एक पक्ष (प्रस्थापक – Offerer) द्वारा प्रस्थापन (Offer) करना और इसकी संसूचना (Communication) दूसरे पक्ष (Offeree अर्थात जिसके प्रति प्रस्थापन किया गया है) को देना। Offeree द्वारा उसे स्पष्ट और अंतिम रूप से स्वीकार कर लिया जाना और इस संस्वीकृति (Acceptance) की संसूचना पहले पक्ष (Offerer) को देना— ये संविदा निर्माण के सामान्य चरण हैं, जिसके विषय में हम पिछले आलेख में पढ़ चुके हैं।
संविदा के निर्माण के लिए हरिद्वार सिंह वर्सेस बेगम सुंबरुई और इंडियन एयरलाइन्स कॉरपोरेशन वर्सेस माधुरी चौधरी अत्यंत महत्वपूर्ण केस लॉ हैं।
1. हरिद्वार सिंह वर्सेस बेगम सुंबरुई (Haridwar Singh v. Bagum Sumbrui) [(1973) 3 SCC 889]
तथ्य:
(तत्कालीन बिहार के) हजारीबाग जिले के उत्तरी चतरा प्रभाग में बांस का एक कुंज था, जिसका नाम “बंठा बाँस कुंज” था। 22 जुलाई, 1970 को बिहार सरकार के वन विभाग ने सार्वजनिक नीलामी द्वारा इस कुंज (Coup) के दोहन के अधिकार की नीलामी के लिए विज्ञापन दिया था।
यह नीलामी 7 अगस्त, 1970 को प्रभागीय वन अधिकारी (Divisional Forest Officer – DFO) के कार्यालय में आयोजित की गई थी। इस नीलामी में अपीलकर्ता (हरिद्वार सिंह) सहित पाँच व्यक्तियों ने भाग लिया। हालांकि निविदा सूचना में निर्धारित आरक्षित मूल्य (Reserved Price) 95,000/- रुपये था, लेकिन अपीलार्थी की बोली ₹92,001 सबसे अधिक थी और इसलिए इसे प्रभागीय वन अधिकारी द्वारा स्वीकार कर लिया गया था। इसके बाद, अपीलार्थी ने ₹23,800 की प्रतिभूति राशि (Security Deposit) जमा की और इस संविदा को निष्पादित (Execute) किया।

प्रभागीय वन अधिकारी ने अपने पत्र द्वारा 25 अगस्त, 1970 को इस नीलामी की सूचना संरक्षक, वन विभाग, हजारीबाग सर्किल को दी। चूंकि प्रारंभिक रूप से जिस मूल्य को नीलामी के लिए निश्चित किया गया था, वह ₹50,000 से अधिक था, इसलिए इस नीलामी से संबंधित दस्तावेजों को वन संरक्षक ने बिहार सरकार के वन विभाग के उप सचिव को संपुष्टि (Confirmation) के लिए अग्रेषित कर दिया।
चूंकि यह नीलामी निश्चित मूल्य (आरक्षित मूल्य) से कम पर की गई थी, इसलिए इसे वित्त विभाग के पास भी भेजा गया। वित्त विभाग ने कम मूल्य पर नीलामी किए जाने के संबंध में 30 अक्टूबर, 1970 को डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर से स्पष्टीकरण माँगा।
जब यह मामला सरकार के पास लंबित था, तब अपीलार्थी ने 26 अक्टूबर, 1970 को विभाग को यह सूचना देते हुए नीलामी के आरक्षित मूल्य (₹95,000) पर इसे खरीदने की अपनी इच्छा व्यक्त की। उसने पुनः 3 नवंबर को अधिकतम बोली के आधार पर इस नीलामी को खरीदने के लिए अपनी सहमति जताते हुए आवेदन किया।
27 नवंबर को वन मंत्री ने यह निर्देश दिया कि उस कुंज की नीलामी अपीलार्थी को उसकी सबसे अधिक बोली (जो कि उसके लिए आरक्षित मूल्य है) पर दे दी जाए। 28 नवंबर को इस आशय का एक टेलीग्राम हजारीबाग सर्किल के वन संरक्षक को भेजा गया। चूंकि वन संरक्षक को डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर से कोई सूचना नहीं मिली थी, इसलिए उसने मंत्री द्वारा इस बिक्री को संपुष्ट करने की सूचना अपीलार्थी को नहीं भेजी।
4 दिसंबर को मोहम्मद याकूब (प्रतिवादी संख्या 6) ने बिहार सरकार (प्रतिवादी संख्या 1) के समक्ष एक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें उसने उस बाँस कुंज को ₹1,01,125 में खरीदने की इच्छा जताई।
5 दिसंबर को सरकार द्वारा एक टेलीग्राम डिविजनल ऑफिसर को भेजा गया, जिसमें उसे पहले वाले टेलीग्राम के आधार पर कोई भी कार्यवाही करने से रोक दिया गया था।
यह टेलीग्राम डिविजनल ऑफिसर को 10 दिसंबर को प्राप्त हुआ। उसने 10 दिसंबर के टेलीग्राम द्वारा सरकार को सूचित किया कि उसे 28 नवंबर का टेलीग्राम प्राप्त नहीं हुआ था, इसलिए उसने इसकी सूचना अपीलार्थी को नहीं दी थी।
पूरा मामला वन मंत्री के समक्ष लाया गया। मंत्री ने 13 दिसंबर को अपीलार्थी के साथ हुआ पहला संविदा रद्द करके मोहम्मद याकूब के पक्ष में यह बिक्री कर दी। इस आशय का टेलीग्राम वन संरक्षक और प्रभागीय वन अधिकारी (डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर) को 21 दिसंबर को भेजा गया।
विधिक पक्ष और निर्णय:
अपीलार्थी ने कोर्ट में एक रिट याचिका (Writ Petition) दायर की। उसका तर्क था कि नीलामी के लिए उसकी बोली डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर ने स्वीकार की थी, जो कि सरकार के अनुमोदन के बाद अंतिम होनी चाहिए थी। इसलिए जब सरकार ने 27 नवंबर को इसे स्वीकार कर लिया, तब दोनों के बीच संविदा का निर्माण हो गया, जो दोनों पक्षों के लिए बाध्यकारी था।
अतः, 13 दिसंबर को प्रतिवादी संख्या 6 के पक्ष में नीलामी की बोली स्वीकृत करना अवैध है। उसने राजनगरम विलेज को-ऑपरेटिव सोसायटी वर्सेस वीरासामी मुदलियार [AIR 1951 Mad. 322] का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि अगर स्वीकृति सशर्त हो और उस शर्त की पूर्ति हो जाए, तो संविदा का निर्माण हो जाता है और किसी संसूचना की आवश्यकता नहीं रह जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मतों पर विचार करने के बाद कहा कि प्रस्तुत मामला ऐसा नहीं है जिसमें डिविजनल ऑफिसर द्वारा की गई स्वीकृति, सरकार की स्वीकृति (संपुष्टि) के अधीन हो; बल्कि इसमें सरकार की संपुष्टि तब अपेक्षित थी जब डिविजनल ऑफिसर द्वारा आरक्षित मूल्य से कम पर बोली स्वीकार की गई थी।
मंत्री ने अपीलार्थी द्वारा दिए गए ₹95,000 के नए प्रस्ताव को स्वीकृति दी थी, न कि ऑफिसर द्वारा स्वीकार किए गए ₹92,000 को, और इस नए संविदा की सूचना वन संरक्षक द्वारा अपीलार्थी को नहीं दी गई थी। यहाँ तक कि उसे कोई सूचना प्रेषित भी नहीं की गई थी। इसके अतिरिक्त, अपीलार्थी ने स्वयं अपना पुराना प्रस्ताव (सबसे ऊँची बोली वाला) नया प्रस्ताव देकर प्रतिसंहरित (Revoke) कर लिया था।
इसलिए, कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि सरकार और अपीलार्थी के बीच कोई वैध संविदा अस्तित्व में नहीं था।
2. इंडियन एयरलाइन्स कॉरपोरेशन वर्सेस माधुरी चौधरी (Indian Airlines Corporation v. Madhuri Chowdhuri) [AIR 1965 Cal. 253]
तथ्य:
यह वाद 10 दिसंबर, 1954 को संस्थित (Instituted) किया गया था। 12 दिसंबर, 1953 को सुबह 3:25 बजे नागपुर से मद्रास के लिए उड़ान भरने वाला डकोटा हवाई जहाज (VT-CHF) नागपुर में ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
इस हवाई दुर्घटना में विमान के सभी यात्रियों और चालक दल (Crew) के सदस्यों की मृत्यु हो गई और केवल पायलट डेसमंड आर्थर जेम्स कार्टनर जीवित रहे, यद्यपि वे भी बुरी तरह झुलस गए थे। इन मृतकों में लगभग 28 वर्ष की आयु का एक युवा व्यवसायी सुनील बरन चौधरी भी शामिल था, जो कलकत्ता से नागपुर होते हुए मद्रास जा रहा था।
मृतक सुनील चौधरी की विधवा माधुरी चौधरी ने स्वयं अपने, अपने नाबालिग पुत्र और नाबालिग पुत्री की ओर से इंडियन एयरलाइंस के विरुद्ध 10 दिसंबर, 1954 को वाद दायर किया।
याचिकाकर्ता (Plaintiff) के अनुसार, यह दुर्घटना तब हुई जब उक्त विमान ने नागपुर हवाई अड्डे के छोर से लगभग दो मील दूर उतरने (Landing) का प्रयास किया, लेकिन इंजन में खराबी के कारण वह सफल नहीं हो सका।
इस कारण प्रतिवादी (Respondent) सुरक्षित रूप से यात्रियों को गंतव्य तक पहुँचाने के अनुबंध के उल्लंघन के लिए और कैरिज बाय एयर एक्ट (Carriage by Air Act) तथा इसके अंतर्गत उल्लिखित कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए दोषी है और क्षतिपूर्ति देने के लिए उत्तरदायी है।
याचिका में वैकल्पिक वाद भी था, जिसके अनुसार मृतक की मृत्यु जिस दुर्घटना में हुई, वह प्रतिवादी की लापरवाही और कदाचार (Misconduct) के कारण हुई थी। याचिका में निम्नलिखित लापरवाहियों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया था:
- विमान का पोर्ट इंजन हवा में लटकने के कारण जल गया और उसने कार्य करना बंद कर दिया। यह दोषपूर्ण पर्यवेक्षण (Defective Supervision) और जाँच का परिणाम था।
- जब पोर्ट इंजन ठीक हो गया, तब भी उसके हवा में लटके होने की स्थिति को ठीक नहीं किया गया। एक बार पोर्ट इंजन फेल होने के बाद भी पायलट और/या कैप्टन ने इसके लिए सामान्य मानक प्रक्रियाओं (Standard Operating Procedures) का पालन नहीं किया। ऐसी स्थिति में, जब इंजन फेल था और एयरपोर्ट पर जहाज को उतारने के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध था, तब भी पायलट ने विमान को सही तरीके से नहीं उतारा।
- इंजन की अग्नि चेतावनी प्रणाली (Fire Warning System) भी सही नहीं थी, जो कि दोषपूर्ण पर्यवेक्षण का एक अन्य उदाहरण थी।
- आपातकाल में विमान की सुरक्षात्मक प्रणालियों की जाँच संभवतः एक वर्ष से नहीं की गई थी और यदि ऐसी कोई जाँच हुई भी थी, तो वह पायलट के संज्ञान में नहीं थी तथा उसे इसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया था।
उपर्युक्त आधारों पर वादी ने न्यायालय से क्षतिपूर्ति की माँग की।
प्रतिवादी का पक्ष:
प्रतिवादी (इंडियन एयरलाइंस कॉरपोरेशन) ने मृतक को जारी किए गए 11 दिसंबर, 1953 के हवाई टिकट के छूट खंड (Exemption Clause) के नियमों और विनियमों (Terms and Conditions) का हवाला दिया।
इस खंड में कहा गया था कि निगम यात्रियों, उनके कानूनी प्रतिनिधियों या आश्रितों की मृत्यु, चोट, यात्रा में देरी या उनकी संपत्ति के नुकसान के लिए उत्तरदायी नहीं होगा। प्रतिवादी ने यह भी तर्क दिया कि मृतक इन शर्तों से भली-भांति अवगत होने के बावजूद यात्रा करने के लिए सहमत हुआ था, अतः दोनों के बीच इस संविदा के उल्लंघन का कोई वाद नहीं बनता है।
उसने कैरिज बाय एयर एक्ट द्वारा आरोपित कर्तव्यों के उल्लंघन के आरोप का भी खंडन किया तथा कदाचार, लापरवाही, दोषपूर्ण पर्यवेक्षण या जाँच के आरोपों से इनकार किया। प्रतिवादी का कहना था कि प्रभारी पायलट को सीधे जमीन पर विमान उतारने का प्रयास करना चाहिए था, और यदि इसमें कोई त्रुटि हुई भी, तो यह निर्णय की एक सामान्य भूल (Error of Judgment) थी, जिसके लिए पायलट को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
वह पायलट एक कुशल और सक्षम व्यक्ति था और उसने सद्भावना (Good Faith) के साथ निर्णय लिया था। विमान का नियमित रूप से निरीक्षण होता था, चालक दल के पास वैध लाइसेंस थे और वे उड़ान भरने के लिए पूरी तरह योग्य थे। विमान का ऑल-अप वजन (All-up Weight) अधिकृत टेक-ऑफ वजन से अधिक नहीं था और उड़ान भरने से पहले विमान की उचित सावधानी के साथ जाँच भी की गई थी। इस आधार पर प्रतिवादी ने खुद को किसी भी प्रकार की क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी नहीं माना।
अदालतों के निर्णय:
- ट्रायल कोर्ट (Trial Court): ट्रायल कोर्ट ने संविदा के छूट वाले खंड (Exemption Clause) को अवैध, अमान्य और शून्य ठहराया। कोर्ट ने सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट वर्सेस रुक्मिणी बाई [AIR 1937 Nag. 354] के मामले में दिए गए प्रेक्षणों पर भरोसा किया। न्यायालय ने कैप्टन कार्टनर को भी लापरवाही के लिए दोषी माना। कोर्ट ने यह भी कहा कि परिवहन के मामलों में कानून द्वारा आरोपित उत्तरदायित्व केवल संविदा तक सीमित नहीं होते, बल्कि उन्हें व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। विद्वान ट्रायल जज ने तीनों वादियों को ₹1,50,000 की एकमुश्त राशि प्रदान की, जिसे उनके बीच समान रूप से विभाजित किया जाना था, तथा ₹5,000 अनुकंपा राशि (Compassionate Allowance) देने का भी आदेश दिया।
- उच्च न्यायालय की खंडपीठ (Division Bench): इस निर्णय के विरुद्ध इंडियन एयरलाइंस ने अपील की। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने छूट खंड को सही और वैध मानते हुए वादी के दावे को पोषणीय (Maintainable) नहीं माना।
खंडपीठ ने मृतक के टिकट में उल्लिखित छूट खंड को बरकरार रखा और इस निष्कर्ष पर पहुँची कि यह संविदा अधिनियम की धारा 23 के प्रावधानों के विरुद्ध नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मृतक ने अपने जीवनकाल में किसी संविदा के माध्यम से स्वयं को क्षतिपूर्ति का दावा करने के अधिकार से वंचित कर दिया है, तो अधिनियम के तहत उसके आश्रित या लाभार्थी भी इसके लिए दावा नहीं कर सकते हैं।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि Res ipsa loquitur (अर्थात—कुछ प्रकार की दुर्घटनाओं का होना स्वयं ही उनकी लापरवाही को इंगित करता है) का विधिक सिद्धांत प्रत्येक दुर्घटना की विशिष्ट परिस्थितियों के आधार पर लागू होता है या नहीं, यह उस दुर्घटना के तथ्यों पर निर्भर करता है। यह मुख्य रूप से साक्ष्य का एक नियम (Rule of Evidence) है। कैप्टन कार्टनर के कार्यों को निर्णय की भूल (Error of Judgment) माना जा सकता था और प्रतिवादी की ओर से किसी भी प्रकार की घोर लापरवाही या कदाचार साबित नहीं हो सका।
उपर्युक्त आधारों पर, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एयरलाइंस की अपील को स्वीकार कर लिया।




