प्रतिफल (Consideration) एक वैध संविदा के लिए अनिवार्य तत्त्व है। इसके विषय में हमने पिछले आलेख में चर्चा की थी। अब हम प्रतिफल से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण वाद (Leading Cases) का अध्ययन करते हैं।
प्रतिफल (consideration)
संविदा अधिनियम की धारा 10 के अनुसार:
“सब करार संविदाएँ हैं, यदि वे संविदा करने के लिए सक्षम पक्षकारों की स्वतंत्र सम्मति से किसी विधिपूर्ण प्रतिफल के लिए और किसी विधिपूर्ण उद्देश्य से किए गए हैं और एतद्द्वारा अभिव्यक्ततः शून्य घोषित नहीं किए गए हैं।
इसमे अंतर्विष्ट कोई भी बात भारत में प्रवृत और एतदद्वारा अभिव्यक्ततः निरसित न की गई किसी ऐसी विधि पर, जिसके द्वारा किसी संविदा का लिखित रूप में या साक्षियों की उपस्थिति में किया जाना अपेक्षित हो, या किसी ऐसी विधि पर जो दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण से संबंधित प्रभाव न डालेगी।
केदारनाथ भट्टाचार्यजी बनाम गोरी मोहम्मद (Kedarnath Bhattacharji v. Gorie Mahomed) [(1886) 7 I.D. 64 (Cal)]
तथ्य:
वादी (Plaintiff) केदारनाथ भट्टाचार्यजी हावड़ा के नगर आयुक्त (Municipal Commissioner) थे और साथ ही हावड़ा टाउन हॉल फंड के ट्रस्टियों में से एक थे। वे हावड़ा में एक टाउन हॉल का निर्माण करना चाहते थे, बशर्ते इसके लिए आवश्यक धन जुटाया जा सके।
उन्होंने यह पता लगाने का प्रयास किया कि कितने लोग इस कार्य में रुचि रखते हैं और दान देने के लिए तैयार हैं। जब दानदाताओं की संख्या एक निश्चित स्तर तक पहुँच गई, तब उन्होंने भवन के निर्माण के लिए एक ठेकेदार के साथ अनुबंध (Contract) किया। इसके पश्चात भवन की योजनाएं प्रस्तुत की गईं और उन्हें पारित कर दिया गया।
लेकिन जब सदस्यता सूची (Subscription List) बढ़ी, तो भवन की योजनाओं में भी विस्तार किया गया और अनुमानित लागत ₹26,000 से बढ़कर ₹40,000 हो गई। चूंकि भवन की मूल योजनाओं में किए गए इस परिवर्तन को सभी आयुक्तों (जिसमें वादी भी शामिल था) द्वारा संपुष्टि (Confirmation) मिल चुकी थी, इसलिए इस अतिरिक्त खर्चे के भुगतान के लिए आयुक्त ठेकेदारों के प्रति उत्तरदायी थे।
प्रतिवादी (Defendant) गोरी मोहम्मद ने सदस्यता रजिस्टर (Subscription Book) में अपना नाम दर्ज कराकर ₹100 का योगदान देने की स्वीकृति दी थी, परंतु उसने यह राशि प्रदान नहीं की।
वादी ने उससे इस रकम की वसूली के लिए वाद दायर किया। अब न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह उठा कि क्या वादी को यह अधिकार है कि वह अपनी ओर से तथा अन्य सभी आयुक्तों की ओर से प्रतिवादी से इस रकम की वसूली के लिए वाद दायर कर सकता है? दूसरे शब्दों में, क्या यह वाद पोषणीय (Maintainable) था?
न्यायालय का निर्णय:
कलकत्ता उच्च न्यायालय के अनुसार, वादी ऐसा करने के लिए पूरी तरह सक्षम था। वादी के ट्रस्टी या नगर आयुक्त होने के संदर्भ के बिना भी, वह सिविल प्रक्रिया संहिता (Civil Procedure Code – CPC) के प्रावधानों के तहत स्वयं और समान हित रखने वाले अन्य लोगों की ओर से विधिक कार्रवाई करने का हकदार था। यदि कार्रवाई सभी की ओर से की जाए और इसे रोकने के लिए कोई विधिक बाधा न हो, तो इस मामले में कोई तकनीकी दोष नहीं माना जाएगा।

अब अगला सवाल यह था कि क्या यह वाद उन सभी सदस्यों (Subscribers) के विरुद्ध लाया जा सकता है, जिन्होंने धन देने की स्वीकृति दी थी (और जिसके आधार पर वे ठेकेदारों के प्रति उत्तरदायी बने)। यह सत्य है कि यदि कोई व्यक्ति किसी चैरिटेबल (Charitable) कार्य के लिए केवल मौखिक सहमति देता है और बाद में मुकर जाता है, तो उसके विरुद्ध उस रकम की वसूली का वाद नहीं लाया जा सकता, क्योंकि ऐसे वचनों में प्रतिफल (Consideration) का अभाव होता है।
परंतु इस प्रस्तुत केस में लोगों से एक निश्चित लोक-कार्य के लिए धन देने का अनुरोध किया गया था। सदस्यों ने यह अच्छी तरह जानते हुए कि इस धन का क्या उपयोग होना है, स्वेच्छा से ठेकेदार को इस कार्य के लिए भुगतान करने की स्वीकृति दी थी। अतः न्यायालय ने यह माना कि दोनों पक्षों के बीच एक वैध अनुबंध का निर्माण हुआ था।
न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यह कहना बिल्कुल सही नहीं है कि इस अनुबंध में प्रतिफल का अभाव था, क्योंकि जो टाउन हॉल भवन का निर्माण होना था, वही इस मामले में वास्तविक प्रतिफल था।
2. दोरास्वामी अय्यर वर्सेस अरुणाचला अय्यर (Doraswami Iyer v. Arunachala Ayyar) [(1935) 43 L.W. 259 (Mad)]
तथ्य:
एक मंदिर के जीर्णोद्धार (मरम्मत) का कार्य चल रहा था, जिसके दौरान धन की कमी पड़ गई। इस कमी को पूरा करने के लिए मंदिर के ट्रस्टियों ने जनता से सदस्यता (Subscription) आमंत्रित की।
जो लोग अपनी इच्छा से इस धार्मिक कार्य में आर्थिक सहयोग देना चाहते थे, उन्होंने अपना नाम सदस्यता सूची में लिखवाया। इस सूची में प्रतिवादी (दोरास्वामी अय्यर) का नाम भी शामिल था। उसने स्वेच्छा से मरम्मत कार्य के लिए ₹125 देने का वचन दिया था, परंतु बाद में उसने यह राशि देने से इनकार कर दिया।
वादी (अरुणाचला अय्यर), जो कि ट्रस्टियों में से एक था, ने इस राशि की वसूली के लिए प्रतिवादी पर वाद दायर किया। प्रतिवादी का तर्क था कि इस कथित अनुबंध में किसी भी प्रकार का प्रतिफल नहीं दिया गया था, इसलिए वादी और प्रतिवादी के बीच कोई वैध संविदा अस्तित्व में नहीं थी जिसे न्यायालय द्वारा प्रवर्तित (Enforce) कराया जा सके। इस प्रकार, वादी का वाद पोषणीय नहीं था।
वादी का यह तर्क था कि उसने प्रतिवादी के वचन पर भरोसा करके ही मरम्मत कार्य में खर्च किया था, और यही कार्य संविदा के लिए प्रतिफल है। इसलिए दोनों के बीच हुआ समझौता एक वैध संविदा था और कानून द्वारा प्रवर्तनीय है।
सिविल कोर्ट ने वादी के पक्ष में निर्णय दिया, जिसके विरुद्ध प्रतिवादी ने सिविल रिविज़न याचिका (Civil Revision Petition) दायर की। [अतः इस पुनरीक्षण याचिका में मूल वादी (अरुणाचला अय्यर) प्रतिवादी बन गया और मूल प्रतिवादी (दोरास्वामी अय्यर) यहाँ वादी बन गया।]
विधिक प्रश्न और निर्णय:
अपीलीय न्यायालय के समक्ष मुख्य विधिक प्रश्न यह था कि क्या यह एक वैध प्रतिफल था और क्या यह विधि द्वारा प्रवर्तनीय संविदा थी?
भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2(घ) के अनुसार:
“जबकि वचनदाता की वांछा पर वचनग्रहिता या कोई अन्य व्यक्ति कुछ कर चुका है या करने से विरत रहा है, या करता है या करने से प्रविरत रहता है, या करने का या करने से प्रविरत रहने का वचन देता है, तब ऐसा कार्य या प्रविरती या वचन उस वचन के लिए प्रतिफल कहलाता है।”
न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि इस बात का कोई भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है कि प्रतिवादी ने मंदिर की मरम्मत के लिए पैसे देने का कोई ऐसा प्रस्ताव (Offer) दिया हो जिसे वादी ने स्वीकार किया हो। जिस समय यह तथाकथित संविदा हुई थी, उस समय मंदिर की मरम्मत का कार्य पहले से ही प्रगति पर था। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि वादी ने प्रतिवादी के कहने पर या उसके आश्वासन के आधार पर कोई नया कार्य शुरू किया था।
यह मामला केदारनाथ भट्टाचार्यजी बनाम गोरी मोहम्मद के वाद के तथ्यों से बिल्कुल भिन्न था। केदारनाथ केस में सदस्यों ने इस स्पष्ट शर्त पर धन देने का वचन दिया था कि वादी भवन या उसका एक निश्चित हिस्सा बनाएगा।
प्रतिफल के लिए यह अनिवार्य है कि वह वचनदाता (Promisor) की इच्छा या अनुरोध पर दिया गया हो। किंतु प्रस्तुत मामले में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला, बल्कि यह केवल वचनदाता द्वारा एक निश्चित राशि देने का एक सामान्य सा कथन मात्र था। यह भी सिद्ध नहीं हो सका कि मरम्मत का कार्य प्रतिवादी के वचन के अनुपालन (In pursuance of the promise) में किया गया था।
उपर्युक्त प्रेक्षणों के आधार पर न्यायालय ने माना कि दोनों पक्षों के बीच कोई वैध संविदा नहीं हुई थी। अतः पैसे की वसूली का दावा खारिज कर दिया गया और प्रतिवादी द्वारा दायर सिविल रिविज़न याचिका को स्वीकार कर लिया गया।
3. अब्दुल अजीज वर्सेस मासूम अली (Abdul Aziz v. Masum Ali) [AIR 1914 All. 22]
तथ्य:
आगरा की इस्लाम एजेंसी की स्थानीय समिति द्वारा एक मस्जिद की मरम्मत कराई जानी थी। इस मरम्मत के खर्च को पूरा करने के लिए लोगों से सदस्यता (Subscription) आमंत्रित की गई। मुंशी हाफिज अब्दुल करीम को इस कार्य के लिए कोषाध्यक्ष (Treasurer) नियुक्त किया गया था।
यह तय हुआ था कि वसूली गई राशि सीधे कोषाध्यक्ष के पास जमा की जाएगी। स्वयं मुंशी हाफिज अब्दुल करीम ने ₹500 का योगदान देने का वादा किया था। इसके अतिरिक्त, जान मुहम्मद नामक एक व्यक्ति ने भी ₹500 देने का वादा किया और इस राशि का एक चेक कोषाध्यक्ष के नाम से प्रेषित किया।
कोषाध्यक्ष ने सितंबर 1907 में इस चेक को बैंक में प्रस्तुत किया, परंतु बैंक ने इसे वापस कर दिया क्योंकि यह विधिवत समर्थित (Endorsed) नहीं था। इसके लगभग डेढ़ वर्ष पश्चात, जनवरी 1909 में इसे पुनः बैंक में प्रस्तुत किया गया, किंतु मियाद पूरी होने (Outdated / Time-barred) के कारण बैंक ने इसे फिर से अस्वीकार कर दिया।
20 अप्रैल, 1909 को कोषाध्यक्ष हाफिज अब्दुल करीम का निधन हो गया। इसके पश्चात उनके विधिक उत्तराधिकारियों के विरुद्ध ₹1,000 की कुल राशि की वसूली के लिए वाद दायर किया गया। इस राशि में ₹500 वह रकम थी जिसे देने का वचन कोषाध्यक्ष ने व्यक्तिगत रूप से दिया था, और शेष ₹500 वह रकम थी जिसके लिए जान मुहम्मद ने चेक दिया था, किंतु कोषाध्यक्ष की लापरवाही से वह समय पर भुनाया नहीं जा सका था।
ट्रायल कोर्ट ने वादी के पक्ष में निर्णय दिया और कोषाध्यक्ष के उत्तराधिकारियों को ₹1,000 चुकाने के लिए उत्तरदायी ठहराया। प्रतिवादी (कोषाध्यक्ष के उत्तराधिकारी) ने इसके विरुद्ध जिला जज के यहाँ प्रथम अपील की और वहाँ से राहत न मिलने पर उच्च न्यायालय में द्वितीय अपील दायर की।
विधिक मुद्दे:
इस मामले में अपीलीय न्यायालय के समक्ष निर्णय हेतु दो प्रमुख विधिक मुद्दे थे:
- क्या बिना प्रतिफल का यह वचन वैध और कानून द्वारा प्रवर्तनीय संविदा है?
- क्या कोषाध्यक्ष के विधिक उत्तराधिकारियों को कोषाध्यक्ष की लापरवाही (निर्धारित समय सीमा के भीतर चेक बैंक में जमा न करने) के लिए दोषी ठहराया जा सकता है और उनसे उस राशि की वसूली की जा सकती है?
न्यायालय का विश्लेषण और निर्णय:
प्रथम प्रश्न के उत्तर में: अपीलार्थी का तर्क था कि कोषाध्यक्ष द्वारा धन देने का प्रस्ताव केवल एक घोषणा तक सीमित था और यह विधिक वचन (Promise) के स्तर तक नहीं पहुँचा था, जिससे किसी विधिक दायित्व की उत्पत्ति हो सके। उनकी यह भी दलील थी कि केदारनाथ केस की तरह यहाँ किसी वचन के विश्वास पर कोई वास्तविक कार्य निष्पादित नहीं किया गया था।
प्रस्तुत मामले में मस्जिद की मरम्मत का कार्य अभी तक आरंभ ही नहीं हुआ था, इसलिए कोई प्रतिफल अस्तित्व में नहीं था। प्रतिफल के अभाव में दोनों पक्षों के बीच किसी वैध संविदा का निर्माण नहीं हुआ था।
प्रख्यात न्यायविद् सर फ्रेडरिक पोलक (Sir Frederick Pollock) के अनुसार:
“Consideration is the price for which the promise of the other is bought, and the promise thus given for value is enforceable.” (प्रतिफल वह मूल्य है जिसके बदले दूसरे का वचन खरीदा जाता है, और इस प्रकार मूल्य के बदले दिया गया वचन ही प्रवर्तनीय होता है।)
अर्थात, यदि संविदा का कोई पक्ष कुछ करने का वचन देता है, तो बदले में उसे भी कुछ प्रतिफल प्राप्त होना चाहिए। प्रतिफल के अभाव में यह संविदा वैध नहीं थी और अपीलार्थी (उत्तराधिकारी) को अपने पिता द्वारा दिए गए ₹500 के वचन को पूरा करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता था।
द्वितीय प्रश्न के उत्तर में: न्यायालय ने माना कि कोषाध्यक्ष समिति का पूर्ण अभिकर्ता (Agent) नहीं था, इसलिए उसकी लापरवाही के लिए उसे पूरी तरह दोषी ठहराना उचित नहीं है। उसके द्वारा कोषाध्यक्ष का पद संभालना स्वेच्छिक रूप से समाज की भलाई के लिए किया गया कार्य था। चेक को प्रस्तुत करने या समर्थित करने में हुई देरी के कई स्वाभाविक कारण हो सकते हैं। यदि कोषाध्यक्ष जीवित होता, तब भी उसके विरुद्ध लाया गया वाद सफल होने की संभावना संदिग्ध थी, और ऐसी स्थिति में उसके विधिक उत्तराधिकारियों के विरुद्ध भी वाद पोषणीय नहीं हो सकता था।
इसके अतिरिक्त, अधिकतम विधिक सिद्धांत Actio personalis moritur cum persona (व्यक्तिगत अधिकार व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाते हैं) के आधार पर भी उत्तराधिकारियों को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता था।
उपर्युक्त सभी प्रेक्षणों के आधार पर उच्च न्यायालय ने अपील स्वीकार कर ली और वादी का वाद खारिज कर दिया।




