अवयस्क से संविदा की कानूनी स्थिति (Legal Position of Minor’s Agreement) – Part 12

अवयस्क से संविदा की कानूनी स्थिति (Legal Position of Minor’s Agreement

अवयस्क से संविदा कानून की दृष्टि में मान्य नहीं है। धारा 10 के अनुसार अवयस्क संविदा करने के लिए सक्षम नहीं हैं। इसके पीछे सिद्धांत यह है कि अपरिपक्व मस्तिष्क के कारण अवयस्क अपने हानि-लाभ और किसी संविदा के प्रभाव को भली-भाँति समझ नहीं सकता है।

इसलिए, उसके हित की रक्षा करना कानून का कर्तव्य है। यदि कोई अवयस्क संविदा करता है, तो कानून उसे संविदा नहीं मानता है, अर्थात वह आरंभ से ही शून्य (Void ab initio) संविदा होता है।

अवयस्क से संविदा आरंभतः शून्य होता है और इससे किसी प्रकार के अधिकार या दायित्व की उत्पत्ति नहीं होती है। इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न न्यायालयों के सामने आए, जैसे:

  • क्या अवयस्क से संविदा केवल शून्य होता है या आरंभतः शून्य होता है?
  • यदि वयस्क व्यक्ति कपट कर अपने को वयस्क बताकर संविदा कर ले, या संविदा के कुछ भाग का पालन हो चुका हो, इन सब स्थितियों में पीड़ित पक्ष के लिए क्या अनुतोष (Relief) है?

निम्नलिखित लीडिंग केस (Leading Cases) में न्यायालयों ने इन सभी बिंदुओं पर विस्तार से विचार किया है।

संविदा के लिए सक्षमता (Capacity to Contract) क्या है?

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 10 एक वैध संविदा के लिए जो शर्तें बताती है, उसमें से एक है— संविदा के लिए सक्षम पक्षकार। कौन व्यक्ति संविदा के लिए सक्षम है, यह धारा 11 बताती है। धारा 11 के अनुसार:

“प्रत्येक व्यक्ति संविदा करने के लिए सक्षम है जो उस विधि के अनुसार, जिसके वह अधीन है, वयस्कता की आयु का है, और जो स्वस्थचित्त का है, तथा किसी ऐसी विधि द्वारा संविदा करने से अयोग्य घोषित नहीं किया गया है, जिसके वह अधीन है।”

अर्थात, तीन प्रकार के व्यक्तियों को छोड़कर सभी व्यक्ति संविदा करने के लिए सक्षम होते हैं। ये तीन (असक्षम) व्यक्ति हैं:

  1. अवयस्क (Minors);
  2. अस्वस्थचित्त व्यक्ति (Persons of unsound mind); और
  3. ऐसा व्यक्ति जिसे वहाँ प्रवृत्त विधि ने संविदा के लिए अयोग्य माना हो (Persons disqualified by law to which they are subject)।

अर्थात कोई भी प्राप्सवय (Major) व्यक्ति जो स्वस्थचित्त हो और जिसे कानून ने संविदा के लिए अयोग्य घोषित नहीं किया हो, संविदा करने के लिए सक्षम है।

वयस्कता से क्या तात्पर्य है?

वयस्क से तात्पर्य एक ऐसे व्यक्ति से है जिसने तत्समय प्रवृत्त विधि के अनुसार वयस्कता के लिए निश्चित आयु प्राप्त कर ली हो। भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 की धारा 3 के अनुसार वयस्कता प्राप्त करने के लिए दो आयु सीमाएँ हैं:

  1. 18 वर्ष: सभी सामान्य व्यक्तियों के लिए, यदि विधि द्वारा कोई अभिभावक नियुक्त न किया गया हो;
  2. 21 वर्ष: यदि न्यायालय द्वारा उसके स्वयं के या उसकी संपत्ति के संरक्षण के लिए अभिभावक नियुक्त किया गया हो। यदि किसी के लिए विधिक संरक्षक नियुक्त है, लेकिन उसके 21 वर्ष होने से पहले ही उस अभिभावक की मृत्यु हो जाए, न्यायालय स्वयं उसे इस कार्य से हटा दे, या किसी अन्य कारण से अभिभावक कार्य करने में सक्षम न हो, तब भी वह व्यक्ति 21 वर्ष का होने पर ही कानूनी रूप से वयस्क माना जाएगा।
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भारत में यह स्थिति इंग्लैंड से भिन्न है, क्योंकि वहाँ 18 वर्ष सभी स्थितियों में वयस्कता के लिए एकमात्र विधिक आयु है।

किसी अवयस्क द्वारा किए गए संविदा की विधिक स्थिति या प्रकृति क्या होती है?

भारतीय संविदा अधिनियम लागू होने के बाद, अवयस्क से किए गए संविदा के संबंध में विभिन्न न्यायालयों में इस बात को लेकर मतभिन्नता रही कि ऐसा संविदा शून्य (Void) है या शून्यकरणीय (Voidable)।

लेकिन मोहरी बीबी बनाम धर्मदास घोष के वाद से यह स्पष्ट हो गया कि इस प्रकार का संविदा आरंभतः शून्य (Void ab initio) होता है। इसीलिए वयस्क होने पर भी वह इसका दृढ़ीकरण (Ratification) नहीं कर सकता है। परंतु अवयस्क के पक्ष में दान संपत्ति अंतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) द्वारा प्रतिषिद्ध (Prohibited) नहीं है। अतः अवयस्क भले ही संविदा में प्रत्यक्ष पक्षकार न हो, लेकिन उस संविदा के माध्यम से संपत्ति प्राप्त कर सकता है।

भारत में यह कानूनी स्थिति इंग्लैंड से भिन्न है। कॉमन लॉ के साधारण नियम के अनुसार अवयस्क द्वारा की गई संविदा उसके विकल्प पर शून्यकरणीय होती है, अर्थात यदि अवयस्क चाहे तो वयस्क होने पर इसे शून्य घोषित करवा दे या उसका समर्थन कर वैध संविदा बना दे।

लेकिन इन्फेंट रिलीफ एक्ट, 1874 (Infants Relief Act, 1874) द्वारा इसमें परिवर्तन किए गए हैं। अब इंग्लैंड में ये तीन प्रकार की संविदाएँ पूर्णतः शून्य होती हैं:

  1. ऋण की राशि या इसके पुनर्भुगतान के लिए संविदाएँ;
  2. आवश्यक वस्तुओं के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं की आपूर्ति के लिए संविदाएँ;
  3. लिखित लेखों की संविदाएँ।

चूँकि अवयस्क जो कार्य स्वयं नहीं कर सकता है, वह दूसरों के माध्यम से भी नहीं कर सकता है, इसलिए अभिकरण की संविदा (Contract of Agency) में वह स्वयं प्रिंसिपल (Principal) नहीं हो सकता है, लेकिन वह एजेंट (Agent) हो सकता है क्योंकि एजेंट का कोई व्यक्तिगत दायित्व नहीं होता है।

1. मोहरी बीबी वर्सेस धर्मदास घोष [(1903) 30 I. A. 114]

  • तथ्य: अवयस्क धर्मदास घोष किसी अचल संपत्ति का अकेला उत्तराधिकारी था। उसकी माँ कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा उसकी विधिक अभिभावक (Legal Guardian) नियुक्त की गई थी। धर्मदास घोष ने 20 जुलाई, 1895 को ब्रह्मोधत्त नामक साहूकार को 20,000 रुपये में 12% प्रतिवर्ष की ब्याज दर पर अपनी संपत्ति बंधक (Mortgage) रख दी। बंधक का दस्तावेज़ (Mortgage Deed) बनाया गया। लेकिन इस संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान स्वयं ब्रह्मोदत्त कलकत्ता में उपस्थित नहीं था; यह प्रक्रिया उसके अटॉर्नी केदारनाथ द्वारा की गई थी और पैसे उसके स्थानीय मैनेजर देदराज ने दिए थे।
  • नोटिस: 15 जुलाई, 1895 को धर्मदास की माँ ने अपने अटॉर्नी के द्वारा ब्रह्मोधत्त को यह नोटिस दिया था कि धर्मदास घोष अभी भी अवयस्क है, लेकिन केदारनाथ ने इस तरह के किसी नोटिस के मिलने से इंकार किया था। 10 सितंबर, 1895 को धर्मदास की माँ ने ब्रह्मोधत्त के विरुद्ध यह कहकर कार्रवाई की कि उसने उसके नाबालिग पुत्र से संविदा किया है, और ऐसा संविदा शून्य है क्योंकि नाबालिग इस तरह के समझौते के लिए सक्षम नहीं होता है।
  • प्रतिरक्षा (Defense): ब्रह्मोधत्त ने बचाव लिया कि धर्मदास ने इस संविदा पर हस्ताक्षर करते समय अपने को वयस्क बताया था और उसे या उसके अटॉर्नी केदारनाथ को उसके नाबालिग होने का तथ्य ज्ञात नहीं था। धर्मदास ने अपनी घोषणा में स्वयं को बालिग बताया था, इसलिए यह उसके साथ छल और धोखा हुआ है और धर्मदास किसी भी अनुतोष (Relief) का हकदार नहीं है।
  • निर्णय: ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय न्यायालय ने नाबालिग के साथ संविदा को आरंभ से ही शून्य (Void ab initio) माना। इस बीच ब्रह्मोधत्त की मृत्यु हो गई, और उसकी विधवा मोहरी बीबी ने इस निर्णय के विरुद्ध प्रिवी कौंसिल में अपील की।
  • प्रिवी कौंसिल के सिद्धांत:
    1. किसी अवयस्क व्यक्ति के साथ किया गया संविदा न तो वैध है और न ही शून्यकरणीय, बल्कि यह आरंभ से ही शून्य होता है। इसलिए इससे किसी भी तरह का विधिक कर्तव्य या दायित्व उत्पन्न नहीं होता है।
    2. भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 64 केवल उस मामले में लागू होती है जहाँ संविदा के पक्षकार ऐसे संविदा करने के लिए सक्षम होते हैं (यानी संविदा शून्यकरणीय होती है)। यह उन मामलों पर लागू नहीं होती जहाँ संविदा शुरू से ही शून्य हो। इसलिए एक अवयस्क को इस सेक्शन के अंतर्गत राशि के प्रत्यावर्तन (Restitution) के लिए नहीं कहा जा सकता है। धारा 64 की तरह धारा 65 भी शून्यकरणीय संविदा पर लागू होती है, अतः इसके अंतर्गत भी अवयस्क को राशि वापस करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
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2. अजुधिया प्रसाद वर्सेस चन्दन लाल [AIR 1937 All. 610]

  • तथ्य: दो अवयस्क, जिनकी आयु 18 वर्ष से अधिक लेकिन 21 वर्ष से कम थी, के लिए विधिक अभिभावक नियुक्त था। अवयस्क प्रतिवादियों ने 15 अक्टूबर, 1925 को एक संपत्ति बंधक (Mortgage) रखी। बाद में जब गिरवी लेने वाले वादी ने संपत्ति बेचने के लिए वाद दायर किया, तो उन्होंने प्रतिरक्षा ली कि वे अवयस्क थे क्योंकि उनके लिए विधिक अभिभावक नियुक्त था, अतः वयस्कता की आयु 21 वर्ष होनी चाहिए थी। दूसरा, कर्ज लेने के लिए उनकी कोई मूल या अनिवार्य आवश्यकता (Basic Necessity) भी नहीं थी (गिरवी विवाह के खर्च के लिए लिया गया था)। वादी ने धारा 68 के अनुसार राशि लौटने की माँग की।
  • न्यायालय का दृष्टिकोण: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने विचार किया कि क्या विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act) के तहत अवयस्क से संविदा से हुई हानि के लिए प्रतिकार (Compensation) दिलाया जा सकता है, और क्या प्रत्यास्थापन लागू होगा। न्यायालय ने मत व्यक्त किया कि:
    1. यदि कोई अवयस्क प्रतिवादी है, तो उसे विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम के तहत राहत या प्रतिकार देने के लिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह शून्य संविदा को प्रवर्तित कराना होगा।
    2. लेस्ली बनाम शील [(1914) 3 K.B. 607] के नियम को अपनाते हुए निर्धारित किया गया कि अवयस्क को संपत्ति के प्रत्यास्थापन (वापस करने) के लिए तभी कहा जा सकता है जब वह संपत्ति अभी भी खोजी जा सकने की स्थिति में हो, किंतु उसे पैसे से प्रतिकार देने के लिए नहीं कहा जा सकता।

अवयस्क के करार का दृढ़ीकरण (Ratification of the Minor’s Agreement)

चूँकि एक अवयस्क द्वारा किया गया करार आरंभ से ही विधि की दृष्टि में शून्य होता है, इसलिए अवयस्क वयस्कता की आयु प्राप्त करने के बाद भी इसे दृढ़ीकरण (Ratification) द्वारा वैध नहीं बना सकता है। न ही अवयस्कता के समय किए गए लेन-देन में दिया गया प्रतिफल, वयस्कता प्राप्त करने पर दिए गए नए वचन के लिए विधिमान्य प्रतिफल हो सकता है।

  • सूरज नारायण बनाम सुक्खु अहीर [AIR 1928 All. 440]: एक अवयस्क ने कुछ राशि उधार ली। वयस्क होने पर उसने उस राशि और ब्याज को लौटने का नया वचन दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2:1 के बहुमत से अभिनिर्धारित किया कि अवयस्कता के दौरान लिया गया प्रतिफल धारा 2(d) के अनुसार वैध प्रतिफल नहीं हो सकता है, इसलिए नया वचन भी बिना प्रतिफल के होने के कारण विधिमान्य नहीं है।
  • कुंदर बीबी बनाम श्री नारायण [(1906-7) 11 Cal. WN 135]: यदि अवयस्क ने लाभ का एक भाग अवयस्कता के दौरान और दूसरा भाग वयस्क होने के बाद लिया हो, और वयस्क होने के बाद समस्त राशि लौटने का वचन दिया हो, तो चूँकि इसमें नया प्रतिफल भी शामिल था, यह वैध संविदा माना गया और वह राशि लौटाने के लिए उत्तरदायी था।
  • निहालचंद बनाम मीर जान मोहम्मद खान [AIR 1937 Sind 310]: अवयस्क ने किराए पर संपत्ति देने का संविदा किया जिसे उसने वयस्क होने पर भी जारी रखा। न्यायालय ने पाया कि संविदा वैध था और वादी बकाया किराया वसूलने के लिए सक्षम था।
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क्या अवयस्क से संविदा के मामले में विबंधन (Estoppel) हो सकता है?

विबंधन (Estoppel) का सामान्य अर्थ होता है अपने दिए गए वचन से आबद्ध होना, भले ही वह कथन आरंभ में झूठा ही क्यों न हो। यह साक्ष्य का नियम है और साक्ष्य अधिनियम की धारा 115 द्वारा परिभाषित है। लेकिन यह सिद्धांत अवयस्क से संविदा के मामले में लागू नहीं होता है।

अर्थात, यदि कोई अवयस्क अपनी आयु के बारे में झूठ बोलकर (दुर्व्यपदेशन कर) यह कहे कि वह वयस्क है और संविदा करे, तो उसे इस बात के लिए उत्तरदायी नहीं बनाया जा सकता है कि उसने पहले झूठ बोला था, और उसे अपनी अवयस्कता की प्रतिरक्षा (Defense of Minority) लेने से वंचित नहीं किया जा सकता।

खान गुल वर्सेस लाखा सिंह [AIR 1928 Lah. 609]

  • तथ्य: एक अवयस्क ने 17,500 रुपये में एक प्लॉट वादी को बेचा। इस राशि में से 8,000 रुपये नकद दिए गए और शेष 9,500 रुपये प्रोमिसरी नोट के रूप में दिए गए। बाद में उसने प्लॉट का कब्जा देने से मना कर दिया और अपनी अवयस्कता का बचाव लिया।
  • विधिक प्रश्न:
    1. क्या संविदा का कोई पक्ष जो अवयस्क हो और अपने को वयस्क बताकर दूसरे पक्ष को संविदा के लिए उत्प्रेरित करे, को अपनी अवयस्कता का लाभ उठाकर संविदा के पालन से बचने से रोकने के लिए उस पर विबंधन (Estoppel) लगाया जा सकता है?
    2. क्या ऐसा अवयस्क अपने दायित्व से बचते हुए इस संविदा के अंतर्गत लाभ प्राप्त कर सकता है?
  • लाहौर उच्च न्यायालय का निर्णय: मुख्य न्यायाधीश सर शादी लाल की पूर्ण पीठ ने स्पष्ट किया कि विबंधन की विधि एक सामान्य नियम है, जबकि संविदा की सक्षमता से संबंधित संविदा अधिनियम एक विशेष नियम है। विशेष प्रावधान सामान्य प्रावधान का अपवाद होता है, इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 115 को संविदा अधिनियम के विशिष्ट उपबंधों के साथ ही पढ़ा जाना चाहिए। अतः अवयस्क के विरुद्ध विबंधन का नियम लागू नहीं होगा (पहला प्रश्न नकारात्मक)।
  • पुनर्स्थापन का सिद्धांत (Doctrine of Restitution): न्यायालय ने साम्यता के सिद्धांत के आधार पर निर्णय दिया कि यद्यपि संविदा शून्य है, किंतु यदि अवयस्क ने इस संविदा के माध्यम से कोई अनुचित लाभ या धनराशि प्राप्त की है, तो उसे वह राशि प्रतिवादी को लौटानी होगी। यह शून्य संविदा को प्रवर्तित करना नहीं है, बल्कि संविदा-पूर्व की स्थिति (Status quo ante) बहाल करना है ताकि किसी को दूसरे की कीमत पर अनुचित लाभ न मिले।
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