संविदा के लिए संस्वीकृति, संसूचना,और प्रतिग्रहण: केस लॉ-part 4

संविदा के लिए संस्वीकृति (Sanction/Acceptance), संसूचना (Communication) और प्रतिग्रहण (Revocation) के संबंध में विधिक प्रावधान (Legal Provisions) और कुछ महत्वपूर्ण केस लॉ हमने पिछले भाग में पढ़े थे। इस संबंध में निम्नलिखित तीन केस लॉ भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

1. यूनियन ऑफ़ इंडिया वर्सेस मड्डाला थथाइयाह (Union of India v. Maddala Thathaiah) [AIR 1966 SC 1724]

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के समक्ष यह केस विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition – SLP) के रूप में सुनवाई के लिए आया था। इस केस के तथ्य इस प्रकार थे:

  • मद्रास और दक्षिण रेलवे कंपनी (Madras and Southern Mahratta Railway Company) सरकार के स्वामित्व के अधीन थी। कंपनी ने (रेलवे के महाप्रबंधक द्वारा), रेलवे अनाज की दुकानों को गुड़ (Jaggery) की आपूर्ति के लिए निविदाएं (Tenders) आमंत्रित कीं।
  • प्रतिवादी ने फरवरी और मार्च 1948 के महीनों के दौरान 14,000 मन (Maund) गुड़ की आपूर्ति के लिए अपना निविदा प्रस्तुत किया।
  • निविदा फॉर्म के पैरा 2 में एक नोट समाहित था, जिसमें आवश्यक मात्रा और वह तारीख, तक जिसकी आपूर्ति करनी थी, उसका उल्लेख था। उसमें एक और नोट था— “यह प्रशासन, अनुबंध जारी रहने के दौरान किसी भी समय, शेष बचे हुए भाग को वापस लिए बिना, किसी भी स्तर पर अनुबंध को रद्द करने का अधिकार सुरक्षित रखता है।”
  • रेलवे के उप महाप्रबंधक ने अपने पत्र के द्वारा 29 जनवरी, 1948 को यह निविदा स्वीकार कर ली। पत्र में प्रतिवादी को निविदा की प्रतिभूति (Security Deposit) के रूप में ₹7,900 की राशि का भुगतान करने के लिए कहा गया था।
  • 16 फरवरी, 1948 के पत्र में उप महाप्रबंधक की स्वीकृति को दोहराया गया। साथ ही, यह भी कहा गया कि इस निविदा की स्वीकृति इस पत्र के पिछले पृष्ठ पर मुद्रित शर्तों और नियमों के अधीन है।
  • इन शर्तों में आपूर्ति की समय-सारणी (Time Schedule) का भी उल्लेख था, जो इस प्रकार था: 1 मार्च 1948 को 3,500 मन; 22 मार्च, 1948 को 3,500 मन; 5 अप्रैल को 3,500 मन, और 21 अप्रैल को 3,500 मन।
  • इन नियमों और शर्तों के अंत में एक नोट था, जिसमें लिखा था— “प्रशासन इस अनुबंध को किसी भी समय, शेष बचे हुए भाग को वापस लिए बिना, किसी भी स्तर पर अनुबंध को रद्द करने का अधिकार सुरक्षित रखता है।”
  • साथ ही, यह भी कहा गया था कि इस भुगतान को प्राप्त करने पर प्रतिवादी के लिए आधिकारिक आदेश जारी किया जाएगा।
  • बाद में 28 फरवरी, 1948 को भेजे गए पत्र द्वारा माल की आपूर्ति के लिए इस समय-सारणी में थोड़ा सा परिवर्तन किया गया।
  • 8 मार्च, 1948 के एक पत्र द्वारा रेलवे उप महाप्रबंधक ने प्रतिवादी को सूचित किया कि अनुबंध के तहत माल की जो आपूर्ति प्रतिवादी को करनी थी, उसके शेष बचे हुए हिस्से की आपूर्ति के लिए 16 फरवरी के आदेश को रद्द किया जा रहा है।
  • प्रतिवादी द्वारा इसका विरोध करने पर रेलवे का तर्क था कि अनुबंध को किसी भी समय रद्द करने का अधिकार रेलवे प्रशासन के पास सुरक्षित था।
  • अंततः, प्रतिवादी ने रेलवे द्वारा संविदा के उल्लंघन (Breach of Contract) से हुई हानि की क्षतिपूर्ति के लिए कोर्ट में वाद दायर किया।
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अदालतों के निर्णय:

  • ट्रायल कोर्ट (Trial Court): ट्रायल कोर्ट का मानना था कि रेलवे को यह अधिकार था कि वह बिना कोई कारण बताए किसी भी समय इस संविदा को रद्द कर सकता था, इसलिए वह क्षतिपूर्ति देने के लिए उत्तरदायी नहीं है।
  • हाई कोर्ट (High Court): प्रतिवादी ने हाई कोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट का मानना था कि संविदा का वह भाग, जिसमें रेलवे द्वारा संविदा को रद्द करने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखा गया था, वह शून्य था। चूंकि इसी खंड के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने क्षतिपूर्ति के प्रश्न का निर्धारण नहीं किया था, इसलिए हाई कोर्ट ने इस प्रश्न का निर्णय कर इसे फिर से सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट के पास भेज दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court): हाई कोर्ट के इस निर्णय को रेलवे ने सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत स्पेशल लीव पेटिशन के माध्यम से चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के निर्णय से सहमति जताई और रेलवे की इस याचिका को हर्जाने (Costs) के साथ खारिज कर दिया।

नोट:टाटा सेलुलर वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया [AIR 1996 SC 11] में जस्टिस एस. मोहन ने प्रेक्षण किया था कि— (पैरा 84: टेंडर एक प्रस्ताव [Offer] होता है। यह आमंत्रण देता है और संस्वीकृति को अधिसूचित [Notify] करता है। एक विधिक टेंडर की निम्नलिखित आवश्यकताएं होती हैं:)

  • यह बिना शर्त (Unconditional) होनी चाहिए।
  • यह उचित स्थान पर होना चाहिए।
  • उत्तरदायित्व (Liability) स्पष्ट होना चाहिए।
  • यह उचित समय पर होना चाहिए।
  • यह उचित तरीके से होना चाहिए।
  • टेंडर देने वाला व्यक्ति इसके लिए सक्षम और अपना उत्तरदायित्व निभाने के लिए इच्छुक हो।
  • परीक्षण के लिए तर्कसंगत अवसर अवश्य मिलना चाहिए।
  • टेंडर उचित व्यक्ति (Proper Person) के प्रति होना चाहिए।

2. राजेंद्र कुमार वर्मा वर्सेस स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश (Rajendra Kumar Verma v. State of Madhya Pradesh) [AIR 1972 MP 131]

तथ्य:

याचिकाकर्ता (राजेंद्र कुमार वर्मा) ने निविदा सूचना संख्या 69, 1972-X, दिनांक 25-3-1969 के अनुसरण में प्रतिवादियों को तेंदू पत्ता (Tendu Leaf) की बिक्री के लिए एक निविदा प्रस्तुत की। निविदाएं खोले जाने से पहले, याचिकाकर्ता ने अपने टेंडर को वापस ले लिया (Resigned/Withdrawn) और अनुरोध किया कि इसे बिल्कुल न खोला जाए। हालांकि, इसके बावजूद निविदा को खोल दिया गया, उसकी नीलामी (Auction) की गई और फिर स्वीकृति के लिए सरकार के पास भेज दिया गया।

चूंकि याचिकाकर्ता ने समझौते को निष्पादित नहीं किया था, इसलिए पत्ते किसी अन्य व्यक्ति को बेच दिए गए। प्रतिवादी (राज्य) ने याचिकाकर्ता से शेष राशि वसूलने का प्रयास किया। याचिकाकर्ता (वादी) ने अपने खिलाफ की जा रही इस वसूली को चुनौती देने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक रिट याचिका (Writ Petition) दायर की।

विधिक प्रश्न:

  1. क्या पार्टियों के बीच हुआ अनुबंध वैध (अर्थात कानून द्वारा प्रवर्तनीय) था?
  2. क्या याचिकाकर्ता किसी अन्य निविदा के अभाव में अपना निविदा वापस ले सकता है?
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दलीलें और निर्णय:

वादी (याचिकाकर्ता) की दलील थी कि चूंकि याचिकाकर्ता की ओर से कोई जीवित निविदा नहीं बची थी क्योंकि उसने इसे खोले जाने से पहले ही वापस ले लिया था, अतः कोई भी वैध और लागू करने योग्य अनुबंध (Enforceable Contract) अस्तित्व में ही नहीं था। इसलिए उससे कोई वसूली नहीं की जा सकती थी।

इसके जवाब में प्रतिवादी का कहना था कि निविदा की शर्त संख्या 10 के अनुसार, वादी (निविदाकर्ता) अपना निविदा वापस नहीं ले सकता था, क्योंकि उसने केवल एक निविदा प्रस्तुत किया था और शर्त के अनुसार एक से अधिक निविदा देने वाला निविदाकर्ता ही, यदि उसका कम-से-कम एक वैध निविदा पूरा हो जाए, तब अन्य निविदा वापस ले सकता था।

कोर्ट का निर्णय:

कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति प्रस्ताव (Offer) देता है, वह इसकी संस्वीकृति (Acceptance) और उसकी संसूचना (Communication) उसे मिलने से पहले इसे वापस ले सकता है, (यह संविदा का एक सामान्य सिद्धांत है)। सरकार संविदा में कोई ऐसा खंड (Clause) शामिल करके इस विधिक अधिकार को नहीं छीन सकती।

वादी ने अपना निविदा वापस लेने के लिए आवेदन किया था, इस तथ्य से प्रतिवादी ने इनकार नहीं किया है। इसलिए यह स्पष्ट है कि जब निविदा खोला गया था, उस समय कोई प्रस्ताव अस्तित्व में नहीं था। इस प्रकार, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, किसी भी प्रकार का कोई भी अनुबंध या संविदा दोनों पक्षों के बीच नहीं हुआ था।

अतः, कोर्ट ने वादी की रिट याचिका को स्वीकार कर लिया और उसके खिलाफ की जा रही वसूली की कार्रवाई पर रोक लगा दी। साथ ही, उसके द्वारा प्रतिभूति (Security Deposit) के रूप में जमा की गई राशि को वापस करने का आदेश भी कोर्ट ने दिया।

3. कन्हैया लाल अग्रवाल वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया (Kanhaiya Lal Aggarwal v. Union of India) [AIR 2002 SC 2766]

तथ्य:

प्रतिवादी नंबर 1 (यूनियन ऑफ इंडिया) ने नौरोजाबाद डिपो में 75,000 क्यूबिक मीटर मशीन द्वारा तोड़े गए गिट्टी (Machine Crushed Track Ballast) (जो रेल की पटरियों पर बिछाया जाता है) की आपूर्ति, वितरण और ढेर लगाने सहित पांच कार्यों के निष्पादन के लिए निविदाएं आमंत्रित की थीं। आपूर्ति की अवधि 24 महीने की थी। निविदा की सूचना में निम्नलिखित शर्तें बताई गई थीं:

  • प्रत्येक कार्य के लिए अलग-अलग अनुसूची (Schedule) (जो कि संलग्न थी) के अनुसार जिस दर पर आपूर्ति की जानी थी, वह अंकों और शब्दों में स्पष्ट रूप से बताई जानी चाहिए।
  • किसी भी चूक (Default) या संशोधन (Modification) के साथ प्रस्तुत निविदाएं अस्वीकार कर दी जाएंगी; लेकिन अनुमोदनयोग्य सुधार के लिए निविदाकर्ता के हस्ताक्षर के साथ संलग्नक होना चाहिए।
  • निविदा को उस तारीख से कम से कम 90 दिनों की न्यूनतम अवधि के लिए खुला रहना चाहिए, जिस दिन मूल रूप से निविदा खोली गई थी।
  • किसी भी शर्त की अवहेलना करने पर प्रतिभूति के रूप में जमा की गई राशि को जब्त कर लिया जाएगा।
  • पूर्वोक्त शर्तों में से किसी का भी पालन न करने पर निविदा अस्वीकृत की जा सकती है।

कुल पाँच निविदाएं प्राप्त हुईं। वादी (अपीलार्थी/निविदाकर्ता) ने अपनी निविदा 27.02.2001 को इस शर्त के साथ प्रस्तुत की कि यदि उसका प्रस्ताव क्रमशः 45 दिनों, 60 दिनों और 75 दिनों के भीतर स्वीकार कर लिया जाता है, तो वह उसके द्वारा दी गई दरों पर क्रमशः 5%, 3% और 2% की छूट (Discount/Rebate) प्रदान करेगा।

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प्रतिवादी नंबर 5 (एक अन्य निविदाकर्ता) ने भी इसी तरह की पेशकश की थी, लेकिन उसने निविदा खुलने के 5 दिन बाद यह प्रस्ताव दिया था (जबकि वादी ने निविदा प्रस्तुत करते समय ही छूट का यह प्रस्ताव दे दिया था)। प्रतिवादी नंबर 5 ने दरों में 1.25% और 1% की कमी करने की पेशकश की थी, यदि निविदा को क्रमशः 30 दिनों और 45 दिनों में स्वीकार कर लिया जाता। रेलवे ने बाद में वादी द्वारा पहले दिए गए प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस पर प्रतिवादी नंबर 5 ने एक रिट याचिका दायर कर यह दावा किया कि उसकी निविदा स्वीकार की जानी चाहिए क्योंकि उसके द्वारा दी गई छूट की दरें अधिक हैं।

अदालतों के निर्णय:

  • सिंगल बेंच (Single Bench): इस याचिका की सुनवाई हाई कोर्ट की एकल पीठ (Single Judge Bench) ने की। पीठ का मानना था कि वादी द्वारा निविदा सूचना में छूट के रूप में किए जा रहे प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया था। साथ ही यह भी कहा गया कि प्रतिवादी नंबर 5 द्वारा छूट की पेशकश चूंकि टेंडर खुलने के बाद दी गई थी, इसलिए उसका कोई विधिक परिणाम नहीं था। इसलिए पीठ ने दोनों पक्षों को फिर से नया प्रस्ताव देने का निर्देश दिया।
  • डबल बेंच (Double Bench): सिंगल बेंच के इस निर्णय के खिलाफ खंडपीठ (Division Bench) में अपील की गई। खंडपीठ के अनुसार, टेंडर के साथ छूट की पेशकश देना कोई ऐसा संशोधन या चूक नहीं था, जिसके कारण शर्त के अनुसार निविदा दूषित (Vitiated/Rejected) हो जाती। लेकिन चूंकि प्रतिवादी नंबर 5 का निविदा सबसे अधिक छूट के साथ था, इसलिए वह स्वीकार करने योग्य था।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:

हाई कोर्ट के इस आदेश को वादी (कन्हैया लाल, जो कि प्रथम निविदाकर्ता थे) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट के समक्ष विचार के लिए मुख्य विधिक प्रश्न यह था कि— क्या वादी द्वारा छूट की पेशकश के साथ दी गई निविदा स्वीकार करने योग्य थी और दूसरा, यदि इसे स्वीकार कर लिया जाता तो क्या यह अन्य पक्षों के हितों के प्रतिकूल होता?

सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रेक्षण किया कि नौकरशाही के कार्यों में देरी एक कुख्यात तथ्य है और निविदा को अंतिम रूप देने में देरी से व्यवसायियों (Businessmen) के लिए कठिनाई उत्पन्न हो जाती है। यदि बहुत से व्यवसायी इस समय को कम करने के लिए आकर्षक प्रस्ताव या छूट देते हैं (यह छूट समय-सीमा के अनुसार थी), तो यह नहीं कहा जा सकता कि यह निविदा सशर्त (Conditional) थी। छूट की दर और समय-सीमा दोनों ही स्पष्ट रूप से उल्लिखित थीं।

चूंकि वादी ने छूट का प्रस्ताव पहले ही (निविदा के साथ ही) कर दिया था, लेकिन प्रतिवादी नंबर 5 ने निविदा खुलने के बाद ऐसा प्रस्ताव दिया था। यह नहीं कहा जा सकता कि प्रतिवादी नंबर 5, जो कि एक प्रबुद्ध व्यवसायी है, निविदा को जल्दी अंतिम रूप देने के लिए छूट की पेशकश के सामान्य चलन से परिचित नहीं था। उसने वादी द्वारा की गई छूट की पेशकश के काफी बाद एक अलग पत्र के माध्यम से अपनी छूट का प्रस्ताव दिया, जो वादी द्वारा दी गई छूट से अधिक था।

इसलिए, रेलवे द्वारा वादी के पहले दिए गए प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने में कुछ भी अवैध या त्रुटिपूर्ण नहीं था। अतः, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए वादी की अपील को स्वीकार कर लिया।

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