प्रतिफल (Consideration) एक वैध संविदा के लिए अनिवार्य घटक है। व्यवहार में बिना किसी प्रतिफल के अगर किसी को कोई वस्तु या अधिकार दिया जाता है, तो वह एकपक्षीय वचन होता है। ऐसा वचन दान या उपहार (Gift) हो सकता है, लेकिन संविदा (Contract) नहीं। इससे किसी विधिक अधिकार (Legal Right) का सृजन नहीं होता है।
प्रतिफल (Consideration) क्या है?
भारतीय संविदा अधिनियम के सेक्शन 10 में एक वैध संविदा के लिए जिन घटकों को अनिवार्य बनाया गया है, उनमें प्रतिफल भी शामिल है। सेक्शन 2(d) इसकी वैधता के लिए अनिवार्य तत्वों को परिभाषित करता है। लेकिन सेक्शन 25 कुछ ऐसे अपवादों का प्रावधान करता है, जिसमें प्रतिफल के बिना भी संविदा विधिक रूप से मान्य होती है।
भारतीय संविदा अधिनियम के सेक्शन 2(d) के अनुसार:
“जबकि वचनदाता की वांछा पर वचनग्रहिता या कोई अन्य व्यक्ति कुछ कर चुका है या करने से विरत रहा है, या करता है या करने से प्रविरत रहता है, या करने का या करने से प्रविरत रहने का वचन देता है, तब ऐसा कार्य या प्रविरती या वचन उस वचन के लिए प्रतिफल कहलाता है।”
(“When, at the desire of the promisor, the promisee or any other person has done or abstained from doing, or does, or abstains from doing, or promises to do or to abstain from doing, something, such act or abstinence or promise is called a consideration for the promise.”)
सामान्य अर्थों में प्रतिफल का आशय है— वचन के बदले कुछ देना (Quid pro quo)। सेक्शन 2(d) के अनुसार प्रतिफल के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं:
- यह वचनदाता की वांछा (Desire of the Promisor) पर दिया जाना चाहिए।
- यह वचनग्रहिता (Promisee) या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिया जाना चाहिए।
- प्रतिफल के रूप में कुछ करने का या करने से प्रविरत (Abstain) रहने का वचन दिया जाना चाहिए।
एक वैध संविदा के लिए अनिवार्य घटक कौन-से हैं?

संविदा अधिनियम की धारा 10 के अनुसार:
“सब करार संविदाएँ हैं, यदि वे संविदा करने के लिए सक्षम पक्षकारों की स्वतंत्र सम्मति से किसी विधिपूर्ण प्रतिफल के लिए और किसी विधिपूर्ण उद्देश्य से किए गए हैं और एतद्द्वारा अभिव्यक्ततः शून्य घोषित नहीं किए गए हैं।
इसमें अंतर्विष्ट कोई भी बात भारत में प्रवृत्त और एतद्वारा अभिव्यक्ततः निरसित न की गई किसी ऐसी विधि पर, जिसके द्वारा किसी संविदा का लिखित रूप में या साक्षियों की उपस्थिति में किया जाना अपेक्षित हो, या किसी ऐसी विधि पर जो दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण से संबंधित हो, कोई प्रभाव नहीं डालेगी।”
(“All agreements are contracts if they are made by the free consent of the parties competent to contract, for a lawful consideration and with a lawful object, and are not hereby expressly declared to be void.”)
इस सेक्शन के अनुसार एक वैध संविदा के लिए निम्नलिखित अनिवार्यताएँ हैं:
- स्वतंत्र सहमति (Free Consent)
- विधिपूर्ण प्रतिफल (Lawful Consideration)
- पक्षकारों की सक्षमता (Parties must be competent to contract)
- विधिपूर्ण उद्देश्य (Lawful Objective)
- यह किसी विधि द्वारा अभिव्यक्ततः शून्य घोषित नहीं होनी चाहिए।
किसी संविदा के लिए क्या प्रतिफल अनिवार्य है? क्या इसका कोई अपवाद भी है?
धारा (Section) 10 के अनुसार विधिपूर्ण प्रतिफल एक विधिमान्य संविदा के लिए अनिवार्य है। लेकिन सेक्शन 25 में इसके कुछ अपवादों का उल्लेख है, जहाँ बिना प्रतिफल के भी संविदा वैध होती है। ये अपवाद निम्नलिखित हैं:
प्रतिफल के बिना विधिमान्य करार के अपवाद (धारा 25):
- नैसर्गिक प्रेम और स्नेह के कारण दिया गया वचन: इसके लिए आवश्यक है— (क) पक्षकार निकट संबंधी (Near Relatives) हों, (ख) संविदा नैसर्गिक प्रेम और स्नेह (Natural Love and Affection) के कारण की गई हो, और (ग) वचन लिखित एवं रजिस्ट्रीकृत (In Writing and Registered) होना चाहिए।
- पूर्वकालिक स्वेच्छिक सेवा के लिए प्रतिकार (Compensation for Past Voluntary Services): यदि वचनदाता को स्वेच्छिक सेवाएँ पहले ही दी जा चुकी हैं, तो उनके बदले दिया गया प्रतिकार का वचन बिना प्रतिफल के भी वैध होता है।
- काल-अवरोधित ऋण चुकाने का वचन (Promise to Pay Time-Barred Debt): यदि कोई ऋण समयानुसार वर्जित (Time-Barred) हो चुका है, तो उसे चुकाने का लिखित और हस्ताक्षरित वचन वैध होता है।
अगर किसी संविदा में एक से अधिक पक्षकार हों, तो प्रतिफल किसकी वांछा पर दिया जाना चाहिए?
यदि एक से अधिक पक्षकार संयुक्त (Joint Promisors) रूप से हों, तो संयुक्त वचनदाताओं में से किसी एक के द्वारा भी प्रतिफल की प्राप्ति को मान्य माना जाता है। अर्थात, इस स्थिति में यह माना जाएगा कि एक वैध प्रतिफल चुका दिया गया है और संविदा पूरी तरह वैध होगी।
भारत में कितने प्रकार के प्रतिफल को मान्यता दी गई है? इंग्लिश विधि से इसमें क्या भिन्नता है?
सेक्शन 10 के अनुसार भारत में प्रतिफल वचनदाता की वांछा (इच्छा) पर:
- पूर्वकालिक (Past)
- निष्पादित (Executed) और
- भावी (Executory)
हो सकता है। लेकिन इंग्लिश लॉ (English Law) पूर्वकालिक प्रतिफल को मान्यता नहीं देता है।
- निष्पादित प्रतिफल (Executed Consideration): इसमें प्रतिफल संविदा के समय ही चुका दिया जाता है।
- पूर्वकालिक प्रतिफल (Past Consideration): इसमें प्रतिफल संविदा होने से पहले ही दिया जा चुका होता है, जिसे बाद में संविदा के समय प्रतिफल के रूप में मान लिया जाता है।
इंग्लिश विधि से भिन्नता: इंग्लैंड में संविदा के दो मुख्य रूप होते हैं:
- मुहरबंद या विलेख के रूप में संविदा (Contract under Seal / Deed): यह बिना प्रतिफल के भी विधिमान्य होती है।
- साधारण संविदा या मौखिक संविदा (Simple / Parol Contract): इसमें प्रतिफल अनिवार्य होता है।
लेकिन भारत में ऐसा कोई विभाजन नहीं है; यहाँ सभी संविदाओं के लिए (अपवादों को छोड़कर) सामान्य नियम लागू होते हैं।
प्रतिफल के रूप में क्या दिया जा सकता है?
सेक्शन 25 (स्पष्टीकरण 2) के अनुसार, प्रतिफल का यथोचित या पर्याप्त (Adequate) होना आवश्यक नहीं है, लेकिन प्रतिफल वास्तविक और विधिपूर्ण (Real and Lawful) होना चाहिए। साथ ही, ऐसा कोई कार्य करना जिसे करने के लिए पक्षकार वैधानिक रूप से पहले से ही बाध्य (Legally Bound) है, प्रतिफल की श्रेणी में नहीं आता है।
इस संबंध में एक ऐतिहासिक विधिक सिद्धांत का प्रतिपादन पीनेल केस (Pinnel’s Case – 1604) में किया गया था। इस वाद के अनुसार, एक बड़ी राशि के भुगतान के एवज में एक छोटी राशि स्वीकार करने का करार बाध्यकारी नहीं होता है, क्योंकि वह अतिरिक्त राशि के संबंध में बिना प्रतिफल (Without Consideration) का होता है।
इस संबंध में एक लीडिंग भारतीय केस तुलसीबाई वर्सेस नारायण (1974) है, जिसमें यह निर्धारित किया गया कि— वाद लाने से प्रविरत (Avoid/Refrain) रहने का वचन किसी करार को विधिमान्य बनाने के लिए यह आवश्यक है कि वह दावा, जिसके लिए वचन दिया गया है, वास्तविक रूप से अस्तित्वयुक्त हो तथा जो विधिक रूप से प्रवर्तनीय (Enforceable) हो सके।




