी सजायाफ्ता मुजरिम को उसकी सजा की अवधि समाप्त होने से पहले, कुछ शर्तों के अधीन प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कुछ समय के लिए जेल से मुक्त करना।” हालांकि, यह सजा में हस्तक्षेप नहीं होता है; अर्थात न्यायालय द्वारा दी गई सजा की कुल अवधि में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
पेरोल का उद्देश्य
माननीय उच्चतम न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण मामलों में इस विषय पर विचार किया है, जिसमें पूनमलता केस और इंदर सिंह बनाम राज्य (AIR 1978 SC 1091) अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। इन मामलों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पेरोल का मुख्य उद्देश्य कैदी को उसके सामाजिक और पारिवारिक बंधनों से जोड़े रखना है, ताकि उसे स्वयं को सुधारने का अवसर मिल सके।
पेरोल के प्रकार
पेरोल मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
- कस्टडी पेरोल (Custody Parole): इसमें कैदी जब जेल से बाहर होता है, तब भी वह पुलिस के कड़े पहरे या घेरे में होता है। इसलिए, यह समय भी कैदी की सजा की अवधि में गिना जाता है। यह कुछ विशेष और आपातकालीन कार्यों के लिए दिया जाता है, जैसे—परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु, विवाह या गंभीर बीमारी।
- रेगुलर पेरोल (Regular Parole): इसमें कैदी के साथ पुलिस का कोई पहरा नहीं होता है। यह निम्नलिखित आधारों पर दिया जा सकता है:
- परिवार के किसी सदस्य की गंभीर बीमारी, मृत्यु या विवाह।
- यदि कैदी की पत्नी का प्रसव होना हो और उसकी देखभाल करने वाला अन्य कोई न हो।
- किसी प्राकृतिक आपदा के कारण परिवार के किसी सदस्य या संपत्ति को गंभीर क्षति पहुँची हो।
- पारिवारिक और सामाजिक संबंध बनाए रखने के लिए।
- उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने के लिए।
पेरोल पर छोड़ने की प्रक्रिया व शर्तें
पेरोल के लिए कैदी को आवेदन देना होता है। पेरोल/फरलो गाइडलाइंस, 2010 के अनुसार इसके लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी होनी चाहिए:
- कैदी ने कम से कम एक साल की सजा जेल में काट ली हो।
- जेल में रहने के दौरान उसका आचरण सामान्यतः अच्छा रहा हो।
- यदि उसे पहले कभी पेरोल मिला हो, तो उसने उसका कोई दुरुपयोग न किया हो।
- पिछली पेरोल अवधि समाप्त होने के बाद कम से कम छह महीने का अंतराल बीत चुका हो।
- कैदी को जेल से बाहर छोड़ना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई खतरा न हो।
- उसके खिलाफ विचाराधीन किसी अन्य मामले के अन्वेषण (investigation) या विचारण (trial) पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।
- वह राज्य के विरुद्ध अपराध (जैसे राजद्रोह) का अपराधी न हो और उसने जेल के अनुशासन का कड़ाई से पालन किया हो।
- यदि कैदी किसी अत्यंत जघन्य अपराध (जैसे—बलात्कार के बाद हत्या, बच्चों के साथ दुष्कर्म और हत्या, या मल्टीपल मर्डर) का दोषी है, तो सामान्यतः उसे पेरोल नहीं दिया जाता; यह केवल सक्षम प्राधिकारी के विशेष विवेकाधिकार के तहत ही संभव है।
सामान्यतः पेरोल एक महीने से अधिक के लिए नहीं दिया जाता है। यदि इससे अधिक अवधि के लिए देना हो, तो आदेश में विशेष कारणों का उल्लेख करना आवश्यक होता है।
पेरोल के मामले में न्यायालय की भूमिका
यद्यपि पेरोल देना सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसमें न्यायालय की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती, फिर भी आपराधिक न्याय का यह क्षेत्र संविधान के दायरे से बाहर नहीं है। इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के अनुकूल होना अनिवार्य है। इन मूल अधिकारों का उल्लंघन होने पर उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226 के तहत) या उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32 के तहत) में रिट याचिका दायर की जा सकती है। न्यायालय मनमाने ढंग से पेरोल अस्वीकार करने या नियमों का उल्लंघन करने वाले सरकारी आदेशों की समीक्षा कर सकता है।
2. फरलो (Furlough)
पेरोल की तरह ‘फरलो’ को भी किसी सांविधिक कानून में पूरी तरह परिभाषित नहीं किया गया है। यह भी कार्यपालिका या प्रशासनिक शक्ति द्वारा किसी सजाप्राप्त कैदी को कुछ शर्तों के अधीन, कुछ समय के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति देने का प्रावधान है।
फरलो का शाब्दिक अर्थ “अनुपस्थित रहने की अनुमति” होता है। मूल रूप से यह शब्द उन व्यक्तियों के लिए उपयोग होता था जो किसी मिशनरी या सेवा में थे और विशेष आवश्यकताओं के कारण उन्हें सेवा से कुछ समय दूर रहने की अनुमति मिलती थी।
पेरोल और फरलो में अंतर:
- पेरोल प्राप्त करने के लिए किसी विशेष कारण (जैसे बीमारी, विवाह, या मृत्यु) का होना आवश्यक है, जबकि फरलो बिना किसी विशेष तात्कालिक कारण के भी दी जा सकती है।
- फरलो का मुख्य उद्देश्य लंबी सजा काट रहे कैदी के सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को बनाए रखना तथा उसके मानसिक स्वास्थ्य को सुधारना है।
- उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र राज्य बनाम सुरेश पांडुरंग दारवेकर मामले में पेरोल और फरलो के बीच के अंतर को स्पष्ट किया था।
- कुछ लोग मानते हैं कि फरलो अधिकार के रूप में मांगी जा सकती है, लेकिन यह सही नहीं है। फरलो देना या न देना भी सरकार का विवेकाधिकार है, और समाज के हित के विरुद्ध पाए जाने पर इसे अस्वीकार किया जा सकता है। हालांकि, जेल मैनुअल के नियमों का उल्लंघन होने पर सरकार के निर्णय को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
3. जमानत (Bail)
जमानत में भी सशर्त जेल से मुक्ति मिलती है, लेकिन यह मौलिक रूप से पेरोल और फरलो से पूरी तरह भिन्न है।
- मुख्य अंतर: पेरोल और फरलो न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए जाने और सजा मिलने के बाद सजा काटते समय दिए जाते हैं, जबकि जमानत मुकदमे के विचारण (trial) या अन्वेषण के दौरान दी जाती है, जब न्यायालय ने अभियुक्त को दोषी नहीं माना होता है।
- जमानत का मूल सिद्धांत यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक दोष सिद्ध न हो जाए। हालांकि, मुकदमे की निष्पक्ष जांच और अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जमानत का प्रावधान किया गया है।
जमानत, पेरोल और फरलो का तुलनात्मक अध्ययन
| क्रम | आधार | जमानत (Bail) | पेरोल (Parole) | फरलो (Furlough) |
| 1. | दिए जाने का समय | सजा मिलने या दोष सिद्ध होने से पहले (विचाराधीन अवस्था में)। | सजा मिलने के बाद (सजायाफ्ता कैदी को)। | सजा मिलने के बाद (दीर्घकालिक सजायाफ्ता कैदी को)। |
| 2. | प्राधिकरण | न्यायालय (Court) द्वारा दी जाती है। | कार्यपालिका / प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा नियमों के तहत दी जाती है। | कार्यपालिका / प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा नियमों के तहत दी जाती है। |
| 3. | सजा की अवधि | सजा की घोषणा से पहले दी जाती है, इसलिए यह सजा की कुल अवधि पर निर्भर नहीं करती। | इसके लिए सजा की अवधि का होना अनिवार्य नहीं है। | सामान्यतः लंबी सजा (जैसे 5 वर्ष या अधिक, जिसमें कम से कम 3 साल काट चुका हो) के मामलों में दी जाती है। |
| 4. | सजा में गणना | यह विचाराधीन अवधि होती है (सजा के पूर्व की अवधि)। | पेरोल पर बाहर बिताया गया समय सजा की कुल अवधि में नहीं जोड़ा जाता। | फरलो पर बाहर बिताया गया समय सजा की अवधि में गिना जाता है। |
| 5. | उद्देश्य और आधार | मुकदमे में उपस्थिति सुनिश्चित करना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना। | परिवार में मृत्यु, विवाह या गंभीर बीमारी जैसे विशेष उद्देश्यों के लिए। | लंबी सजा के दौरान सामान्य सामाजिक जीवन और पारिवारिक संबंध बनाए रखने के लिए। |
| 6. | आवृत्ति (Frequency) | मामले के गुण-दोष के आधार पर आवश्यकतानुसार। | इसकी कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं है। | इसके नियम निश्चित और सीमित होते हैं। |
| 7. | अवधि की सीमा | न्यायालय के आदेश पर निर्भर करती है। | सामान्यतः एक बार में अधिकतम 30 दिन और वर्ष भर में कुल 90 दिन तक। | सामान्यतः एक बार में 14 दिन से अधिक नहीं होती। |




