संविदा निर्माण (Formation of Contract)
संविदा निर्माण मुख्य रूप से दो चरणों में होता है:
- प्रस्थापन (Offer): एक पक्ष (प्रस्थापक/Offerer) द्वारा दूसरे पक्ष (प्रतिप्रस्थापी/Offeree) के समक्ष प्रस्थापन करना और इसकी संसूचना दूसरे पक्ष को देना।
- संस्वीकृति (Acceptance): Offeree द्वारा उस प्रस्थापन को स्पष्ट और अंतिम रूप से स्वीकार कर लेना तथा इस संस्वीकृति की संसूचना पहले पक्ष (Offerer) को देना।
जब दूसरा पक्ष प्रस्थापना को अंतिम और स्पष्ट रूप से स्वीकार कर इसकी संसूचना (Communication) पहले पक्ष को दे देता है, तब संविदा का निर्माण होता है; यानी यह एक विधिमान्य (Valid) संविदा बन जाता है। इसके बाद यदि कोई पक्ष इस संविदा को रद्द करना या बदलवाना चाहे, तो उसे न्यायालय में वाद (Suit) लाना पड़ेगा। एकपक्षीय रूप से इसमें कोई भी बदलाव करने का उसका अधिकार समाप्त हो जाता है।
संविदा निर्माण के लिए प्रस्ताव या प्रस्थापन (Offer) क्या है?

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2(a) प्रस्थापन (Proposal) को परिभाषित करते हुए कहती है:
“जबकि एक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के समक्ष किसी कार्य को करने या करने से विरत रहने की अपनी इच्छा को इस आशय से ज्ञापित करता है कि उस अन्य व्यक्ति की उस कार्य या संविरति (abstinence) के प्रति सहमति प्राप्त हो सके, तब यह कहा जाता है कि वह प्रस्ताव करता है।”
इस परिभाषा के अनुसार एक वैध ऑफर के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं:
- यह दूसरे पक्ष (Offeree) के प्रति किया गया हो।
- यह दूसरे पक्ष की सहमति प्राप्त करने के आशय से किया गया हो।
- यह सहमति कुछ करने या कुछ करने से विरत रहने के लिए प्राप्त करने के आशय से हो।
प्रस्ताव में दूसरे पक्षकार की अनुमति (सहमति) प्राप्त करने का आशय होना आवश्यक है।
उदाहरण: ‘A’ 5,00,000 रुपये में जमीन का एक प्लॉट ‘B’ को बेचने के इच्छुक हैं। वह ‘B’ से कहते हैं, “क्या आप 5,00,000 रुपये में यह प्लॉट खरीदेंगे?” यदि ‘B’ भी 5,00000 रुपये में इसे खरीदने के लिए तैयार हो जाता है और अपनी संस्वीकृति की संसूचना ‘A’ को देता है, तो यहाँ ‘A’ का प्रस्ताव एक वैध ऑफर है।
किंतु, यदि ‘A’ केवल अपने प्लॉट का विवरण इस उद्देश्य से देता है कि दूसरा व्यक्ति उसे खरीदने के लिए प्रस्ताव कर सके, तो यह ऑफर नहीं बल्कि “ऑफर के लिए आमंत्रण” (Invitation to Offer) है। दुकानदारों द्वारा वस्तुओं का प्रदर्शन, पुस्तक विक्रेताओं द्वारा कैटलॉग का प्रदर्शन, नीलामी के विज्ञापन और टेंडर, प्रस्ताव नहीं बल्कि प्रस्ताव के आमंत्रण के उदाहरण हैं।
निविदा (Tender) और चालू प्रस्थापना (Standing Offer)
कोई निविदा (Tender) स्वयं में कोई ऑफर नहीं, बल्कि “मूल्यों का उद्धरण” (Quotation of Price) होती है। यदि टेंडर स्वयं एक ऑफर होता, तो टेंडर के लिए आवेदन करते ही उसे स्वीकृति मान लिया जाता और संविदा बन जाता, परंतु ऐसा नहीं होता है।
जब किसी टेंडर को स्वीकृति मिल जाती है, तो वह एक चालू प्रस्थापना (Standing Offer) में बदल जाता है। अर्थात, तब भी वह ऑफर ही रहता है। संविदा तब बनता है जब इस टेंडर के आधार पर कोई वास्तविक ऑर्डर दिया जाए। यह सिद्धांत बंबई उच्च न्यायालय ने प्रसिद्ध वाद बंगाल कोल कंपनी लिमिटेड बनाम होम्स वाडिया एंड कंपनी [ILR (1899) 24 Bom 97] में प्रतिपादित किया था।
प्रस्थापन (Offer) और प्रस्थापन के लिए आमंत्रण (Invitation to Offer) में अंतर
प्रमुख केस लॉ:
- हैरिस बनाम निकर्सन [Haris v. Nickerson (1873) LR 8 Q&B 286]
- तथ्य: प्रतिवादी (निकर्सन) ने नीलामी द्वारा विक्रय का विज्ञापन दिया था। वादी (हैरिस) जब विज्ञापित स्थान पर पहुँचा, तो उसे पता चला कि नीलामी रद्द कर दी गई है। उसने प्रतिवादी पर यात्रा के खर्च के लिए मुकदमा कर दिया।
- निर्णय: यह अभिनिर्धारित किया गया कि प्रतिवादी उत्तरदायी नहीं था, क्योंकि दोनों पक्षों के बीच अभी तक कोई संविदा नहीं हुई थी। नीलामी का विज्ञापन कोई प्रस्ताव नहीं, बल्कि प्रस्ताव के लिए आमंत्रण था।
- फार्मास्युटिकल सोसाइटी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन बनाम बूट्स कैश केमिस्ट [(1952) 1 All ER Rep. 456]
- तथ्य: प्रतिवादी बूट्स कैश केमिस्ट लिमिटेड दवाइयों का विक्रेता था। दुकान में “स्वयं-सेवा” (Self-service) व्यवस्था थी, अर्थात ग्राहक स्वयं अपनी जरूरत का सामान चुनकर कैश काउंटर पर जाकर भुगतान करते थे। कैश काउंटर के पास एक पंजीकृत फार्मासिस्ट बैठा रहता था जो ग्राहक को आवश्यकता पड़ने पर दवा लेने से रोक सकता था।
- विधिक प्रश्न: क्या वस्तुओं का उनके दामों के साथ प्रदर्शन एक प्रस्तावना थी और ग्राहक द्वारा वस्तुओं को चुनना उसका प्रतिग्रहण (Acceptance) था?
- निर्णय: न्यायालय ने माना कि वस्तुओं का प्रदर्शन केवल “ऑफर के लिए आमंत्रण” था। ग्राहक द्वारा वस्तुओं को उठाकर कैश काउंटर पर ले जाना ही प्रस्ताव (Offer) करना था, जिसे कैशियर द्वारा स्वीकार किया जाता था।
संविदा निर्माण के लिए वचन (Promise) क्या है?
भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2(b) वचन (Promise) को परिभाषित करते हुए कहती है:
“जबकि वह व्यक्ति, जिससे प्रस्ताव किया गया है, उसके प्रति अपनी अनुमति ज्ञापित कर देता है, तब प्रस्ताव स्वीकृत हुआ कहा जाता है। प्रस्ताव, जब स्वीकृत हो जाता है, तब वह वचन बन जाता है।”
अर्थात, यदि एक पक्ष कोई प्रस्थापन करता है और दूसरा पक्ष उसे उसी स्वरूप में (यानी बिना किसी संशोधन के) स्वीकार कर लेता है, तो एक वैध संविदा का निर्माण हो जाता है और यह वचन दोनों पक्षों के लिए बाध्यकारी हो जाता है।
प्रतिस्थापन की संस्वीकृति (Acceptance) क्या है और कब सम्पन्न होती है?
एक प्रस्थापना (Proposal) दूसरे पक्ष द्वारा प्रतिग्रहीत या संस्वीकृत (Accept) होने के बाद ही बाध्यकारी वचन यानी संविदा (Contract) बनती है। जिस व्यक्ति को प्रस्थापना की जाती है, वह उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं होता; उसे इसे अस्वीकार करने या बिना प्रतिग्रहण के व्यपगत (Lapse) होने देने का अधिकार होता है। जब तक स्वीकृति प्रदान नहीं की जाती, तब तक संविदा नहीं बनती। यही कारण है कि किसी कंपनी द्वारा सबसे ऊँची बोली (Highest Bid) को अस्वीकार करके पुनः नीलामी करना पूरी तरह विधिमान्य है।
एक विधिमान्य संस्वीकृति के लिए आवश्यक दशाएँ (Essentials of a Valid Acceptance):
- संसुचना: स्वीकृति की सूचना प्रस्ताव प्राप्त करने वाले व्यक्ति या प्रस्तावक को दे दी जानी चाहिए।
- बिना शर्त: संस्वीकृति अंतिम और बिना शर्त (Absolute and Unconditional) होनी चाहिए।
- युक्तियुक्त तरीका: संस्वीकृति किसी प्रायोगिक तथा युक्तियुक्त तरीके (Reasonable and usual manner) से होनी चाहिए। यदि स्वीकृति का कोई विशेष तरीका निर्धारित किया गया है, तो उसी के अनुरूप होनी चाहिए।
- प्रस्ताव का विद्यमान होना: संस्वीकृति तभी दी जानी चाहिए जब प्रस्ताव जीवित (विद्यमान) हो; निश्चित समयावधि बीत जाने के बाद स्वीकृति प्रभावी नहीं होती।
- स्पष्ट या विवक्षित रूप: यह संस्वीकृति शब्दों द्वारा बोलकर (स्पष्ट) या कार्यों (Performance) द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से (विवक्षित/Constructive) हो सकती है (जैसे—कारबोलिक बॉल केस में कार्यों द्वारा स्वीकृति दी गई थी)।
- ज्ञान और आशय: संस्वीकृति, प्रस्ताव का ज्ञान होने के बाद उचित आशय के साथ दी जानी चाहिए।
- प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा: यह संस्वीकृति प्रस्तावक के प्रति या उसके अधिकृत प्रतिनिधि के प्रति ही होनी चाहिए, तथा संस्वीकृति देने वाला व्यक्ति स्वयं प्रस्थापि या उसका अधिकृत प्रतिनिधि होना चाहिए (लालमन शुक्ला बनाम गौरीदत्त का वाद)।
किसी प्रस्थापन की स्वीकृति के लिए कब इसकी संसूचना (Communication) आवश्यक नहीं होती?
जब स्वयं प्रस्थापना की शर्तों में यह तय कर दिया जाता है कि शर्तों का पालन करना ही स्वीकृति माना जाएगा, तब अलग से संसूचना देना आवश्यक नहीं होता।
- प्रसिद्ध वाद: कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी के मामले में कंपनी ने विज्ञापन दिया था कि जो कोई भी व्यक्ति उनके बताए गए निर्देशानुसार दवा का उपयोग करेगा और इन्फ्लूएंजा से ग्रसित होगा, उसे 100 पाउंड का इनाम दिया जाएगा। श्रीमती कार्लिल ने शर्तों के अनुसार दवा का सेवन किया और बीमार पड़ गई। न्यायालय ने माना कि शर्तों का पालन करना ही अपने आप में वैध स्वीकृति थी, अतः अलग से संसूचना देना आवश्यक नहीं था।
शर्तों के साथ किसी ऑफर को स्वीकार करने का विधिक प्रभाव
संविदा की मूल शर्त है कि संस्वीकृति अंतिम और बिना शर्त होनी चाहिए (Acceptance must be absolute)।
यदि किसी प्रस्थापन को शर्तों के साथ स्वीकार किया जाता है, तो वह संस्वीकृति नहीं बल्कि एक प्रति-प्रस्ताव (Counter-offer) बन जाता है। धारा 7 इसी विषय का प्रावधान करती है:
- काउंटर-ऑफर: यदि स्वीकृति किसी नए प्रतिबंध, शर्त या संशोधन के साथ दी जाती है, तो मूल प्रस्ताव समाप्त हो जाता है और यह एक नया प्रस्ताव बन जाता है, जिसे स्वीकार करना या न करना अब पहले पक्ष पर निर्भर करता है।
- सामान्य संशोधन: यदि प्रस्तावित संशोधन ऐसा हो जो संविदा के मूल तत्वों या प्रकृति को प्रभावित न करे और पहला पक्ष उसे स्वीकार कर ले, तो वह वैध संविदा बन जाता है। लेकिन यदि पहला पक्ष उस पर आपत्ति जताता है, तो मूल ऑफर समाप्त हो जाता है।




