विधिपूर्ण विषयवस्तु और विधिपूर्ण प्रतिफल क्या है? (Lawful Object and Consideration in Contract Act) (सेक्शन 23)- Part 17

विधिपूर्ण विषयवस्तु (lawful object) और विधिपूर्ण प्रतिफल (lawful consideration)

विधिपूर्ण विषयवस्तु और विधिपूर्ण प्रतिफल किसी भी वैध संविदा के लिए अनिवार्य है। सेक्शन 10 के अनुसार एक संविदा के विधिपूर्ण होने के लिए यह आवश्यक है कि इसका विषयवस्तु यानि उद्देश्य और प्रतिफल दोनों विधिपूर्ण हो। कौन से उद्देश्य और प्रतिफल विधिपूर्ण है यह सेक्शन 23 बताता है।

सेक्शन 23 के अनुसार अगर किसी करार का उद्देश्य या प्रतिफल निम्नलिखित तरह का नहीं हो तो विधिपूर्ण होगा:

  • 1. वह विधि द्वारा निषिद्ध नहीं हो,
  • 2. वह ऐसे प्रकृति का नहीं हो जिससे विधि का कोई उपबंध विफल हो,
  • 3. वह कपटपूर्ण न हो,
  • 4. उसमें किसी के शरीर या संपत्ति को क्षति न होता हो,
  • 5. न्यायालय उसे अनैतिक नहीं माने
  • 6. न्यायालय उसे लोकनीति के विरुद्ध नहीं माने।  

अगर किसी करार का उद्देश्य या प्रतिफल इन छह में से किसी श्रेणी में आ जाएगा तो वह शून्य माना जाएगा। इसके अतिरिक्त अन्य उद्देश्य या प्रतिफल विधिपूर्ण माने जाएँगे।

सेक्शन 23 में प्रयुक्त “लोकनीति (public policy) के विरुद्ध” का क्या आशय है?

सेक्शन 23 के अनुसार लोकनीति के विरुद्ध किया गया कोई भी संविदा शून्य है। लोकनीति के विरुद्ध क्या है, यह न्यायालय तय करेगा। इसके लिए कोई परिभाषा नहीं दिया गया है।

लेकिन सामान्य अर्थो में लोक नीति का आशय उस समय देश में लागू विधि की नीति होता है। कोई कार्य जो उस समुदाय के सामाजिक-आर्थिक हितों के लिए प्रतिकूल हो तो वह लोकनीति के विरुद्ध होगा।

विधि के साथ यह बदल सकता है क्योंकि विधि की नीति ही लोकनीति मानी जाती है। उदाहरण के लिए 1857 में ईसा मसीह का मत इंग्लिश विधि का भाग माना जाता था ऐसे में नास्तिकता को बढ़ावा देने वाले किसी समुदाय को एक हौल किराए पर देना लोकनीति के विरुद्ध माना गया (कोवन बनाम मिलबोर्न– (1867) LR 2 X Ch 230) लेकिन 1917 में जब कानून बदल गया और ईसा मसीह का मत कानून का भाग नहीं रहा तब यह लोकनीति के विरुद्ध नहीं माना गया (बोमन बनाम सेक्युलर सोसाइटी– (1917) AC406)।

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लोकनीति की सुरक्षा अगर आवश्यक है तो दूसरी तरफ संविदा की स्वतंत्रता और संविदात्मक अधिकारों (contractual rights) की सुरक्षा भी आवश्यक है। इसलिए दोनों में संतुलन होना भी आवश्यक है।

लसेज़ फेयर के सिद्धांत के समर्थक “संविदा की स्वतंत्रता” पर बहुत बल देते हैं इसलिए वे न्यायालय को लोकनीति के आधार पर किसी संविदा को शून्य करने के अधिकार का समर्थन नहीं करते है। उनके विचार में न्यायालय का कार्य विधि की व्याख्या करना है, उसका विस्तार करना नहीं।

लेकिन वर्तमान में लासेज़ फेयर के सिद्धांत पर अधिकतम सामाजिक और आर्थिक कल्याण के सिद्धांत का वर्चस्व स्वीकार कर लिया गया है। इसलिए लोकनीति यानि सार्वजनिक हित के प्रतिकूल होने के आधार पर न्यायालय संविदा में हस्तक्षेप कर सकता है।

न्यायालयों ने विभिन्न वादों में इन्हें लोकनीति के विरुद्ध माना है- अभियोजन को दबाने वाला करार, शत्रु देश के साथ व्यापार का करार, विवाह अवरोधक करार, व्यापार अवरोधक करार, न्यायालय की अधिकारिता को बाहर निकालने का करार इत्यादि। इन में से कई करार संविदा अधिनियम में सपष्ट रूप से शून्य घोषित किए गए है और इन्हे लोकनीति के विरुद्ध भी माना गया है।

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