भारत में हिंसा: आँकड़े, कानूनी सुरक्षा और तात्कालिक कदम | Violence in India: Statistics & Legal Rights

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ‘Crime in India’  के वर्ष 2021 और 2022 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल ‘चोट पहुंचाने’ (Causing Hurt) के 3 लाख से अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं। देश में सबसे अधिक होने वाले अपराधों में यह शामिल है। इतना ही नहीं, देश में हर साल केवल बच्चों के खिलाफ हिंसा के 1.5 लाख से 1.62 लाख से अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं जो कि चिंताजनक है।

देश में बच्चों पर होने वाली हिंसा (Crimes against Children) और बच्चों द्वारा की जाने वाली हिंसा  दोनों के ही आधिकारिक आंकड़े NCRB (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) की ‘Crime in India’ रिपोर्ट में अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज किए जाते हैं।

बच्चों पर होने वाली हिंसा

NCRB की 2021 और 2022 की वार्षिक रिपोर्टों के अनुसार बच्चों पर होने वाली हिंसा (Crimes against Children) को इन तीन प्रमुख श्रेणियों में रखा जाता है:  

(1) POCSO Act (यौन अपराध): कुल मामलों में से लगभग 40% से 45% मामले पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के तहत दर्ज होते हैं (लगभग 60,000 से अधिक मामले प्रतिवर्ष) ।

(2) अपहरण और व्यपहरण (Kidnapping & Abduction): कुल अपराधों का लगभग 45% भाग बच्चों के अपहरण से जुड़ा होता है।

(3) शारीरिक हिंसा और हत्या: बच्चों के साथ मारपीट, शारीरिक शोषण और हत्या (Infanticide/Murder) के मामले शेष 10% के दायरे में आते हैं।

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बच्चों द्वारा की जाने वाली हिंसा (Juvenile Delinquency)

अपराध कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को ‘बच्चा’ माना जाता है भले ही वह लड़का हो या लड़की। अगर कोई बच्चा कोई अपराध करता है तो कानून के अनुसार उसे ‘अपराधी’ नहीं कहा जाता बल्कि ‘कानून का उल्लंघन करने वाले किशोर’ (Juveniles in Conflict with Law-JCL) कहा जाता है।

NCRB की 2021 और 2022 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल बच्चों द्वारा किए गए अपराधों के लगभग 30,000 से 31,000 मामले (FIR) दर्ज किए जाते हैं। यह आँकड़ा देश के दर्ज होने वाले कुल संज्ञेय अपराधों (Cognizable Crimes) का लगभग 0.7% से 0.9% है।

बच्चे जिन अपराधों को करते हैं उनमें सबसे अधिक ये दो श्रेणी के अपराध होते हैं:

(1) चोरी और संपत्ति के नुकसान से जुड़े अपराध, और

(2) शारीरिक हिंसा (मारपीट/Hurt), दंगा, और गंभीर अपराध (जैसे हत्या या बलात्कार)। इस श्रेणी के अपराध कुल बाल अपराधों का लगभग 15% से 20% हिस्सा बनाते हैं।

अर्थात अपराध करने वाले और अपराध सहने वाले- दोनों ही श्रेणियों में बच्चों की एक बड़ी संख्या शामिल है।

किसी के साथ मारपीट करना कानूनी अपराध है

किसी भी व्यक्ति को (भले ही वह बच्चा हो या बड़ा) चोट पहुंचाना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि भारतीय कानून के तहत एक गंभीर दंडनीय अपराध भी है।

अपराध के प्रकार [संबन्धित कानून]   अपराध का विवरण सजा
स्वेच्छा से चोट पहुंचाना (Voluntarily Causing Hurt) [BNS की धारा 115(1)/IPC की  धारा 321 एवं 323]  जानबूझकर किसी को थप्पड़ मारना, मारना-पीटना या शारीरिक चोट पहुंचाना।1 वर्ष तक का कारावास, या ₹10,000 तक का जुर्माना, या दोनों
गंभीर चोट पहुंचाना (Grievous Hurt) [BNS की धारा 117/IPC की धारा 325]  हड्डी टूटना, आंख/कान या किसी अंग को स्थायी नुकसान पहुंचना, या 20 दिनों से अधिक गंभीर शारीरिक दर्द में रहना।  7 वर्ष तक की जेल, तथा जुर्माना
महिलाओं पर घरेलू शारीरिक हिंसा [घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 (PWDVA)]  अपने घर में रहने वाली किसी भी महिला संबंधी (भले ही वह पत्नी, माँ और बहन आदि कुछ भी हो) पर किसी भी प्रकार का शारीरिक हमला या हिंसा करना।न्यायालय सुरक्षा का आदेश (protection order) दे सकता है और जरूरी होने पर दोषी व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाई भी कर सकता है। न्यायालय के आदेश को नहीं मानने पर 1 साल तक की जेल हो सकता है। जुर्माना भी लगाया जा सकता है (धारा 31)।  
POCSO Act एवं SC/ST Actबच्चों या अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के लोगों पर शारीरिक हमला या अत्याचार।ये विशेष कानून अपेक्षाकृत अधिक कठोर हैं। इन क़ानूनों में अपराधों की गंभीरता के अनुरूप अलग-अलग सजा का प्रावधान है।

शारीरिक हिंसा होने पर क्या करें?

शारीरिक हिंसा होने पर सबसे पहले अपने को बचाने का प्रयास करें। जहां तक संभव हो उस स्थान से जल्दी निकल कर किसी सुरक्षित स्थान पर (जैसे पड़ोसी, रिश्तेदार या कोई सार्वजनिक स्थान) पहुँचे। अगर आप बच्चे हैं तो किसी बड़े से मदद लेने का प्रयास करें। अगर किसी संस्था (जैसे विद्यालय) में हो तो यथासंभव इसकी सूचना संस्था के प्रमुख (जैसे प्रिन्सिपल) को दें।

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इमरजेंसी नंबर पर कॉल करें:

  • 112: राष्ट्रीय आपातकालीन नंबर (किसी भी स्थिति में पुलिस और तत्काल सहायता के लिए)।
  • 1091: महिला हेल्पलाइन (यदि पीड़ित महिला है)।
  • 1098: चाइल्ड हेल्पलाइन (यदि पीड़ित बच्चा/नाबालिग है)।
  • 181: घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के लिए विशेष हेल्पलाइन।

चिकित्सीय सहायता और मेडिकल रिपोर्ट (Medical Examination)

किसी भी तरह की हिंसा में चोट लगने की स्थिति में तुरंत अस्पताल जाएं, भले ही चोट हल्की हो या गंभीर। डॉक्टर से कहें कि यह मारपीट का मामला है ताकि वे आपकी MLC (Medicolegal Report) बनाएं। कानूनी कार्रवाई और कोर्ट में मारपीट साबित करने के लिए डॉक्टर की रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण सबूत होती है।

सबूत सुरक्षित रखें

भविष्य यदि आप कोई कानूनी कार्यवाई करेंगे तो वहाँ आपको सबूतों की आवश्यकता होगी। इसलिए सबूतों को सुरक्षित रख लें ताकि अपराधी को कानून द्वारा सजा दिलाया जा सके। इसके लिए:

(1) अपने शरीर पर लगी चोटों, खरोंच या कटे के निशानों की स्पष्ट फोटो और वीडियो लें।

(2) हिंसा के दौरान फटे या खून से सने कपड़ों को धोएं नहीं, उन्हें सबूत के तौर पर सुरक्षित रखें।

(3) यदि घटना के समय कोई प्रत्यक्षदर्शी (Witness) मौजूद था, तो उसका विवरण संभाल कर रखें।

कानूनी कार्रवाई करें: निकटतम पुलिस थाने जाकर लिखित शिकायत दें। प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराएं और पुलिस से उसकी निःशुल्क प्रति (Free Copy) अवश्य लें। 

कानूनी एवं परामर्श सहायता (Legal & Counselling Help): अगर आपको कानूनी परामर्श की आवश्यकता हो किन्तु वकील का फी देने के लिए आप आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हों तो जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA – District Legal Services Authority) से मुफ्त सरकारी वकील की मांग कर सकते हैं। गंभीर स्थिति में आप ‘सखी वन स्टॉप सेंटर’ (Sakhi One Stop Centre) (केवल महिलाओं के लिए) या किसी एनजीओ (NGO) (महिला बच्चे आदि सबके लिए) की मदद से सुरक्षित आश्रय (Shelter Home) प्राप्त करें।

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संक्षेप में आप स्वयं किसी पर हिंसा न करें। अगर आप पर हिंसा हो तो बदले में हिंसा करने के बदले स्वयं को शांत और सुरक्षित रखते हुए कानूनी तरीके से दोषियों व्यक्तियों को सजा दिलाएँ। 

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